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जाने क्यों भूल जाते हैं व अन्य कविताएँ // विनोद सिल्ला

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1.
जाने क्यों भूल जाते हैं

बचपन में भाई-भाई में
या भाई-बहन में
हो जाता था  झगड़ा
हो जाती थी अनबन
हो जाती थी बोल-चाल बंद
थोड़ी देर के लिए

फिर  लगते हैं बोलने
सब कुछ भुला कर
खेलने लगते हैं इकट्ठे
वही बचपन के भाई-भाई
या भाई-बहन
हो कर बड़े
हो पर अनबन
हो जाते हैं अनबोल
सदा के लिए

खिंच जाती हैं दीवारें
घरों में
दिलों में
जीवन में
और हो जाते हैं
एक-दूसरे से
बहुत दूर
सदा के लिए
जाने क्यों भूल जाते हैं  बड़े
अपने बड़प्पन को
अपने बीते बचपन को

-विनोद सिल्ला©
2.
परिस्थितियां

कार्तिक मास
है जा चुका
शीतकाल
है आ चुका
तन-मन को
झुलसाने वाला
ज्येष्ठ में आग
बरसाने वाला
सूर्य बड़ा ही
भा रहा है
मनमोहक नजर
आ रहा है
लगा कि
कोई  वस्तु
अच्छी या बुरी
नहीं होती
अच्छी या बुरी तो
होती हैं
परिस्थितियां

-विनोद सिल्ला©
3.
पाख्ता

एक रोज
जब सुनी आवाज
घुग्गू-घू, घुग्गू-घू
मैं चौंक गया
गाती देखी
जब एक पाख्ता

वर्षों बाद
सुनी ये आवाज
लगा मानो
बहुत दिनों बाद
सुना कोई
मनपसंद गाना
खुश हो गया मन

-विनोद सिल्ला©
4.
सर्दी का सुस्वागतम्

सर्दी ने
दी दस्तक
ठंडी चली हवा
लगी सुहावनी
करा दिया अहसास
कार्तिक माह का
ग्रीष्म ऋतु ने
कहा अलविदा
वैरी-सी
लगने वाली
सूर्य की किरणों ने
बढ़ाया हाथ
मित्रता का
मैंने भी
सर्दी को कहा
सुस्वागतम्

-विनोद सिल्ला©
5.
मनोरम संगीत

छुट्टियों में
जब मैं
गया अपने गाँव
गाँव के बाहर
पेड़ों के झुरमुट में
बड़ा मनोरम
संगीत सुना
चिड़िया गाँव रही थी
चहचहाहट भा रही थी
हवा की सायं-सायं
लगी लाजवाब
लगी कर्णप्रिय
शहरों में
ये सब कहाँ

-विनोद सिल्ला©
6.
मैं था हैरान

मैं था हैरान
आज वो
निजी स्वार्थ से
ऊपर उठकर
कर रहा था बातें 
बड़ा सामाजिक
नजर आया
आज उनका
कायाकल्प देख
मैं था विस्मित
बाद में आया ध्यान
चुनाव निकट
होने के कारण
था ये सब

-विनोद सिल्ला©
7.
जाने क्यों

कल भी
यह पेड़
था अकेला
आज सुबह  भी
है अकेला
शायद कल भी
होगा अकेला
पर नहीं है मायूस
है रौनक में
लेकिन यह मानव
मित्र-रिश्तेदारों
परिजनों के बावजूद
रहता है
बुझा-बुझा
दुखी-दुखी
परेशान-परेशान
जाने क्यों?

