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व्यंग्य // सारे रावण बिक गये / सुरेश खांडवेकर

सारे रावण बिक गये

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सुरेश खांडवेकर

संयोजक

अब नुकड़ियां नेताओं और प्रसिद्धि की लालच वाले उद्यमियों और व्यापारियों की ओर से रामलीलायें आयोजित हो रही हैं। यहां कोई राम चरितमानस का ज्ञाता या वाल्मीकि रामायण का कोई विद्वान दिखाई नहीं देता। हां, भूमिपूजन के मुर्हुत के समय और नवग्रहों के शान्ति के लिए पण्डितजी अवश्य होते हैं। देश में चारों ओर अब ऐसे ही उदात्त व्यापारसेवी और जमघटनायक अपने मंत्रीयों, नेताओं को अपनी भीड़खींचाऊ प्रतिभा दिखाते रहते हैं।

यहां विशेष अतिथियों के लिए पुष्पमालाओं और गुलदस्ते के अतिरिक्त डाले भरे होते हैं। ऐसे ही स्मृतिचिन्हों के बक्से।

भारत में अतिमहत्वपूर्ण अतिथि नियत तिथि पर तो आता है पर उसका समय अनिश्चित होता है। सम्भवतया भारतीय रेल ने इन्हीं से प्रेरणा ली हो। अतः रामलीला का मंचन रोक कर उसका स्वागत किया जाता है। अतिथियों में मंत्री, नेता या अधिकारी वर्ग होते हैं। इनके साथ बंदुकधारी पुलीस सिक्योरिटी भी होते हैं। इससे कार्यक्रम एक विहंगम दृश्य में बदल जाता है। इनके साथा पाच-दस अनुयायी या चेले भी होते हैं। इस तरह रामायण का रूका हुआ मंचन स्वागतायण में बदल जाता है।

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आयोजक कार्यकर्ताओं की रामलीला अब गौरवलीला में बदल जाती है। पहले बैठे दर्शकों में से कुछ उठ जाते हैं। वीवीआई के सोफे पर नये दर्शक आ जाते हैं उनमें कुछ विशिष्ठ नेताओं के गले में हार डालने के अधिकारी भी होते हैं।

महत्वपूर्ण व्यक्ति का यहीं पर अतिमहत्वपूर्ण होना घटित होता है। इससे आयोजक अपनी सूझबूझ का परिचय भी देता है और अपनी पहुंच के लम्बे तार भी दिखाता है।

सार्वजनिक कार्यक्रमों में कोई मंत्री, नेता या महत्वपूर्ण व्यक्ति समय पर आ जाये, तो बड़ी फजीहत भी होती है। हड़कम्प भी मच जाता है। इसलिए मुख्य अतिथि अनिश्चित समय पर आकर, अपना सुनिश्चित स्वागत करवाता है। अपने सम्बोधन के दो शब्दों में बीस आयोजकों के नाम ही दो सौ शब्दों में लपेटते हुए बधाई देकर चले जाते हैं।

ऽऽऽ

आयोजक

अब मोबाईल से फोटो खींचना आसान, डिजाईन डिस्पले करना आसान, पोस्टरबाजी भी आसान हो गयी है। ­फ्रलेक्स में रामलीला कमेटी के 40-50 नाम और चेहरे आप खोजते रह जाओगे। आसानी से दिखते ही नहीं, इसलिए हर एक फोटो वाला कार्यकर्ता रामलीला के कार्ड बांटते हुए अपना फोटो भी दिखाता है। अनिल गुप्ता भी इसी तरह जनसम्पर्क करता है।

‘मैं भी कमेटी में हूं। फोटो बाद में दी, इस वजह से मैं बीच में फंसा हूं।’ अनिल गुप्ता।

‘वहां क्या-क्या है रामलीला के अलावा?’

‘छः किस्म के झूले, 5 खड़खड़ाती गोल चक्कर काटने वाली रेले।’

‘और?’

‘पहाड़ी फिसलन! बड़ी गजब की है।’

‘और?’

‘उछलकूद कुआं छोटे बच्चों के लिए।’

‘और?’

