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हास्य-व्यंग्य // लेट लतीफ़ // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

कौन बनेगा करोडपति (केबीसी) में लाख टके का एक प्रश्न पूछा गया। दुनिया में किस देश के लोग सबसे ज्यादह लेट-लतीफ होते हैं ? चार ऑप्शन दिए गए – ब्रिटेन, ब्राजील, भारत और बंगलादेश। हॉट सीट पर बैठे हुए व्यक्ति का जवाब था, भारत। पूछा गया, आपको यह जवाब कैसे सूझा? उत्तर था, अपने अनुभव से। थोड़ी देर मौन छाया रहा। कुछ देर बात जब मौन टूटा तो बताया गया, मैं भी कुछ ऐसा ही सोचता था, लेकिन यह---“ग़लत” है।

दर्शकों को यह सुनकर बड़ा ताज्जुब हुआ। यदि भारत सबसे ज्यादह लेट-लतीफ देश नहीं है तो भला और कौन हो सकता है ? बेशक भारत में भी और देशों की तरह समय की पावंदी की ही शिक्षा दी जाती है। बच्चों को कहा जाता है कि वे अपने स्कूल ठीक समय पर पहुंचें। दफ्तरों में उम्मीद की जाती है कि, अफसरान आएं न आएं, सभी कर्मचारी नियत समय पर आ जाएं। लेकिन ऐसा होता नहीं है। हम सब चाहते तो ज़रूर हैं कि लेट न हों लेकिन हो जाते हैं। क्या किया जाए ? लेट लतीफी कोई नैसर्गिक और जन्मजात गुण तो है नहीं, इसे तो हमने बड़े जतन और परिश्रम से अर्जित किया है। लेट हो जाने के लिए एक से बढ़कर एक बहाने ईजाद किए जाते हैं। जो लेट लतीफी की आदत अर्जित नहीं कर पाते हैं बड़े घाटे में रहते हैं। एक बार मुझे एक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया। मैं हस्ब-मामूल ठीक समय पर पहुँच गया। लेकिन वहां अभी पंडाल ही लगाया जा रहा था। किसे उम्मीद थी कि मैं वक्त पर पहुँच जाऊंगा ? हमारा देश तो एक ऐसा देश है जहां नेता लोग, लेट लतीफी की बात कौन करे, पहुंचना ही भूल जाते हैं।

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ऐसे में यह सोचना कि लेट-लतीफी में भारत से बढकर कोई दूसरा देश भी हो सकता है, बड़े आश्चर्य की बात लगती है। लेकिन कहा यह जाता है कि भारत नहीं, ब्राजील वह देश है जो अपनी लेट लतीफी के लिए सर्वाधिक विख्यात ही। वहां लेट लतीफी को कुछ इस तरह विकसित कर लिया गया है कि यदि कहीं भूले से भी आप समय से पहुंच जाएं तो आपको अनामंत्रित समझ लिया जाएगा। भोजन के लिए आमंत्रित हैं तो फिर तो समय से जाना और भी गलत होगा। आपको भोजन बन जाने तक का इंतज़ार करना पड़ सकता है। और “भुक्खड़” मान लिया जाएगा सो अलग। लेट-लतीफी वहां की संस्कृति का एक हिस्सा है। वहां का आदर्श वाक्य है – “ज़िंदगी एक ठहराव है।” जल्दी का काम शैतान का। “आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों / हाय हाय क्यों करता है, जीना है बरसों !” लेट आए दुरुस्त आए।

लेट-लतीफी, जैसा शब्द से ही प्रतीत होता है, एक बड़ी नायाब चीज़ है। लेट अंग्रेज़ी का शब्द है जिसका अर्थ है, विलम्ब; और लतीफ़ उर्दू का शब्द है। लतीफ़ का मतलब होता है खुश, ज़िदादिल। यानी लेट होइए और खुश रहिए। जिंदादिली तो लेट होने में ही है। वक्त की पावंदी की बात तो सभी लोग बड़ी गंभीरता से करते ही रहते हैं।

बेशक कई बार लेट-लतीफी हमें खलने भी लगती है। उदाहरणार्थ जब ट्रेन लेट हो जाती है और आप प्लेटफार्म पर बैठे बैठे उकताने लगते हैं तो समय काटे नहीं कटता। किन्तु ऐसे उदाहरण बहुत कम होते हैं और कम न हों तो भी, उन्हें हमें दरकिनार कर देना चाहिए। जो ‘लतीफी’ लेट होने में है, उसका कोई मुकाबला नहीं है। आदमी ने लेट-लतीफी अपने आराम और आनंद के लिए अपनाई है, आविष्कृत की है। उसपर कोई आंच नहीं आना चाहिए।

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लेट लतीफी में जो विलम्ब होता है, उसका सही अंदाज़ लगाना बहुत ज़रुरी है। लेट होने को यदि हम एक अनिवार्य सुकर्म मान भी लें तो भी कितना लेट हुआ जाए इसकी गणना ज़रूरी है। अगर बहुत कम लेट हुए तो लगभग सही समय पर ही पहुँच गए, ऐसा मान लिया जा सकता है। इसी प्रकार इतना अधिक लेट भी न हों कि लोग आपका इंतज़ार करते करते उठ ही जाएं। लेट लतीफी के लिए भी एक विवेक चाहिए तभी वह कामयाब हो पाती है।

कभी एक तुकबंदी सुनी थी –“बड़े बाप के बेटे हैं / जब से जनम लिया लेटे हैं।” लेट-लतीफी का एक बड़ा उदाहरण और कारण भी है। एक मामूली, सामान्य आदमी कभी लेट नहीं होना चाहेगा। लेट होना न होना, उसकी रोटी -रोजी से जुडा हुआ प्रश्न है। लेकिन बड़े बाप के बेटे जिन्हें मुफ्त में ही सबकुछ मिल जाता है, भला लेट-लतीफी की विलासता से क्यों चूक जाएं ? आप ही बताइए !

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद २११००१

2 टिप्पणियाँ

  1. वाह वाह ! कर्मचारियों के लिए तरफदारी की जाए ऐसा आलेख।
    बॉस लोग अपने हमपेशा लोगों को बड़े चाव से पढ़ने के लिए सिफारिश करें ऐसा आलेख। हम खुशमिजाज है पर लेट लतीफी के कारण नहीं, अन्यथा अपनी टिप्पणी सर्वप्रथम कैसे पढ़ पाते आप? आप ही बताइए

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