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"यादों के पंछी" - हिन्दी हाइकु साहित्य की एक और महत्वपूर्ण कृति समीक्षक - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

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"यादों के पंछी" - हिन्दी हाइकु साहित्य की एक और महत्वपूर्ण कृति

                       समीक्षक - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

प्रकाशन - नमन प्रकाशन, नई दिल्ली

पृष्ठ - 108 , हार्डबाउण्ड पुस्तक, प्रथम संस्करण - 2018 , 

मूल्य - 250/-            हाइकु कवयित्री - डॉ. सुरंगमा यादव

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           हिन्दी हाइकु का संसार निःसंदेह बेहद धनाढ्य हो चुका है, परंतु मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि इस कड़ी में प्रस्तुत हाइकु कवयित्री डॉ. सुरंगमा यादव  की हाइकु कृति नमन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित -  सात शीर्षकों से संग्रहित "यादों के पंछी" एक बेहतरीन उत्कृष्ट हाइकु कृति है । कृति की भूमिका सुप्रसिद्ध हाइकु कवयित्री डॉ. मिथिलेश दीक्षित  द्वारा लिखी गयी है तथा संग्रह के हाइकुओं के संदर्भ में डॉ. सुरेन्द्र वर्मा  द्वारा सार्थक चर्चा हुई है । आकर्षक मुखपृष्ठ, सुंदर छपाई युक्त हार्डबाउण्ड 108 पृष्ठ के इस हाइकु संग्रह में कई उत्कृष्ट हाइकु पढ़ कर मुझे बेहद आनंद आया ।

            संग्रह के प्रथम शीर्षक "सत्य का पथ" के हाइकु - मन धरती/नव आशा अंकुर/लहक उठी । (पृ 20),

सूरज अस्त/समापन नहीं ये/अल्प विराम ।" (पृ 21),

द्वितीय शीर्षक - "यादों के पंछी" के हाइकु पुस्तक के शीर्षक अनुरुप -  "मन बगिया/कलरव करते/यादों के पंछी ।"(पृ 37),

"इन्द्रधनुष/सतरंगी यादों का/फैला मन में ।" (पृ 39),

तृतीय शीर्षक - "प्रकृति सखी" के हाइकु - "बरसा जल/पाया नव जीवन/फूटा अंकुर ।", "विदीर्ण धरा/व्याकुल है कृषक/सुध ले मेघ ।" (पृ 43),

"चपला कौंधी/हुआ पथ उजला/घर आ प्रिय ।" (पृ 45),

"मेघ पाहुन/विजन डुलाते हैं/विटप वृंद ।"(पृष्ठ 47),

"बसंत आया/लगी फूलों की हाट/भटका भौंरा ।" (पृष्ठ 51),

"पूष की धूप/जवानी से पहले/आया बुढापा ।" (पृष्ठ 55),

"हँसती शीत/फैला श्वेत कुहासा/सहमा सूर्य ।" (पृष्ठ 56),

चतुर्थ शीर्षक - "रेत सा मन" के हाइकु - "गहरा मन/गहरा है सागर/माप कठिन ।" (पृष्ठ 67),

"सागर तल/मन की गहराई/थाह न पाई ।" (पृष्ठ 69),

पंचम शीर्षक - "नदी किनारे" के हाइकु - "पथ प्राचीन/आते-जाते पथिक/नित नवीन ।" (पृष्ठ 72),

छठवां शीर्षक - "मानवी हूँ मैं" के हाइकु - "चारदीवारी/बनी सीलिंग फैन/घूमती नारी ।" (पृष्ठ 79)

तथा सातवाँ शीर्षक - "इन्द्रधनुष" के हाइकु - "बड़ा मकान/छोटे मन में होगा/कैसा आतिथ्य ?" (पृष्ठ 90),

"पूस की रात/खाँसता रहा बूढ़ा/हाड़ समेटे ।" (पृष्ठ 93),

"सागर तट/घूँट भर पानी को/ढूँढता कंठ ।" (पृष्ठ 102),

"घना अंधेरा/सूरज-सा चमका/नन्हा दीपक ।" (पृष्ठ 105),

"दर्पण तू क्यों ?/बोले कड़वा सच/दुःखता मन ।" (पृष्ठ 106)

के हाइकु वास्तव ही बेहद अच्छे बन पड़े हैं । ये हाइकु हिन्दी के अच्छे हाइकुओं की श्रेणी में आ रहे हैं । इनके अलावा भी और कई अच्छे हाइकु इस संग्रह में संग्रहीत हुए हैं ।

          हाइकु कवयित्री डॉ. सुरंगमा यादव   इतने अच्छे और उत्कृष्ट हाइकुओं के सृजन हेतु निश्चय ही बधाई की पात्र हैं । निःसंदेह उनके समृद्ध हाइकु संसार को समेटती कृति "यादों के पंछी" हिन्दी हाइकु संसार की महत्वपूर्ण कृति बन चुकी है । इस उत्कृष्ट हाइकु संग्रह के प्रकाशन अवसर पर मैं उन्हें हार्दिक बधाई ज्ञापित करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य हेतु अशेष शुभकामनाएँ व्यक्त करता हूँ ।

           □ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

            साहित्य प्रसार केन्द्र, साँकरा

            जिला - रायगढ़  (छत्तीसगढ़)

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