मेला तो मेला है। मेले के बाहर सड़क पर 50-60 ठेलेवाले दुकान हैं- गुब्बारे, पूंगी, बांसुरी, मेले के साथ वाले मैदान में गोलगप्पे, टिक्की, कुल्फी, मुंगफली, तीर-कमान, गदा, गुब्बारे, गंगाजल, गेंद, त्रिशूल, तलवारें, बच्चों के निशानबाजी बंदूक की और रिंगवाली।’

‘और’

‘खाने-पीने के चीजें हैं। पंडाल के बाहर भी, और पंडाल के भीतर भी। पंडाल के बाहर खाने-पीने के छोटे-छोटे स्टॉल है। पंडाल के भीतर 2 बड़ी स्टाले हैं। बहुत बड़ी। देखकर दंग रह जाओगे। दोनों के पास 5-5 सोफे, 10-10 टेबलों और उसके साथ 4-4 कुर्सियां हैं। दोनों के पास 30-30 आईटमें हैं।’

‘और?’

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‘और आप आपकर देखो?’

आप खाते-खाते रामलीला भी देख सकते हो, आपको वीवीआईपी पास दे रहा हूं।’

‘और खाना कैसे हैं?’

‘दोनों तरह का। व्रत का भी और बिना व्रत का भी।’

‘खाने की थाली कितने की है?’

‘पंडाल के बाहर तो 100 रुपये की है। पंडाल के भीतर 300 रुपये की थाली है।’

ऽऽऽ

समालोचक

अनिल गुप्ता के आग्रह पर रावण के मरने के दो दिन पहले विजयपाल और रामपाल, पीतमपुरा, दिल्ली के रामलीला मैदान की ओर निकल पड़े।

रामपाल ने विजयपाल से पूछा, ‘उस दिन तो डा. हर्षवर्धन राजा जनक बने थे, इतना टाईम मिल जाता है इनको?’

‘टाइम तो निकालना ही पड़ता है। यह भी एक लोककल्याण का काम है, यहां कोई पत्थर तो लगना नहीं है। पर पूरे देश में सुर्खियों में आ गये डॉक्टर साहब! राजा जनक याद रहे ना रहे, डाक्टर हर्षवर्धन राजा जनक बने थे यह सबको याद रहेगा।’

‘छोड़ों इन बातों को, भीड़ देखकर नेताओं को पेट्रोल और डीजल से भी ज्यादा ऊर्जा मिलती है।’

‘पर ये तो कभी निषादराज बनते हैं, कभी विभीषण, कभी जनक और कभी विश्वामित्र ही बनते देखे हैं। कुम्भकरण क्यों नहीं बनते?’

‘ये उनसे भी ऊपर उठ गये हैं, कुम्भकरण तो छः महीने में एक बार अवश्य जागता था, ये पांच साल में एक बार जागते हैं।’

‘रावण भी तो बने कोई नेता?’

‘रावण तो सिद्ध अभिनेता ही बन सकते हैं। कब? वो भी कास्टयूम ओढ़ने के बाद। इन्हें तो इसकी भी जरूरत नहीं पड़ती। वो दशानन था ये तो सहस्त्रानन हैं। फिर भी, कहां पंचवटी और कहां श्रीलंका? जब आस-पास ही इतना सब कुछ उपलब्ध है तो इतने दूर, और वो भी हिन्द महासागर पार? इतनी दूर क्यों जाये?’

‘फिर रावण बनने में क्यों संकोच करते हैं?

‘छोड़ो यार किसी भी समाचार पत्र को खोलो दस-बीस रावण तो रोज दिखाई देते हैं, ‘सावधान इंडिया’ और ‘क्राईम पेट्रोल’ तो समाज की रोज पोल खोलते हैं।’

‘पोल खोलते हैं या बढ़ावा देते हैं। अपना-अपना विचार है।’

ऽऽऽ

प्रायोजक

चौराहे से लगे मैदान में रामलीला का आयोजन था। दो सड़कों की दिखाएं तरह-तरह के ऊंचे-नीचे फ्रलैक्स बोर्डों से सीमाबद्ध थी। यहां संस्कृति के झरोके से व्यापार और राजनीति फल रही थी। शेष, कई लाभ गर्भित थे। कुछ धार्मिक नेताओं ने श्रीराम के विराट चित्र लगाये थे किन्तु फ्रलैक्स बोर्ड की भीड़ ने उनका आधा शरीर दबा दिया था। दो योगाचार्य के भी चित्र थे किन्तु वे पोस्टर के दर्प में केवल कपालभाटी कर रहे थे। उन पर शिक्षा संस्थाओं के बोर्डों ने आसन जमाया था। चार-पांच जगह अलग पार्टियों के नेताओं के साथ स्थानीय कार्यकताओं के चेहरे थे। वे एक साथ चार-पांच त्योहारों पर अभिनंदन और शुभकामनायें दे रहे थे। जैसे, ‘नवरात्रि, दुर्गापूजा, दशहरा, दीवाली और छठ पूजा मंगलमय हो। ये बोर्ड अलग-अलग भंगिमाओं में लटके हुए थे। किन्तु उसी तरह शुभकामनायें बांट रहे थे। इसके अरिक्ति प्रायोजकों के विज्ञापनों से प्रवेश द्वार अटे-पटे थे।’

