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प्रेस संघ की मीटिंग और काजू शराब बिरियानी व्‍यंग्य - आत्‍माराम यादव

यह हमारे नगर का प्रेस संघ है। पहले यह काफी सशक्‍त और चरित्रवान धुरन्‍धर पत्रकारों के कारण पहचाना जाता था, अब पदलोलुपता के दीवानों के कारण बंट गया है। मुझे याद है 20-22 साल पहले इसके गठन की पहली बैठक रेस्‍टहाऊस में हुई थी तब परसाई मुझे वहाँ लेकर गया था तब मैं साप्‍ताहिक अखबार का संपादक था। तब मुझे भले लोगों से दो दो बातें करने के बाद भी बुरा नहीं लगा था जो अब लग रहा है। आज माहौल बदला हुआ है और प्रेस संघ की नींव डालने वाले भले लोग पदच्‍युत होकर अपने घरों में बुरा महसूस कर रहे हैं लेकिन वे मजबूर है और आज के लोगों से खुद को असहाय बना चुके हैं। आज के लोग उनके लिये भस्‍मासुर बन चुके हैं। पहले प्रेस संगठन के बैठक कक्ष में विभिन्न पत्रिकायें और अखबार बिखरे होते थे पर आज आलम उल्‍टा है। अब कमरे के फर्श पर सिगरेट के टुकडे फैले होते हैं। टेबिल पर बीयर है, रम है। व्हिस्‍की है। जिम है। चने की प्‍लेटें होती हैं। काजू सजे होते हैं और बिरियानी की महक से लोगों की लारें टपक पड़ती है।

आज प्रेस संघ की बैठक है। एक अधिकारी ने व्‍यवस्‍थायें अरेंज की है। सभी सदस्‍यों के सामने गिलास रखे है। बर्फ, सोड़ा, काजू- नमकीन। आमलेट। उबले हुये अण्‍डे और चने संजोये गये है ताकि अपनी-अपनी च्‍वाईस के हिसाब से एन्‍जाय कर सके। आज से पहले ऐसी शानोशौकत की बैठकें नहीं हुई थी और न ही ऐसे शौकीन मिजाज रहते थे। आज लोगों को सब कुछ झकास लगता है और पहले के लोगों के नीरस जीवन पर उन्‍हें तरस आता है। पहले के लोग घरों की चार दीवारी में इसका ऑखों देखा हाल सुन-पढकर शर्म से गढ़े है ,परन्‍तु बुरा भला समझते हुये इस बुराई से पंगा लेने का साहस नहीं कर सके है। गिलासों में व्हिस्‍की उंड़ेली जा रही है। कुछ प्‍यादे एक दो पैग पीकर गंभीर हो गये है। काजू खाने वाले बिरयानी को झपटना चाहते हैं परन्‍तु बीच में ही मिस्‍टर झपोडे कह उठते हैं, यार अभी पी भी नहीं और बिरयानी खाकर क्‍या पेट भरोगे। मिस्‍टर सोनानी अपने बेड़ोल शरीर की तोंद पर हाथ फेरते हुये व्हिस्‍की का आर्डर देते हैं और खुद बर्फ के छोटे बड़े टुकडे़ अपनी गिलास में डालते हैं। मिस्‍टर बड़बोले सिगरेट सुलगाकर धुंए के गहरे कश छोड़ते हुये छल्‍ले बना रहे हैं। व्हिस्‍की भरे गिलासों में बर्फ के टुकड़े के बीच सुनहलापन नजर आता है। उस सुनहलेपन में मिस्‍टर सागर दूसरा ही दृश्‍य देख रहे हैं।

