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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 17 // बहरा है क्या // दीपक दीक्षित

 
प्रविष्टि क्रमांक - 17

बहरा है क्या
रेलगाड़ी बस प्लेटफॉर्म पर लगने ही वाली थी, इसकी उद्घोषणा तो २ मिनट पहले ही हो चुकी थी। अब कुली और खोमचे वाले प्लेटफॉर्म की तरफ जमावड़ा करने लगे जो इस बात का निश्चित संकेत हैं कि गाड़ी सचमुच ही आने वाली थी (उद्घोषणा तो कई बार गलत भी साबित हो जाया करती है) ।
जयंत भी तैयार हो गया जनरल डिब्बे में सवार होने के लिए। उसे किसी भी हालत में आज इस डिब्बे में जगह पानी ही थी ,क्योंकि बड़ी मुश्किल से तीन दिन कि छुट्टी मिली थी और उसे अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए घर पहुंचना ही था नहीं तो अनर्थ हो सकता था। रेंगती हुई गाड़ी का जनरल डिब्बा जहाँ जयंत खड़ा था वहां से ३ फुट की दूरी पर आकर रुक गया। कहने तो पिछले एक घंटे से डिब्बे में जाने के लिए एक लाइन लगी थी पर डिब्बा आते ही लोग अपना धैर्य खो बैठे और लाइन तोड़ डाली। हर कोई सबसे पहले अंदर जाना चाहता था। पर ये क्या ,डिब्बा तो अंदर से बंद था। किसी को शायद इस स्टेशन पर उतरना ही नहीं था। खिड़की के पास बैठे लोगों से बहार वाले लोगों ने बड़ी अनुनय विनय की कि वो उठ कर दरवाजा खोल दें ताकि बाहर से लोग अंदर आ सकें। पर उन्होंने लगता था जैसे कान में रुई ठूंस रखी थी । शायद हर स्टेशन पर आनेवाली भीड़ के वे अभ्यस्त हो गए थे। वे लोग नहीं चाहते थे कि पहले से ही ठुसे हुए डिब्बे में और लोग आयें।
ट्रेन सिर्फ वहां दो ही मिनट के लिए रुकने वाली थी। जयंत भी खिड़की के पास बैठे एक बुजुर्ग से बार बार दरवाजा खोलने का अनुरोध कर रहा था ,पर उसके कान पर जून तक नहीं रेंग रही थी। 'बहरा है क्या? ', हताशा में उसके मुंह से निकला, जिसे उसने अनसुना कर दिया जैसे वो सचमुच बहरा ही हो ।तभी हड़बड़ी में किसी ने दरवाजा खोल दिया था, शायद कोई अभी नींद से जगा था और उसे इसी स्टेशन पर उतरना था। दरवाजे में जगह होते ही जयंत ने अपनी कोहनियों से आजू-बाजू वाले लोगों को पीछे धकेल दिया और अपने बलिष्ठ शरीर को जैसे तैसे अंदर पहुँचाने में कामयाबी पा ही ली। जयंत के साथ बस एक और व्यक्ति ही अंदर जा सका था कि किसी ने फिर से दरवाजा बंद कर दिया।
अंदर पहुंचकर जयंत खिड़की के ही पास किसी तरह बैठने में भी कामयाब हो गया। अब बाहर के लोग दरवाजा खोलने के लिए गुहार लगा रहे थे। एक मूंछों वाले देहाती ने जोर से चीख कर जयंत से कहा, 'बहरा है क्या?'
जयंत को लगा कि वो सचमुच बहरा हो गया है, और तभी गाड़ी रेंगने लगी ।

दीपक दीक्षित
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निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन
संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।
पढ़ने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।
भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा पांच साँझा-संकलन प्रकाशित हुए हैं ।
कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया। अमृतधारा संस्था ,जलगॉंव द्वारा 'अमृतादित्य साहित्य गौरव' सम्मान प्रदान किया गया (२०१८).
वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी,कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।
साहित्य के अनेकों संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।
साँझा-संकलन
संपादक का नाम
पुस्तक का नाम
विधा
प्रकाशक
डा. डी. विद्याधर
हिंदी की दुनियां ,दुनियां में हिंदी
निबंध
मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद
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साहित्य कलश प्रकाशन , पटियाला












































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