दर्शक

गुप्ताजी के आग्रह से मेले में हो आये, बड़ी भीड़ थी, कैकई भरत के हित में महाराजा दशरथ से दो वर मांगने के लिए बिफर रही थी। भीड़ का अपना शोर था। खान-पीने के स्टॉल में अलग चहल-पहल थी, आपसी बातें भी समझ नहीं आ रही थी। प्रोजेक्टर में भी रामलिला का चलचित्र दिखाई दे रहा था। पर कुछ समझ नहीं आ रहा था।

आधे से ज्यादा लोग बाहर मैदान में बच्चों के साथ खेल रहे थे। युवा दम्पतियों को बाहर निकालने का सुखद अवसर मिला था। वे अपने बच्चों को खेलते-कूदते देखना चाहते थे। इसलिए कुछ बच्चों के फोटो ले रहे थी, कुछ सेल्फी में व्यस्त थे। क्योंकि अधिकांश लोग सज-धजकर आये थे।

एक सामान्य स्टॉल के पास विजयपाल रूका और उसकी मनोरंजक सस्ती चीजें देखने लगा। 15-20 चीजें थी, कई शृंखला मे थी जो 10 रुपये से 50 रुपये की मूल्य की होगी। जिसमें कई तरह के बांस और प्लास्टिक के तीर-कमान, मुकुट, रामदरबार, हनुमानजी की गदा, त्रिशूल, गुब्बारे, मिट्टी और प्लास्टिक के देवी-देवता, दिये, मोमबत्तियां आदि चीजें थी। सारी कलात्मक चीजें देखने में मन लग रहा था।

एकाएक उससे पूछा, ‘भाई सामान तो बहुत बढ़िया है पर रावण तो दिखाई नहीं दे रहा तुम्हारी दुकान में?’

उसने कहा, ‘सबसे ज्यादा रावण लाया था, सब बिक गये, सिर्फ राम, लक्ष्मण, और उनके तीर-कमान, चार-पांच हनुमान जी गदे, गुब्बारे और गेंद बचे हैं।’

उसकी बात सुनते ही ध्यान आया है देश में रावणों की डिमांड ज्यादा है। दो दिन पहले दिल्ली के प्रसिद्ध समाचार पत्र में लिखा था, ‘इस बार दिल्ली में रावण की कमी खलेगी।’

पढ़कर माथा ठनका। विस्तार में पढ़ा तो उसका सार था दिल्ली में रावणशिल्पियों के पास पर्याप्त स्थान नहीं रहा।

किन्तु यहां मेले में तो दूसरा ही अनुभव हुआ। छोटे रावणों की भी मेले में डिमाण्ड ज्यादा है।

फिर भी उससे कहा, ‘अरे बच्चों को राम, लक्ष्मण, हनुमान के खिलौने क्यों नहीं बेचते?’

‘बच्चे मांगे तो सही। जो खिलौने बच्चे मांगेंगे हम तो वही लायेंगे।’

इतने में अनिल गुप्ताजी वहां आये। अभिवादन के बाद उन्होंने आग्रह किया, ‘आओ लीला देखें....।’

‘नहीं, अब नहीं। हो आये वहां से। बड़ी भीड़ है।’

‘अरे छोड़ो आओ मेरे साथ, अभी भाजपा अध्यक्ष, मनोज तिवारी आने वाले हैं। कल सिसोदियाजी आये थे। आपसे स्वागत कराऊंगा।’

‘पर कब आयेंगे?’

‘घंटे एक भर में। पर आयेंगे जरूर। हमने सपना चौधरी से भी समय मांगा था, लेकिन उसकी डेट खाली नहीं थी।’

‘रामलीला में सपना चौधरी की क्या जरूरत है?’

‘भाई साहब दिल्ली टूट पड़ेगी।’

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सुरेश खांडवेकर

ए-4, सदभावना अपार्टमेंट, पीतमपुरा, दिल्ली - 110034

ईमेल : sureshkhandwekar@gmail.com

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