देश प्रदेश में जाने कितनी समस्‍यायें सिर उठाये खड़ी है। नैतिक पतन की इंतहा हो गयी और रोज मासूम बच्चियों की अस्मितायें लूटकर उनकी हत्‍यायें करने के समाचार किसी के भी दिमाग को झकझोरते नहीं दिखते और ऐसी अमानवीय घटनायें रोजमर्रा के जीवन में जुटती जा रही है। पाक की नापाक हरकतों और आतंकवाद भारत की अस्मिता को लहूलुहान किये हुये है और हमारे देश के सैनिक उनके कुचक्रों को तोड़ते हुये अपने प्राण न्‍यौछावर करने से पीछे नहीं हटते हैं। देश में राजनैतिक हलचले तेज चल रही है और सत्‍ता पाने की होड़ में नेताओं का चाल, चरित्र और ईमान ढूंढे नहीं मिलता । कल जिनके कंधे सागोन के गुल्‍ले लेकर पुलिस को देख गलियों में सरपट दौड़कर चकमा देते थे, जिन्‍होंने हरे भरे जंगलों को विनाश कर दिया, वे सभी देखते देखते सफेशपोश जेंटलमेन हो गये। जिनकी कच्‍ची शराब भटटी से जाने कितनी जाने गयी वे सत्‍ताधारी के करीबी होने से नगर के लब्‍ध प्रतिष्ठित सेठ हो गये। ।चोर उचक्‍के साहूकार बनते गये और उनका दबदवा ऐसा छाया कि वे 10 प्रतिशत से जुये खिलाने पर कर्ज दिलाकर अनेकों लोगों के मकानों दुकानों का दाव लगाकर वे शहर के अधिकांश मकानों के मालिक हो गये। जिनके मकान इन सफेदपोश साहूकारों ने कब्‍जाया वे आत्‍महत्‍या कर मौत को गले लगाते गये, कई तो शहर छोड़कर भाग गये। । यहाँ जनता की सेवा के लिये कोई नेता आया नहीं जो भी आया, अपने काले कारनामों को छिपाने के लिये, अपनी सम्‍पत्ति बनाने के लिये आया। शहर पिछले 70 सालों में जैसा था वैसा ही रहा बस एक बदलाव आया कि ओव्‍हरब्रिज बन गया और गरीबों की जमीनों पर पैसेवाले सेठ और उनके चहेते कालोनियॉ काटकर अपनी तिजौरी भरते रहे,जिसे ही यह नेता विकास की बातें कहते रहे और सभी जान समझ चुके है कि यह विकास कागजी है,। ।मंदिरों की जमीनों पर पुजारियों ने बाहर से अपने रिश्‍तेदारों को बुलाकर बिठा दिया, देखते देखते शहर के कई मंदिरों की बेशकीमती जमीनों पर कालोनी कट गयी, प्‍लाट बिक गये, कलेक्‍टर अध्‍यक्ष रहते मौन रहे, शहर की इन जमीनों का पैसा पुजारियों ने दूसरे शहरों में जमीन खरीदने में लगाया, पर जिन समाज के लोगों ने मंदिर के लिये जमीनें दी वे आज तक उन मंदिरों में सरवराकार नहीं बन सके, जिसमें कभी उनके पूर्वज हुआ करते थे, जिन्‍हें छलपूर्वक मंदिर के पुजारियों ने तथाकथित संत-महंतों ने हटाकर खुद को सरवराकार बनाकर इन बेशकीमती जमीनों को हथिया लिया है। नेता जनता को बड़े बड़े झूठ को खूबसूरती से बोलकर बरगलाने में सफल होता दिखता है।

शहर के सभी मोहल्‍लों में पीने का पानी का संकट है, नालियॉ नहीं है, सड़कें नहीं,,शौचालय नहीं है, प्रधानमंत्री आवास में हितग्राहियों को मोटी रकम चढ़ोत्‍तरी में देने के बाद चप्‍पले घिसाकर लाभ मिलता है, पर जैसे देश सोया है, वैसे ही मीडि़या सो गया है। हमारे प्रेस संघ के सदस्‍यों को महापुरूषों की जयंती मनाने में प्रतिस्‍पर्धा करने में मजा आता है , कुछेक को छोडकर बाकी सभी का सच यही व्हिस्‍की है, रम का सुनहरा रंग सच है। काजू बिरयानी सच है। नमकीन सच है लेकिन सब कुछ जानते हुये पूरा प्रशासन चापलूसी से बाज नहीं आ रहे हैं। पर अपनी अपनी राजनीति चलती रहे, अपने अपने कारोबार सलामत रहे, अपना कारोबार दोड़ता रहे इसलिये अधिकांश ने अपने जमीर को गिरवी रखकर शहर की बड़ी बड़ी कालोनियों में ऊंचे ऊंचे आशियाने बना लिये। प्रेस का आकर्षर्ण ही ऐसा है कि कुछ सेवानिवृत्‍त अधिकारियों के बेटे अपने बाप की जीवनभर की सेवा पर ऊंगली न उठे इसलिये, कुछेक जिम्‍मेदार अधिकारियों के बेटे उनके भ्रष्‍ट कारनामों की चर्चा न छपे इसलिये, कुछ नेताओं के करीबी तो कुछ पार्टी के जिम्‍मेदार पदाधिकारी भी प्रेस की नौका पर सवार होकर वैतरणी पार होने आ धमकें है। कुछेक जिनकी चादरें दागदार है, कोई कीचड़ न उछाले ऐसे कुछ नाकदार व्‍यूरो चीफ, स्‍ट्रंगगर,इलेक्‍ट्रानिक चैनलों के प्रतिनिधि बनकर, अखबारों में जिन्‍हें लिखना नहीं आता दूसरों की रिपोर्टों को - प्रेस नोट छप जाने पर झट अधिकारियों के व्‍हाटसअप ग्रुप पर शेयर कर खुद रिलेक्‍स और हैप्‍पी महसूस करते हैं। सिक जोक्‍स। बियर की बोतलें, जिनका स्‍माल पैग, रम का लार्ज पैग, तले मसाले वाले चने। वे नौजवान है अपनी थकान मिटा रहे हैं। उनमें बातें होती है चारों और फैले भ्रष्‍टाचार की। कुछ सूचना के अधिकार के तहत सच्‍चाई बाहर लाते हैं पर सच जनता तक न पहुंचे इसकी मुंहमांगी कीमत मिलते ही, भ्रष्‍टाचार का सच दब जाता है। रक्षक सितम ढ़ा रहे हैं और कानून व्‍यवस्‍था पूरी तरह अपराधियों व राजेताओं की मुटठी में कठपुतली बन नाच रही है। गरीब बेहाल है। आफिसों में जनता के काम नहीं होते ,सभी ओर दलाल ही दलाल है ,पैसे खाये बिना बाबू फाईल नहीं सरकाता है। पुलिस चोर साथ बैठकर रमी खेलते हैं। शराब माफिया गुण्‍डों की फौज गली कूंचों में आंतक मचाये है परन्‍तु किसी की हिम्‍मत नहीं की इनकी खबरें छाप सके । हिम्‍मत उनमें है जो ईमानदार है। जो समाज और देश के प्रति अपने फर्ज को समझता है ऐसे बिरले ही लोग रह गये है। अच्‍छे और न बिकने वाले लोगों पर झूठे प्रकरण लादकर उन्‍हें लिखने से रोका जाता है। सरकार का पूरा तंत्र इसमें लग जाता है परन्‍तु प्रेस संगठनों में ऊंचे पदों पर आसीन रहकर ऊंचे लोग कभी इनके विषय मे सोचते तक नहीं, वे इन्‍हें अछूत समझते हैं। मजे में वे होते हैं जो सुबह शाम थाने की डयोडी पर हाजिर रहकर थानेदार के लिये मुखबिरी करता है और ऐसे लोग माल सूतकर अपना सीना फुलायें घूमते हैं जबकि ऐसे घिनौने लोगों का दर्जा पूरे समाज में अछूत जैसा हो जाता है, पर लोक मर्यादा के रहते सभी जुबान बंद कर बैठ जाते हैं।

