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व्यंग्य // हमें भी गुस्सा आता है! // डॉ प्रदीप उपाध्याय

कभी रूपहले पर्दे पर दिखाया गया था कि अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूँ आता है। आज के दौर में दृश्य-श्रव्य और प्रिंट मीडिया के साथ सोशल मीडिया पर भी जोर शोर से यह बात कही जा रही है कि गुस्सा आता है । ठीक है गुस्सा आना भी चाहिए। लेकिन शर्त यही है कि वह बनावटी न हो। यहाँ जो गुस्सा दिखाया जा रहा है उसको देखकर पूछने वाले पूछ रहे हैं कि क्या वास्तव में गुस्सा आता था! या फिर यह गुस्सा जो आ रहा है वह कुछ दिन का ही मेहमान है!

यह गुस्सा तो वास्तव में उस तरह का होना चाहिए जिसमें कहा गया है कि रातभर का है मेहमां अंधेरा, किसके रोके रूका है सवेरा। ...तब तो ठीक है कि अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर बढ़ने के लिए हो यह गुस्सा किन्तु प्रश्न वहीं आकर ठहर जाता है कि रात के अंधेरे को जुगनुओं की रोशनी दिखाकर सवेरा होने की बात कही जाए तो  मूर्खता का पैमाना इतना भी कमजोर नहीं कि आटा खाने वाला इसे समझ ही न पाए। वह चारा तो खाता नहीं है। चारा खाने वालों की हालत किसी से छूपी भी नहीं है। अब तो उन्हें भी केवल अपने आप पर ही गुस्सा आता होगा। वैसे आज जिन बातों को लेकर उन्हें गुस्सा आ रहा है, यदि यह गुस्सा वे पहले ही कर लेते तो गुस्से वाली बात ही कहाँ रह जाती!

किन्तु बात यह भी कि गुस्से के लिए आदमी को फुर्सत भी तो मिलना चाहिए। पहले कभी कुछ सोचने-विचारने का समय मिला हो तभी तो गुस्सा किया जा सकता था। अभी तो समय ही समय है!जिनके पास आज समय नहीं है, वे भले ही आज व्यस्त हों,व्यस्ततम रहें,कल नहीं तो परसों फुर्सत में होंगे, तब वे भी गुस्सा दिखाएंगे लेकिन इनका गुस्सा रंग बदलने वालों के जैसा ही कहा जाएगा और इसीलिए ज्यादा सीरियसली नहीं लिया जाता।

गुस्सा तो आम आदमी को आता है। आम आदमी यानी सड़क का आदमी। वैसे भी टोपी पहन लेने से ही कोई आम आदमी नहीं हो जाता!आम आदमी गुस्सा करके कर भी क्या लेगा और क्या किसी का बिगाड़ लेगा। वह आज किसी एक पर गुस्सा कर उसे जमीन की राह दिखा देगा तो दूसरा आसमान पर जा बैठेगा और गुस्से की पात्रता हासिल कर लेगा। यानी चेहरा ही तो बदलेगा, चरित्र तो वहीं के वहीं रहेगा। चरित्र स्थायी भाव हो गया है। चेहरे-मोहरे तो बदलते रहेंगे। तब क्या किया जाए!गुस्से को पीने की आदत को  बनाये रखना चाहिए या फिर गुस्से का इजहार आक्रोश के साथ आक्रामक रूप से किया जाना चाहिए। गुस्से को गरीब की जोरु की तरह तो नहीं बने रहना चाहिए! उसकी ललकार सदैव बनी रहे,तभी तो गुस्सा, गुस्सा माना जाएगा वरना तो फूले हुए गुब्बारे की मानिंद फुस्स हो जाएगा।

इसीलिए बात जब गुस्से की है तो उनका गुस्सा किसी काम का नहीं क्योंकि उसमें कहीं मिलावट है। गुस्सा तो आप हम सब को आना चाहिए। बात-बात पर वे हमें गुस्से का अवसर देते हैं और हम हैं कि खामोशी से सब सहते चले जा रहे हैं। कहते हम सभी हैं कि व्यवस्था के प्रति हमारे मन में आक्रोश है, गुस्सा है लेकिन कैसे मान लें,दिखाई भी तो देना चाहिए। कब तक इसे अन्दर ही अन्दर दबाकर रखोगे यार!कभी तो झूठ-फरेब परोसने पर दहाड़ मारकर गुस्से का इजहार तो कर देखो!

डॉ प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

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