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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 03 // ओम वर्मा की लघुकथा : रुपए का गिरना : कहीं खुशी कहीं ग़म


प्रविष्टि क्रमांक - 03
लघुकथा
रुपए का गिरना : कहीं खुशी कहीं ग़म
ओम वर्मा
टीवी चैनल से फ़ोन आया है। उन्हें डॉलर के मुक़ाबले लगातार गिरते जा रहे रुपए पर बोलना है।

     हालाँकि वे अर्थशास्त्र के विद्यार्थी कभी नहीं रहे हैं मगर पत्र, संपादक के नाम स्तंभ में लिखते लिखते कब अपने शहर के मिनी नानी पालखीवाला बन बैठे, ख़ुद उन्हें नहीं पता। कुछ आँकड़े, कुछ जुमले और कुछ रटे रटाए शे’र उनकी स्थाई संपत्ति हैं जिनसे उनका काम चल जाता है। वे जानते हैं कि माल कैसा भी हो अगर पैकिंग व प्रस्तुति आकर्षक यानी कलात्मक प्रस्तुति हो तो बाज़ार में उसे हाथो-हाथ लिया जाता है।

     जाने से पहले उन्होंने मन ही मन तैयारी शुरू की। आज वे यह साबित करके रहेंगे कि डॉलर के आगे रुपया हाराकिरी पर उतारू है, इससे देश की अर्थव्यवस्था दम तोड़ चुकी है और लोग आत्महत्या करने के लिए मरे जा रहे हैं। आँकड़ों को अद्यतन किया, कुछ नए जुमले नोट करे और पुराने शे’रों को मन ही मन दोहरा लिया। तैयार होकर निकलने ही वाले थे कि अमेरिका में जा बसे बेटे का फ़ोन आ गया।

“हॅलो पापा!”  बेटे के स्वर में खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी, “एक गुड न्यूज़ है...आज रुपया अभी तक के एक्सचेंज रेट में सबसे टॉप पर आ गया है!”

     बेटे द्वारा रुपए के गिरने को ‘गुड न्यूज़’ बताने पर वे थोड़ा चौंके, फिर बोले “हाँ बेटा, बड़ी चिंता की बात है! मैं अभी उसी पर एक टॉक शो में बोलने जा रहा हूँ।“

“चिंता को मारो गोली पापा! भाषण वाषण तो सब अपनी जगह है पर रुपया जितना गिरेगा, हमें तो  उतना ही फायदा होगा। मैं अभी आपके एकाउंट में  दो हज़ार डॉलर जमा कर रहा हूँ। आपको लगभग एक लाख चालीस हज़ार रुपए तो मिल ही जाएँगे... अभी दूसरा कॉल आ रहा है पापा, मैं बाद में बात करता हूँ!” और बेटे ने फ़ोन रख दिया। बेटे के पास ज़्यादा बात करने का समय अक्सर नहीं होता। वे भी ‘थोड़े लिखे को बहुत समझना’ में विश्वास रखते हैं।

     और वे टॉक शो की तैयारी अधूरी छोड़ निकट के एटीएम में बैलेंस चैक करने निकल पड़े। पहले बैलेंस चैक किया तो आँखें खुशी से चमक उठीं। फिर मिनी स्टेटमेंट भी निकाल ही लिया। रास्ते से मिठाई का डिब्बा लेते हुए घर पहुँचे। घर के देवालय में मिठाई चढ़ाई। मन ही मन कुछ बुदबुदाए। चूँकि उनका ऑडियो बंद था इसलिए पत्नी यह नहीं समझ सकी कि ये रुपए के और गिरने की प्रार्थना कर रहे हैं या उसके मजबूत होने की।

     बहरहाल, कुछ देर बाद वे टीवी स्टुडियो में गिरते रुपए, गिरती अर्थव्यवस्था, मरते किसान आदि पर  दहाड़ दहाड़ कर अपनी बात रख ज़रूर रहे थे मगर हर बार उन्हें गले में कुछ फँसता सा महसूस होता था।
                                                                ***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001













1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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