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लघुकथा // हलवे की खुशबू // गीता द्विवेदी

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लघुकथा

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ओ कला !!! कहाँ हो तुम ?  कब से आवाज दे रही हूँ । गली में चूड़ीवाला आया है । सुन्दर - सुन्दर चुड़ियाँ सजा रखी हैं उसने !  बड़बड़ाती हुई शकुन्तला देवी सीढ़ियों की ओर लपकीं । शायद अपने कमरे में होगी , कहते हुए उसके कमरे तक पहुँचीं । अभी फिर आवाज लगाने ही वाली थी कि कला की सिसकी सुन ,सहम सी गईं । सहसा उन्हें खयाल हो आया कि  कला के इकलौते भाई की , एक सड़क दुर्घटना में हुई मृत्यु को अभी एक महीने भी पूरे नहीं हुए थे । ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार , उसके लिए दुखदायी तो होगा ही । और मैं !  अपने भाई की धुन में, ये क्या करने जा रही थी ..... क्या मैं स्वार्थी सास हूँ ... क्या मेरे अन्दर की सम्वेदना मर चुकी है ?....नहीं , नहीं ... ऐसा नहीं हो सकता । मैं कला की सास ही नहीं माँ भी हूँ । उसकी पीड़ा , मेरी पीड़ा है । जाती हूँ , उसका मनपसंद मूंग का हलवा बनाने। दोनों साथ बैठकर खाएंगे तो उसका मन दूसरी ओर लग जाएगा । ऐसा कहते हुए शकुंतला देवी रसोईघर की ओर चल दीं  । इधर कला अब चुप हो गई थी । शायद ' हलवे की खुशबू ' ने उसका ध्यान भंग कर दिया था और सासू माँ के काम में हाथ बटाने को चल पड़ी थी , रसोई की ओर .......।

गीता द्विवेदी

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