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हास्य - व्यंग्य // लाला रामलाल का पर्ची के नाम पत्र // सुरेश खांडवेकर

सुरेश खांडवेकर


हे परमप्रिय पर्ची! अवैध सम्बन्धों की रानी! कोटीकोटी प्रणाम स्वीकार करो। देवी, आज हृदय में कम्पन हो रहा है इसलिए वंदना कर रहा हूं। निरन्तर साथ चलने वाली, प्रगति के पथगामिनी। लगता है अब अवैध सम्बन्धों का भांडा फूटने वाला है। मुझे क्षमा करना।

जीएसटी आ गया है।

मत रोको, आज मुझे पश्चाताप करने दो। आज मेरे इतिहास के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं। तेरा आध्यात्मिक और भौतिक स्वरूप मेरे सामने दंगल फिल्म की तरह आ रहा है। इसी के साथ हृदय में बार-बार आघात हो रहा है।

जीएसटी आ गया है। घणों सारो टैक्स!

बिल कहो या बिजकी यह मेरी सात फेरोवाली पत्नि है। मैंने उसे अंधेरे में रखकर तुझे अपनाया। समाज में रिश्तो-सम्बन्धों में तो वह पत्नि है ही और तू व्यापारिक रिश्तों में प्रेमिका। बहीखातों में, बैंक अकाउंटों में भले ही वह रही हो, लेकिन तू तो मन के खातों में निरंतर रही। नहीं ऐसा नहीं कि मैं उसी को मान्यता देता रहा। दोनों ही मेरे सुख-दुख के साथी रहे हैं। अंततः एक छोटा, अधपका व्यापारी हूं।

जीएसटी आ गया है।

पर्ची तुम दो व्यापारियों के बीच की धूरी रही हो। न्यायालय आपसे भले ही सहमत ना हो, पर हम दो व्यापारियों के व्यवहारों का तुम प्रमाण हो। मेरी उन्नति उसका परिणाम है। तुम सदा मेरे प्रगति की पोषक रही हो। अन्यथा तेरे बिना अदम्य साहस मैं कैसे करता? इतने शासकीय विभागों से कैसे बचता? यह परमात्मा से मिला अपूर्व संयोग ही था, अन्यथा मैं तो कांटों की पगडण्डी पर ही चलता रहता। अस्तु, सम्पदा आने से साहस भी आता है। वह आया तेरे कारण।

जीएसटी आ गया है।

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कहते हैं, किसी पुरुष की उन्नति के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है। पर्ची! तू ही वह कामिनी, दामिनी या कहे मेनका हो। जिसने मुझे शिवसंकल्प का मंत्र दिया। तबसे समझ आने लगा कारोबार। पैंतालिस वर्ष होने को है, तुम मेरी सफलता का अधछिपा उपकरण हो। अन्यथा क्या मैं संगमरमर के चिकने फर्श पर विचरता?

जीएसटी आ गया है।

हे चलवैजन्ती! अपने इस व्यापारिक कार्यकाल में मैंने अनगिनत ब्राण्ड स्थापित कर लिये। व्यापार का विस्तार भी किया। बच्चे भी स्थापित हो गये। फिर भी मुझे अभी तक ब्राण्ड से नहीं पहचानते, लाला रामलाल के नाम से ही जानते हैं। मेरी अपनी ख्याति है। ब्राण्ड तो आया गया, है कि नहीं?

जीएसटी आ गया है।

कहते हैं ख्याति अमूर्त होती है। दिखती नहीं, पर होती है। हे देवी! मूर्तपाखुड़ी! तुमने मेरी ख्याति को पंख लगा दिये, इसे मैं कैसे भूल सकता हूं? तुम तो मेरे लिए ईश्वरदत्त पुरस्कार हो। ऐसे समय जबकि परिस्थितियां बदल रही है। तेरा आभार और अभिनंदन करना मेरा परम कर्तव्य है। मैं कृतज्ञ हूं निष्ठुर कैसे हो सकता हूं?

जीएसटी आ गया है।

पर्ची, हे कोमलांगिनी, कमलिनी तुम, हमारे व्यापारिक व्यवहारों का सांकेतिक प्रमाण हो। क्या? कितना? कब? कितने का? सब तेरे हृदयपटल पर अंकित रहता था। तुम कितनी विश्वसनीय हो? किसी डॉक्टर और केमिश्ट की तरह तुझे केवल हम दो व्यापारी ही समझते हैं। कभी तुझे जेब में रखकर छाती से लगाया, तो कभी अपने कमर में कचनार की बेल की तरह लपेटता रहा और तू भी कुशल प्रेमिका की तरह चिपके रहती।

जीएसटी आ गया है।

पर्चा आजकल इसे डाक्यूमेंटर कहते हैं, मुझसे खूब ईर्ष्या करता है। उसे भी तेरे मेरे बीच के अवैध सम्बन्धों के प्रति संदेह होता होगा? पर बीच-बीच में मैंने भी सच्चाई की कालर ऊंची कर औनपौने दामों के पक्के बिल बनवाता रहा हूं। कई बार वजनदार प्रलोभन और पुरस्कार भी देता रहा हूं। फिर भी तीन चौथाई तो तुझे ही देता रहा। यह बात अलग है कि मरने-मिटने का ढोंंग करता रहा हूं।

