नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

कविताएँ : संजय शांडिल्य

Sanjay Shandilya-1
•   

उस घाट का कोई नाम नहीं

यह रास्ता
जिस घाट तक जाकर
खत्म हो जाता है
उस घाट का कोई नाम नहीं

उसके करीब
कई घाट हैं नामोंवाले
पर उस घाट का कोई नाम नहीं

उस घाट पर
एक मंदिर है प्राचीन
नाम—शिव-मंदिर
और बगल में
एक मस्जिद है मुगलकालीन
नाम—पत्थर की मस्जिद

रंग-रंग के पंछी हैं
उस घाट पर
सबके कुछ न कुछ नाम होंगे जरूर
उनकी भाषा में या हमारी भाषा में
अपने नामों के पंखों पर सवार
वे उड़ते होंगे सारे जहान में

भाँति-भाँति की सुंदरियाँ
कई कारणों से वहाँ जमी रहतीं
बतियाती हुई एक दूसरी से
नामों के आलोक में
अनेक बहानों से पुरुष
दिनभर जमघट लगाए रहते
नामों के संबोधन के साथ

उस घाट से
गुजरती रहती नदी
उसके साथ
गुजरता रहता उसका नाम
जो वहाँ आता है
नाम के साथ आता है
जो जाता है
नाम ही के साथ चला जाता है
रहनेवाला
नाम के साथ रहता आया है अनंत काल से
सिवा उस घाट के
जिसका कोई नाम नहीं !
नदी मुस्कुराई

नदी,
क्या हो तुम

माँ हो या बहन
बेटी हो
या दोस्त हो मेरी

घर के बारे में सोचता हूँ
और सोचने लगता हूँ
तुम्हारे बारे में
परिवार के बारे में विचारता हूँ
जेहन में तुम्हारा भी खयाल आता है
देश का ध्यान करता
तो पहले
तुम्हारा चित्र उभरता है
मन के मानचित्र पर
जीवन के रूप में
तुम्हीं सामने आती हो
मृत्यु के बाद
तुम्हारी ही गोद
अंतिम सत्य लगती है

नदी, क्या हो तुम
कि सारे रास्ते
तुम्हीं तक जाते हैं विचारों के

नदी मुस्कुराई
और बोली धीरे से
इतने धीरे से
कि केवल मैं सुन सकता था
उसकी आवाज
उसकी मुस्कुराहट
केवल मैं देख सकता था

उसने वेग-स्वर में कहा—
तुम ठीक समझते हो, कवि!
मैं स्त्री हूँ, सिर्फ स्त्री
जो विचारों में मिलती है प्रायः
या रास्तों में...

----


नींद और मृत्यु 


(एक)

नींद एक मृत्यु है
छोटी-सी मृत्यु
जैसे मृत्यु एक नींद है अंतहीन...

इस नींद से जागकर
मैं उठता हूँ इस पार
उस नींद के बाद
कभी उठूँगा उस पार भी

इस नींद में
मुझे मृत्यु के स्वप्न आते हैं अक्सर
पर हर बार
मैं जीवित हो उठता हूँ इनमें

क्या उस नींद में
मुझे आएँगे स्वप्न जीवन के
आएँगे तो क्या होगा उनमें
और कौन होंगे

तुम्हारी अनुपस्थिति का
कोई स्वप्न
कैसे जीवंत हो सकता है, मेरी पृथ्वी !
इसलिए आना
उस नींद में भी जरूर आना
और स्वप्न में जगाना
बार-बार जगाना ।

----


(दो)

नींद एक नदी है
जैसे नदी एक बहुत गहरी नींद
दृश्यादृश्य जिसमें तैरते हैं दिशाहीन...

और मृत्यु ?
मृत्यु महासमुद्र है
नमकीन और अथाह
जिसमें डूबा हुआ कोई
एकदम लय हो जाता है
प्रेम में होने की तरह...

----


आग्रह

अब मान जाओ
इतने दिनों का गुस्सा
इतने दिनों की उदासी
अब खत्म करो
आओ, हम फिर बैठें
और बतियाएँ

ऐसा क्यों नहीं हो सकता
कि एक प्रयास हम फिर से करें

इस अंतिम प्रयास में
हम जरूर सफल होंगे
और यकीन करो
हर बार अंतिम ही प्रयास में
मैं सफल हुआ हूँ

तो आओ, इस अंतिम के लिए
हम फिर से शुरुआत करें
और यह वादा है तुमसे
कि यदि हम असफल ही रहे
तो हम मुक्त हो जाएँगे एक दूसरे से
मेरी डाल से 
तुम उड़ जाना सदा के लिए अनंत में
मैं खुद ही सूखकर ठूँठ हो जाऊँगा

वैसे,
मैं जानता हूँ, प्रिये  !
न तुम उड़नेवाली हो कहीं
न मैं सूखनेवाला हूँ कभी...


-----


जो आदमी लौट आया है


आज वह
फिर लौट आया

आज
मन का कहा
उसने फिर नहीं माना

आज भी
उसके संकल्प
धरे के धरे रह गए

सारा क्रोध
मोह-समुद्र में
लय हो गया
आज भी

एक बार फिर
उसका रास्ता
प्रेम ने रोक लिया

और
इस तरह
वह आदमी
आज फिर लौट आया


जो आदमी लौट आया है
उसे गुलदस्ते दो
और ढेर सारा प्यार..

और हाँ,
उसके लौटने को
इस नजर से मत देखो
कि यह जीत है उसकी
या हार !

----


       परिचय

जन्म : 15 अगस्त, 1970 |
स्थान : जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर |
शिक्षा : स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) |
वृत्ति : अध्यापन |   

प्रकाशन : कविताएँ हिंदी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं ‘अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले’ (सारांश प्रकाशन, दिल्ली) तथा ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) में संकलित | कविता-संकलन ‘उदय-वेला’ के सह-कवि |
    
संपादन : ‘संधि-वेला’ (वाणी प्रकाशन, दिल्ली), ‘पदचिह्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली), ‘प्रस्तुत प्रश्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘कसौटी’ (विशेष संपादन सहयोगी के रूप में),‘जनपद’ (हिंदी कविता का अर्धवार्षिक बुलेटिन), ‘रंग-वर्ष’ एवं ‘रंग-पर्व’ (रंगकर्म पर आधारित स्मारिकाएँ) |

संपर्क : साकेतपुरी, आर. एन. कॉलेज फील्ड से पूरब, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार) |

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.