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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक- 16 // अनोखी का रक्षाबंधन // डॉ (श्रीमती) ललिता यादव

 
प्रविष्टि क्रमांक - 16

शीर्षक - अनोखी का रक्षाबंधन
डॉ (श्रीमती) ललिता यादव
अनोखी बहुत प्यारी बच्ची थी। वह कक्षा दूसरी में पढ़ती थी। वह इकलौती सन्तान थी। उसके पिता की देश की रक्षा करते हुए मौत हो गई थी तथा उसकी माँ को ससुराल वालों ने मनहूस कह कर घर से निकल दिया था। जब वह अपनी सहेलियों को उनके परिवार के साथ देखती तो घर में आकर खूब हंगामा करती कि मेरा परिवार क्यों नहीं है? माँ इस छोटी सी बच्ची को क्या समझाती। वह उसे इधर-उधर की बातों से बहलाने का प्रयास करती। धीरे-धीरे समय बीत रहा था। रक्षाबंधन का समय नजदीक आ रहा था अनोखी बहुत चिंतित थी कि वह राखी किसे बाँधेगी। क्योंकि उसका तो कोई भाई भी नहीं है। वह इस बात को लेकर बहुत परेशान थी।
उसने एक दिन अपनी माँ से पूछा - "माँ मैं किसे राखी बांधूंगी?
माँ ने कहा -" इस संसार में हमारा कोई नहीं है । बस मैं तेरी माँ हूँ और तू मेरी छोटी सी, प्यारी सी गुड़िया है।"
अनोखी ने रोते  हुए कहा -"पर मुझे तो भाई चाहिए, इस बार अगर तूने मुझे भाई न दिया तो तेरी मेरी कट्टी। मैं तुझसे बात नहीं करूँगी।"
अनोखी की बातें हमेशा उसकी माँ के दिल को झिंझोड़ देती थी। इस बार तो वह बहुत दुःखी हो गई। वह ज्यादा सोचने लगी कि किस तरह से मैं अनोखी को समझाऊँ।
अनोखी अब प्रतिदिन अपनी माँ से कहती-"इस बार रक्षाबंधन में यदि भाई न दिया तो बात नहीं करूँगी।"
अनोखी छोटी तो थी शायद इकलौती होने के कारण जिद्दी भी थी। यही कारण था कि उसकी माँ को ये चिंता खाये जा रही थी। धीरे-धीरे अनोखी की माँ की तबीयत खराब होती जा रही थी। इन दोनों का कोई नही था एक दिन जब अनोखी स्कूल गई थी और उसकी माँ की तबीयत इतनी खराब हो गई थी कि बिस्तर से भी नहीं उठ पा रही थी तभी वहाँ उसके घर से दो तीन घर के बाद वाला लड़का रमेश आया। उसने देखा कि अनोखी की माँ कराह रही है। नजदीक जाकर छू कर देखा तो उसका शरीर आग की तरह गर्म था। उसे कुछ समझ न आया कि वह क्या करे। क्योंकि वह खुद पाँचवी कक्षा में पढ़ता था वह दौड़ कर डाक्टर को बुला लाया।
डॉक्टर ने दवा देने के बाद रमेश से कहा -"बिल्कुल सही समय पर मुझे बुला लिये अन्यथा कुछ भी हो सकता था।" अनोखी उस समय स्कूल से घर आ चुकी थी उसने अपनी माँ को देखा तो फफक पड़ी। रो-रो कर उसका बुरा हाल था।
रमेश ने उसे समझाया -"कि तुम्हारी माँ को कुछ नहीं होगा। उनका अब सही तरह से इलाज हो रहा है और जब तक तुम्हारी माँ ठीक नहीं हो जाती मैं प्रतिदिन देखने आऊँगा और हर सम्भव सहायता करूँगा।"
रमेश की बात सुनकर अनोखी को थोड़ी राहत मिली।
अनोखी रमेश को फरिश्ता से कम नहीं समझ रही थी।
अब रमेश रोज अनोखी के घर आने लगा। उसकी माँ की तबीयत भी सुधरने लगी थी। एक दो दिन तो अनोखी स्कूल भी नहीं गई । उसे स्कूल जाना अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि उसकी माँ की तबीयत खराब थी। उसका बाल मन ये सोच रहा था कि अब तो माँ की तबीयत भी ख़राब हो गई अब मुझे भाई कैसे मिलेगा। लेकिन अचानक उसकी आँखें चमक उठी उसे रमेश की सहयोग वाली भावना को देखकर रमेश उसे बहुत अच्छा लगने लगा था। उसके मन ही मन में एक द्वन्द चल रहा था। इसी बीच स्कूल में उसकी मैडम ने एक ऐसा पाठ पढ़ाया जिसमें उसके बाल मन के जो भी सवाल मन में उठ रहे थे उन सबका जवाब मिल गया था। हुआ यूं कि अनोखी की मैडम रक्षाबंधन का पाठ पढ़ा रही थी जिसमें उन्होंने बताया कि भाई वह होता है जो अपने बहन की हर मुसीबतों से रक्षा करता है, बहन की आँखों में आंसू नहीं आने देता। कई दिनो से वह परेशान थी  लेकिन अब वह बहुत खुश थी। वह रक्षा करने वाले भाई के रूप में रमेश को देखने लगी थी।
रक्षाबंधन का दिन भी आ गया। वह रमेश के घर गई तो देखती क्या है रमेश मुँह लटकाये घर मे बैठा है।
अनोखी ने पूछा-"तुम इतने उदास क्यों हो?
रमेश-तुम्हें पता है आज कौन सा दिन है?
अनोखी-"मुझे नहीं तो क्या तुझे पता है आज तो रक्षाबंधन है। उसने चहकते हुए बताया।
रमेश-"अच्छा तो बता रक्षाबन्धन में क्या होता है?"
अनोखी-आज के दिन बहन अपने भाई को राखी बांधती है और भाई बहन की रक्षा करने का वचन देता है।
रमेश-अरे वाह , तू तो बड़ी सयानी है सब जानती है। पर आज तो मेरे हाथ पर कोई राखी नहीं है।
अनोखी ने बड़ी मासूमियत से कहा- "मैं तुमको राखी बांध दूँ। क्योंकि तुम तो मेरा और माँ हम दोनों का ख्याल रखते हो। अगर उस दिन तुम माँ के लिए डॉक्टर नहीं बुलाते तो---! और अनोखी सुबकने लगी।"
रमेश-"रो मत । घर चल माँ को देखना है और राखी भी बंधवानी है।"
अनोखी-"सच।"
दोनों ही जल्दी घर पहुंचे। माँ फिर घबराई हुई थी उसका दिल जोर से धड़क रहा था। वह सोच रही थी कि क्या जवाब दूं पर आज जवाब देना ही नहीं पड़ा। क्योंकि अनोखी को भाई मिल गया था और उसने माँ से कट्टी नहीं की थी। रमेश भी बहुत खुश था क्योंकि उसे भी एक मासूम सी अनोखी बहन मिल गई थी।
                       लेखिका-डॉ (श्रीमती) ललिता यादव




1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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