जीएसटी आ गया है।

हे सुखवर्धनी! स्नेहनंदनी! तेरा साथ ना होता तो मैं आठवीं कक्षा में ही पड़ा रहता। कितना जीवन बीत गया। पैंतीस वर्ष होने को है। सेकेंड ईयर कॉमर्स में एक्जामिनर ने मुझसे तुझे झपटा था। मेरी आंखों में रक्त उतर आया था। तब आन्सरशीट में ही मैंने अपना बालपेन गाड़ दिया था। पर्ची, तुझे छीनकर मैं एक्जामिनेशन हाल से बाहर आ गया, तो आज तक किसी एक्जाम में नहीं गया। तेरे साथ आज तक जुड़ा हूं। क्या तेरे समर्पण का तिरस्कार करूंगा? आज तक तेरे प्रेमपाश में बंधा हूं। अब तक जीवन की कई परिक्षायें पास करता रहा हूं।

जीएसटी आ गया है।

हे अल्पांगी! जर्जरावल्ली! तुम मेरे सपनों की परी यथार्थ रूप पर्ची हो। आज मैं, मेरा परिवार, सगे-सम्बन्धी, सारा उद्योग व्यापार वर्ग तेरे पराक्रम की पराकाष्ठा को मानता है। बहुतेरे मेरी सम्पदा और सफलता से जलते हैं। इस समय, मैं अत्यंत विचलित और विघटित हूं। मैं, मेरे कारोबार और सम्पदा को खुली किताब में कैसे लिख दूं? और कैसे शासकीय अधिकारियों, दल्लों की आंख की किरकिरी बन जाऊं? कितने पचड़े और कितने विभाग है यहां, किस-किस का मुंह बंद करूं?

जीएसटी आ गया है।

हे पर्ची! सुपर्ची! श्वेतांगी! तुझ पर काले-नीले पेन से लिखना, मुझे कतई अच्छा नहीं लगता। पर क्या करें हमारी तुम्हारी यही नियति है। मैं परम्परा संवाहक रहा। विश्व के उन्नत देशों में लोगों के वस्त्रों में जेबें तो हैं। अतिरिक्त पर्स भी होते हैं पर कहीं कमर में नोटों की गाठ देखी है? भारत में ही है। हे छिपकली तुम भूत, वर्तमान और भविष्य की स्रोत रही हो, और प्रासंगिक भी। तुझे भुलाना हृदयाघात जैसा ही है। मैं पहले तो लल्ला था, तेरे ही कारण लाला बन पाया हूं, लम्बोदर हो पाया हूं। तुझे बैठे-बैठे प्रणाम।

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हे सर्वव्यापिका पर्ची! तहतहावल्ली! तुम, तुम्हारा समाज बहुआयामी है। सम्बन्धों के संसार में तुम्हारा निरंतर सान्निध्य रहा है। जनजीवन की तरह तुम्हारे भी कई कोण हैं। छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा भी। अतः असहज मत होना। शिक्षा-दिक्षा, भाषाभूषा के कारण तुम्हारे समाज का रूप-लावण्य और मूल्य खूब बढ़ा है। हाई-प्रोफाईल वाले, अनपढ़ भी पर्चियों के दास रहे हैं। उनकी एक-एक पर्ची डायरी का रूप ले लेती है। सिंथेटिक लेदर के कवर में ये पर्चियां तालाबंद हो जाती है। हलकी और खुशबूदार होती है। पर आश्चर्य है कोई दूसरा सूंघ भी नहीं पाता। छूते ही बिजली का झटका लग जाता है।

जीएसटी आ रहा है। (गुड्स एण्ड सर्विस टेरर)

हे पीतवर्णी! स्वीझपथगामिनी! तुम्हारे पास अब बड़े पासपोर्ट वाले भी विकल्प है। अब मेरा सम्बन्ध छूटने को है। पर मैं तुझे आश्वस्त कर देना चाहता हूं कि चाहे जो हो, अपना प्रॉफाईल ऊंचा करो। पढ़ाई करो, ट्रेनिंग लो। सम्बन्धों की डोर मोटी और लम्बी करो। चाहे नकली डिग्री लो। अब किसी लाला कि जेब या कमर में लिपटने के बजाय किसी बड़े बॉस कि डायरी में सिमट जाओ। मैं विवश हूं मेरा साथ यहीं तक समझो। अब एकम्यान में दो तलवारें नहीं रख सकता। क्षमा-याचना के साथ।

और अंत में कठोपनिषद में बाह्य विचारों पर विचरने वाली इन्द्रियों को पराचि कहा है। मुझे पश्चाताप करने दो।

केवल तुम्हारा अपना

लाला रामलाल

जीएसटी एप्लिकेन्ट

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