-विनोद सिल्ला©
8.
तरक्की का दौर

तरक्की के दौर में
गुम हो गया
भाईचारा
टूट गई
स्नेह की तार
व्यक्ति का नाम
छिप गया
सरनेम की आड़ में
पड़ोसी हो गए
प्रतिद्वंद्वी
रिश्तेदार भी हो गए 
मौकाप्रस्त
स्वार्थ की भावना
हो गई बदलती
इस तरक्की के दौर में
जाने क्या-क्या
होना बाकी है

-विनोद सिल्ला©
9.
कभी वैरी-कभी मित्र

ऐ हवा
बदल लेती है तू
नित नया रूप
हो जाती है गर्म तो
कहलाती है लू
हो जाती है ठंडी तो
कहलाती है शीतलहर
जब कर लेती है आत्मसात
ओस के कण
कहलाती है कोहरा
कभी मित्र-सी लगी
तो कभी वैरी-सी लगी

-विनोद सिल्ला©
10.
आईना

मैं हूँ आईना
जैसे को तैसा ही
दिखाता हूँ
सब कुछ सच-सच
ही बताता हूँ
दाढ़ी में तिनका भी
दिखाता हूँ
दुनिया से लाख छिपाओ
चेहरे के दाग
मैं हकीकत से
रूबरू कराता हूँ
नहीं कतराइएगा
सामने आइएगा
खुद की खुद से
नजरें मिलवाता हूँ 
मैं हूँ आईना
सब सच-सच
बताता हूँ

-विनोद सिल्ला©
11.
मैं हूँ रात

मैं हूँ रात
तुम्हारे लिए
लाई हूँ
चैन-सुकून और नींद
सोओगे नहीं तो
कैसे मिटेगी
दिन भर की थकान
कैसे आएगी
तबीयत में  ताजगी
कैसे आएंगे स्वप्न
अगर स्वप्न
नहीं आए तो
कैसे करोगे
लक्ष्य निर्धारित

-विनोद सिल्ला©
12.
जीवन

अधिकतर
नहीं समझते 
जीवन का महत्व

समझते हैं कुछ
मिला है जीवन
पूजा-पाठ के लिए 

सोचते हैं कुछ
मिला है जीवन
धन-संचय के लिए

सोचते हैं कुछ
मिला है जीवन
शोहरत पाने के लिए

परन्तु मुझे लगा
मिला है जीवन
हर पल जीने के लिए

-विनोद सिल्ला©


परिचय

नाम - विनोद सिल्ला
पिता - श्री उमेद सिंह सिल्ला
माता - श्रीमती संतरो देवी
पत्नी - श्रीमती मीना रानी
शिक्षा - एम. ए. (इतिहास) , बी. एड.
जन्मतिथि -  24/05/1977
संप्रति - राजकीय विद्यालय में शिक्षक

प्रकाशित पुस्तकें-

1. जाने कब होएगी भोर (काव्यसंग्रह)
2. खो गया है आदमी (काव्यसंग्रह)
3. मैं पीड़ा हूँ (काव्यसंग्रह)
4. यह कैसा सूर्योदय (काव्यसंग्रह)

संपादित पुस्तकें

1. प्रकृति के शब्द शिल्पी : रूप देवगुण (काव्यसंग्रह)
2. मीलों जाना है (काव्यसंग्रह)
3. दुखिया का दुख (काव्यसंग्रह)


सम्मान

1. डॉ. भीम राव अम्बेडकर राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2011
2. लॉर्ड बुद्धा राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2012
3. ज्योति बा फुले राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2013
4. लाला कली राम स्मृति साहित्य सम्मान 2015
5. प्रजातंत्र का स्तंभ गौरव सम्मान 2018
6. अमर उजाला समाचार-पत्र द्वारा 'रक्तदान के क्षेत्र में' जून 2018 को
7. डॉ. अम्बेडकर स्टुडैंट फ्रंट ऑफ इंडिया द्वारा
साहब कांसीराम राष्ट्रीय सम्मान-2018
पता :-

विनोद सिल्ला
गीता कॉलोनी, नजदीक धर्मशाला
डांगरा रोड़, टोहाना
जिला फतेहाबाद (हरियाणा)
पिन कोड-125120

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