सागर को गहरी सोच में डूबा देख धर्मा ने झकझोरा, बोला यार तुमने खाना खा लिया क्‍या। उसने न में सिर हिलाया। धर्मा बोला मैंने तो खा लिया और मैं चलता हूं और वह अपनी साईकिल की ओर बढ़ा, पता नहीं क्‍यों सागर को भी यह सब रास नहीं आ रहा था और वह भी अपनी स्‍कूटर की ओर बढ़ा तभी व्हिस्‍की शराब में खोये खाना खा रहे चाचा ने आवाज लगायी, अरे बिना खाये क्‍यों जाते हो, थोडा कुछ ले लो। तब वहाँ का नजारा अलग था जो कुछ समय पहले घर से आये थे, जो देश की, समाज की सोच के परोकार थे, उनका फर्ज और ईमान खिड़कियों, दरवाजों के शीशे को बीयर की बोतले फैककर तोड़ चुका था। जो कह रहे थे कि उनके काम धन्‍धे पर चोट न पहुंचे, उनके हित उनके कारोबार का संरक्षण मिले,वे अब एक दूसरे की कमिया बता रहे थे, कौन किसके तलवे चाटता है, कौन पर किसका हाथ है, कौन घिनौने खेल में लगा है यह सब बातें उन व्हिस्‍की, रम के पैगों से हजम नहीं हो पा रही थी और लोग एक दूसरे को नंगा करने में जुट गये। कुछ हाथापायी पर उतर आये, बैठक रूम में दरवाजे और खिडकियों के कांच ही कांच थे और यह शहनशाही व्‍यवस्‍था जुटाने वाले नगर कोतवाल के कर्मचारी कमरे में कांच समेट रहे थे, खाने की प्‍लेटें फेंकने से फर्श पर बिखरे खाने को झाडू से साफ कर रहे थे। नगर कोतवाल एक ओर खड़े यह नजारा देख रहे थे, जिन्‍हें खुदका होश नहीं था, वे उनके चरण स्‍पर्श कर घर जाने की बात कहकर निकलते देखे गये। इस बैठक में चर्चा होनी थी जनता पर हो रहे प्रशासनिक शोषण की, दलालों के चल रहे कमीशन की । आखिर यहाँ उपस्थित हुये लोग इन्‍हें छापते क्‍यों नहीं, पर जो लोग अपने अखबारों में जिनका मेटर और फोटो छापकर अपने स्‍वार्थ की स्‍कीमों से निकलने वाला क्रीम चाटने के आदि रहे हो, आज उनका सच देखने काबिल था। पहली बार ऐसा हुआ कि इसके न तो फोटो खिचे और न ही रिकार्डिग हुई, पर नगर कोतवाल ने दो लोगों के हाथ जोड़कर कहा भैया इन कमरों में जितने कांच टूटे है सुबह लग जायेंगे, पर इसकी खबर न आये तो उम्‍दा बात होगी, पहली बार ऐसा हुआ उन दोनों ने जो सारा सच लाते थे, इस सच से पाठकों को वंचित रखा।

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