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हास्य - व्यंग्य // फैशन को जूतों का सलाम // सुरेश खांडवेकर

सुरेश खांडवेकर


कुछ फैशन रेंगता है। जैसे परम्परा। परम्परा भी एक चलन है। एक सांस्कृतिक उपस्थिति। परम्परा को काटने वाले हजारों थपेड़े आते हैं। उन्मुक्त चलन का स्वच्छंद प्रदर्शन होने लगता है। दिनचर्या और रहन-सहन बदल जाता है। पर जैसे ही कोई मांगलिक कार्य आ जाता है। मेलों और ऋतुओं का आगमन होता है। पता नहीं उन्मुक्त और मूसलाधार फैशन कैसे छुट्टी पर चला जाता है।

माना कि फैशन परम्परा पर कितना ही हावी क्यों न होता हो फिर भी ऐन सांस्कृतिक और मांगलिक अवसरों पर उसे बुरी तरह अपमानित होना पड़ता है। यों तो फैशन कीमती भी है और सस्ता भी। चाहे परम्परागत हो या परम्परा को लांघने वाला।

नया हो या पुराना। जिस चलन को सर्वमान्यता और स्वीकृति मिलती है वहीं फैशन है। अब शब्दों से भी फैशन की झलक सही नहीं उभरती। देखो टोपी को अंग्रेजी में कैप कहते हैं। लेकिन भारत में टोपी का मतलब कहीं और व्यापक है कैप से। टोपी पहनने वाले की बात करो तो एक परम्परागत भारतीय का चित्र उभरता है। बल्कि एड़ी से चोटी तक का चित्र सामने आ जाता है। लेकिन इसके विपरीत कैप के फैशन की बात करें तो मुंबई के हीरो या स्टार-प्लस का शीशा नजर आता है।

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पहनने की बात छोड़ो। नाम के फैशन की बात भी अलग है। वह भी व्यक्तित्व की छाप छोड़ता है। बिहार और बंगाल के दस अक्षरी नाम छँटते-छँटते तीन और चार अक्षरों तक पहुंच गये। शरद चन्द्र चट्टोपाध्याय या महामाया प्रसाद सिंह से शब्द घटते घटते लालू तक सिकुड़ गये हैं। शेष देश के भागों में चार अक्षरी नामों से सोमदेव, नामदेव, भानुदास, हरचरन, खुशबदन भी सिकुड गया है। अब ऐसे नामों वाले लोग अधेड़ या आदि संस्कारी लोग माने जाते है।

स्वीटी, पिंकी, टीटी, कीटी, बिल्ला, बिल्लू, इला, इल्लू, गोलू अहा क्या नाम है। कितनी आधुनिकता झलकती है इन नामों से। ये कुत्तों के पिल्लों के नाम नहीं बच्चों के नाम हैं। बच्चे को पुकारो तो पिल्ला आ जाता है और कुत्ते को फटकारो तो बच्चा कहता है उसे ही गाली दी।

फैशन किसी को नाराज नहीं करना चाहता। फैशन एक फल है जिसका बीज आदमी ने बोया है। बोता रहता है। फैशन की खेती उपजाऊ है। खूब फलती है। हम उन फलों को भोग रहे हैं। इतनी उपज, इतनी उपज कि अपच होने लगा है। ज्यादा खाने से उदर विकृत हो गया है। उदर विकृति तो मन विकृत। इसलिये फिर उसी खेती में खाद पड़ता और फिर फैशन की उपज बढ़ती है। मजबूरी है, जो बोया उसी को खाना है।

माना कि मई जून की गर्मी में शादियाँ हो रही हैं। पानी पीने को नहीं बाराती पसीने के खारे पानी से अपनी जिव्हा को भिगोते हैं। पर क्या करे उसे सूट नहीं तो कम से कम गरवारे या विमल के मोटे कपड़े वाला सूट तो पहनना ही है। भई फैशन है। चेहरे का पसीना रूमाल सोख लेता है, हृदय की गर्मी को बनियान पी लेती है।

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ये हुई गर्मी में पुरुषों के फैशन ओढ़ने की बात। औरतें भी बहुत आगे हैं। जो मातातुल्य हैं वे सलीकेदार साडियां में स्वयं को और अपने सामर्थ्य को प्रदर्शित करती हैं। समझदार युवतियां मां-बाप की लाज रखने के लिये सलवार कुर्ता पहनती हैं। ज्यादा समझदार युवतियां को जरूरत से ज्यादा गर्मी लगती हैं वे बहुत कम कपड़े पहनती हैं। अजी छोड़ो इससे भी समझदार लड़कियों को न गर्मी में बहुत गर्मी लगती है तो सर्दियों में भी बहुत सर्दी। इन लड़कियों को फैशन इतना मजबूर करता है। रोम-रोम में कम्पन पैदा करने वाली सर्दी और बर्फीली हवाओं के बावजूद वे कम से कम कपड़े पहनती हैं। दो इंच रिबिन की चौड़ी पट्टी से भी अपने शरीर को ढांकती है। वह ना भी होती तो भी फैशन की गर्मी से मौसम की सर्दी उसका क्या बिगाड़ती।

अत्याधुनिक और फैशन परस्त लड़की बहुत कम कपड़े पहनती थी। उसके नाना को बहुत मानसिक कष्ट हुआ। जानते थे कि आधुनिकता का रंग इस पर ज्यादा ही चढ़ा है, इस पर कुछ असर नहीं होगा। फिर भी उससे रहा न गया बोला पड़े, ‘‘बिटिया इतनी बड़ी हो गयी। इतनी सर्दी और तुमने कुछ भी पहना नहीं, कुछ नहीं तो कुल मर्यादा का ध्यान करो, कुछ पहना करो।’’

लड़की ने नाना को ठंडा किया, ‘‘क्या कहते हो नानाजी कुछ कैसे पहना नहीं। देखो जूते पहने हैं।’’

नाना समझ नहीं पाये कि उसके जूते पहनने के पीछे क्या अर्थ है। क्या जूते दिखा रही है या वास्तव में जूते पहने दिखा रही है।

फैशन में जूतों की भूमिका कुछ कम नहीं है। अहम भूमिका है। सर्दी हो या गर्मी। चाहे कपड़े पहनो या ना पहनो। मौके के हिसाब से जूते जरूरी हो गये हैं। पर क्या जूतों ने कसम खा रखी है कि वह सिर्फ पैरों को बचाये। काश जूतों का चलन पैरों से लेकर गले तक का होता।

फैशन हितों की अवहेलना करता है। स्वास्थ्य और सुविधाओं की हत्या करता है। कभी अन्वेषण के नाम पर आता है, कभी बदलाव के नाम पर एक आंधी की तरह आता है और लुप्त हो जाता है।

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