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लघुकथा // दो फ़ोटो // कैलाश चन्द्र

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अभि को 5 साल हो चुके है इस नौकरी को करते हुए पर वो कभी ये फैसला नहीं कर पाया कि ये कितनी सही है, अपने घर से दूर कही ग्रामीण अंचल में नौकरी करना उसे बिलकुल भी सही नहीं लगता था, सबसे ज्यादा तो उसे गाँव की देहाती बोली से परेशानी होती है बच्चों में बिलकुल भी बात करने की तहजीब नहीं है चाहे जो बोल देते है कुछ भी सोचते नहीं हैं.

पर उसकी भी मजबूरी है कि वो ये नौकरी छोड़ नहीं सकता है, उसके लिए ये ही एक मात्र सहारा है, बड़ी ही मुश्किल से ये मिली थी, पर अब ये उसे इतनी रुचिकर नहीं लगती है जितनी शुरू में लगती थी पर सब बस ऐसे ही चलता रहा है , अभि की एक कमजोरी थी वो जब बच्चों के बीच में होता तो सब भूल जाता है , उसे फिर कुछ याद नहीं रहता है उसे सिर्फ बच्चों को पढ़ाने का ही जुनून रहता है फिर वो क्या सोचता है ये उसके काम पर असर नहीं डालता था, पर दिल में जो शहर में रहने का विचार था वो निकलता ही नहीं था.

जब कभी वो इस विषय में सोचता तो उदास हो ही जाता था, पर एक दिन जब वो पास के शहर में किसी काम से गया तो वहाँ उसे अपना पढ़ाया हुआ एक स्टूडेंट श्रीकांत मिल गया जो अब 12 वीं में पढ़ रहा था, अभि ने उसे पहचान लिया था और उसकी पढ़ाई के बारे में भी पूछा, श्रीकांत जब 8 वीं में था तब उसने वो स्कूल छोड़ दिया था पर आज अभि सर से मिल कर श्रीकांत भावुक हो गया और अपने एक साथी को अपना मोबाइल देकर सर के साथ एक फोटो खींचने की कहने लगा, अभि को इसकी कोई उम्मीद नहीं थी कि कोई स्टूडेंट उसके साथ ऐसा भी कर सकता है, एक फोटो पैर छूते हुए भी खींचा गया.

शाम को घर आकर अभि आज की इस घटना के बारे सोच रहा था कि वाकई में उसने सही काम किया है इन 5 सालों में या नहीं कही उसने कोई गलती तो नहीं की, ये सोच कर की एक बेकार से गाँव में क्या किया इन 5 सालों में, उसे अब किसी और चीज़ की जरूरत नहीं थी ये दो फोटो ही काफी है उसके अगले 5 -10 सालों को निकालने के लिए ।

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