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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 12 // नियति // सुजाता शुक्ला

 
प्रविष्टि क्रमांक - 12

sujata shukla
लघु कथा - नियति
सुजाता शुक्ला
रमाशंकर ने निश्चय कर लिया था वृद्धाश्रम जाने का ।
बहू और बेटा की निजता में दखल हो रहा था उनके रहने से ,ये बात बहु विजया और बेटा राहुल की झल्लाहट से उन्हें  स्पष्ट प्रतीत हो रहा था। विजया उनकी दवाईयां लाते वक्त बेटा को गिनाती है पूरे 800 रुपये की आई है तुम्हारे पापा की दवाई , तुम्हारी कमाई का एक तिहाई हिस्सा तो उनके ही खर्च में ही निकल जाता है । अपने पेंशन के पैसे पता नहीं आज भी किसको भेजते हैं ये, हमें तो कुछ बताते ही नहीं ।
उनके कहने पर ही बेटा बहू उन्हें आश्रम छोड़ने जा रहे थे । प्रतिदिन की घटनाओं से रमाशंकर टूट से गए थे । पुरानी बातों के बारे में वे सोच ही रहे थे कि आश्रम आ गया आज विजया भी राहुल के साथ उन्हें छोड़ने आई थी। अंदर आते ही रिसेप्शन में बैठा व्यक्ति उठ खड़ा हुआ और रमाशंकर जी के पैर छु लिया अरे सर आप ,आईए आइए। कैसे हो राजराम , रमाशंकर ने पूछा राहुल और विजया एक-दूसरे को देख समझने की कोशिश करने लगे । जी अच्छा हूँ । अंदर जा कर सब औपचारिकताएं पूरी करने के बाद राहुल ने पापा से कहा आप पैसे की चिंता मत करना मैं समय समय पर डाल दिया करूंगा विजया खुश थी अब उसकी निजता में कोई दखल नहीं होगा ।
रमाशंकर उद्यान में एक पेड़ के पास आकर खड़े हो गए । राहुल ने कहा ये पापा को क्या हुआ ।खुद ही तो आने की जिद किए बैठे थे ।अब उदास हो के ,पेड़ के पास चले गए है। ये पेड़, वे और उनकी पत्नी ने, तुम्हारे साथ मिल के लगाया था “बेटा” ,तुम्हारे प्रथम जन्म दिवस पर , राजराम ने कहा ।अब ये पेड़ हराभरा हो, फलो से लद गया है कई पंछियों, जीवों का प्रश्रय स्थल बन गया है । ये वृद्धाश्रम और वो अनाथाश्रम ,दोनों अगल बगल है उसी अनाथाश्रम से उन्होंने तुम्हें गोद लिया था । वे इस आश्रम के फ़ाउंडर मेम्बर भी है । आज भी निर्बाध रूप से ,आश्रम में पैसे भेजते हैं । कहते थे ,मेरा ये बेटा भी बड़ा हो के, कईयों को प्रश्रय देने वाला बनेगा। पर उनका बेटा आज स्वयं, उन्हें ही प्रश्रय नहीं दे पाया । आत्मग्लानि से भर उठे राहुल और विजिया, हमें माफ कर दो पापा, दोनों के हाथ रमाशंकर जी के कदमों में जा पड़े । आंखों में आँसू लिए राहुल विजया और रमाशंकर अब वापस कार में बैठ रहे थे एक सुखद कल्पना के साथ।

सुजाता शुक्ला
परिचय := एम एस सी वनस्पति शास्त्र से करने के बाद कुछ महीनों कॉलेज में अध्यापन
आकाशवाणी रायपुर से कविता कहानियाँ प्रसारित , नवभारत पेपर सहित अन्य पत्र पत्रिकाओं में कहानी कवितायें एवम लेख प्रकाशित , विभिन्न मंचों में कहानी एवं कविताओं के लिए सम्मानित
एक काव्य संग्रह "कृतिका " प्रकाशित
वर्तमान में आकाशवाणी रायपुर मे नैमीत्तिक उद्घोषिका एवम दूरदर्शन में कार्यक्रमों का संचालन
पर्यावरण संरक्षण मण्डल रायपुर में कार्यरत
                       सुजाता शुक्ला














1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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