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हास्य - व्यंग्य // धुआंधारी की जय हो // सुरेश खांडवेकर

सुरेश खांडवेकर


सर मुंडाते ही ओले पड़े। फैक्ट्री के मालिक ने दो-चार जवानों को निकाल दिया। फैक्ट्री सूनी हो गयी। फिर मशीनें खराब हो गयी। उसे सुधारा तो मोल्ड में खराबी। फिर उसे ठीक किया तो केमिकल गलत।

आखिर अब सब ठीक-ठाक हुआ तो सेम्पल बिगड़ गये। परेशानी यही खत्म होती तो ठीक था। अचानक बिजली का इंस्पेक्टर आ गया। बिजली का मीटर देख कर भनभनाया -

‘‘इतनी सी किश्त पर आप इतना लोड नहीं ले सकते?’’

‘‘अरे, किश्त बड़ा देना, चालान मत कर।’’

‘‘बिजली कट जायेगी। तुम्हारी वादा खिलाफी से तंग आ चुका है।’’

‘‘अरे, फैक्ट्री बंद पड़ी है।’’

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‘‘फैक्ट्री बंद पड़ी है- तो मीटर की चक्री कैसे घूम रहीं है।’’

‘‘ले लेना, मेरे बाप! जितनी किश्त बढ़ा कर लेना है, ले लेना।’’

‘‘पिछली मिलेगी, तभी तो अगली बड़ेगी ना।’’

राम अवतार ने जेब से एक 500 रू की नोट इस्पेक्टर की जेब में ठूंस दी।

दूसरे दिन रामअवतार की फैक्ट्री प्रदूषण की गिरफ्त में आ गयी। आसपास बुलडोजर अपना फरसा चला-चला कर मकानों को काट रहा था।

रामअवतार ने शनि देवता का जाप शुरू किया। देवता ने उसकी विनती सुन ली। शनि देवता दिल्ली सरकार और नामी नेताओं के कान में क्रंदन करने लगे। परिणामस्वरूप मदनलाल खुराना, विजयकुमार मल्होत्रा, साहिबसिह और यहां तक की दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित और उसकी सरकार भी प्रदूषणकर्ताओं पर मेहरबान हो गयी। ‘प्रदूषणकर्ताओं पर आंख उठाई है तो देखो कल दिल्ली बंद होगी।’ नेताओं की घोषणा के अनुसार दिल्ली बंद हो गयी और उनकी राजनीति के बस्ते खुल गये।

धुंआ सह लेंगे, लेकिन पापी पेट भूखा नहीं रह सकता। साथियों, नाक के छेद और मुंह के छेद में बहुत अंतर है। नाक का काम मुंह भी कर सकता है लेकिन मुंह का काम नाक नहीं कर सकती। नाक में रूई डाल सकते है लेकिन मुंह में नहीं। मुंह में रूई डालेंगे तो मर जाएंगे। फैक्ट्रियां हैं तो रोजगार है, और रोजगार है, तो हम जिन्दा है।

रामअवतार ने त्रीनगर, दिल्ली की अपनी फैक्ट्री में शनि महाराज को अगरबत्ती लगाकर ‘वर्टीकल’ मशीन के सामने खड़ा हुआ। कभी कुर्सी पर, कभी सीड़ी पर बैठता, कभी जूतों के डिब्बे देखता, कभी ग्राहक की ओर आंख लगाता। रूकावट एक नहीं, चारों तरफ से थी। उसका माथा ठनक रहा है। हफ्ते दस दिन से नींद उड़ गयी थी। ऊपर से कई इंस्पेक्टरों ने अलग से परेशान कर रखा था। हर वक्त देनदारियां जोर पकड़ती। पर बीच-बीच जूता आकर दिलासा देता -

‘‘राम अवतार, क्या माथा ठनक रहा है।’’

‘‘हां’’

‘‘तो कुछ लेते क्यों नहीं’’

‘‘सब ले चुका हूं’’

‘‘विस्की, विक्स, बाम, नींद की गोली’’

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‘‘ऐसा करो, सरसों के तेल में घुटने की मालिश करो, चाहो तो तलुवे भी रगड़ लो।’’

रामअवतार तेल की मालिश के बाद तीन दिन तक सोता रहा। इस बीच प्रदूषणकारियों की जय-जयकार भी हो चुकी थी। उसने मन ही मन सोचा, तीन दिन तक सोता रहा, हुआ कैसे? फिर जैसे जूता बोला पड़ा-

राम अवतार, आदमी का सिर जहाँ हो, वहीं पर इलाज करना चाहिये। देखा नहीं, दिल्ली के नेताओं का दिमाग उनके वोटरों में है। वे उनका ध्यान रखते हैं। उन्होंने प्रदूषणकर्ताओं के हित में कितना बढ़ियां भाषण दिया। कितना अच्छा परिणाम निकला। फैक्ट्रियां दुगुनी रफ्तार से चल पड़ी। सच बताऊं, हम भी प्रदूषण के आदि हो गये हैं। हम खुली हवा में पैदा नहीं हो सकते।

राम अवतार गुमसुम हो गया। घुटने पर मालिश करने से सिरदर्द दूर हो गया। अचानक उसे अपने नाना से सुनी कहानी याद आ गयी। एक राजा का दिल एक सुन्दर नवयौवना मेहतरानी पर आ गया। फिर क्या उसने उसे रानी बना लिया। कुछ वर्षों बाद उसने बिस्तर पकड़ लिया। सारे वैद्य और कविराज हार गये, पर अंत में राजवैद्य और राजपुरोहित रानी के पास पहुंचे। उन्होंने उसके माता-पिता और उसके खानदान की बातें पूंछ ली। उसके जन्मकाल और बाल्यकाल की बातें पूछ ली। दोनों की सलाह पर रानी के पलंग के पास पांच सात पाखाने बना लिये। और खिड़कियों दरवाजों को खोल दिया। रानी ठीक हो गयी।

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