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प्राची अक्टूबर 2018 : पुस्तक समीक्षा // स्त्री और समुद्र (कविता संग्रह) // समीक्षकः सतीश शुक्ल

पुस्तक समीक्षा

स्त्री और समुद्र (कविता संग्रह)

समीक्षकः सतीश शुक्ल

राकेश एक लेखक कवि और सम्पादक हैं। इन दिनों मध्य भारत हिन्दी साहित्य सभा इंदौर की मासिक पत्रिका ‘वीणा’ के सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर अपनी कलम चलायी है। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में परम्पराओं का विज्ञान (निबंध संग्रह) अन्तस के स्वर (कविता संग्रह) मध्य भारत हिन्दी साहित्य का इतिहास समय के हस्ताक्षर (निबंध संग्रह) समय के पदचिह्न (निबंध संग्रह) और वार्ता का विवेक (साक्षात्कार) है. उनका प्रस्तुत संग्रह स्त्री और समुद्र पर उन्हें मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का पुरस्कार घोषित हुआ है।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार बलराम ने इस कृति के बारे में अभिमत व्यक्त करते हुए लिखा है कि ‘राकेश शर्मा की कवितायें समकालीन जीवन की विद्रूपताओं पर जितना प्रकाश डालती हैं, उतना ही अतीत से जुड़कर सोचने के लिए विवश भी करती हैं। इन्हें पढ़कर पाठक को लगता है कि हमारा वर्तमान अन्ततः अतीत का ही प्रतिफलन है।’ अपने पूर्ववाक् में राकेश शर्मा लिखते हैं, ‘कविता हमेशा उनके मन के करीब रही है। उन्हें पिताजी के वर्षा ऋतु में रामचरित मानस के पाठ के समय का सान्निध्य उनके लिए प्रेरणादायक रहा। रामायण के प्रसंगों ने उनके अवचेतन मन को कवितामय बना दिया। अपने अध्ययन व अध्यापन काल में उनका जुड़ाव मुख्यतः कविताओं से ही रहा है. वह उनकी सहचरी बन गयी। कविता सृजन काल में कविताओं में अनेक विषय विचारणीय रहे और उनका समावेश कविताओं में हुआ।

‘स्त्री और समुद्र’ में उनकी 109 कविताओं का समावेश है जो विविध तेवर लिए हैं। ‘कौन रचता है किस्से में’ उन्होंने यह प्रश्न खड़ा किया है कि कवि कविता रचता है या कविता रचती है कवि को? उन्होंने इस कविता में आगे लिखा है, ‘कवि दृष्टा है/दृष्टा होना/एक साधना/पात्रता का अर्जन है/ कविता को धारने की/ उसे शब्दों में उतारने की/ पृ. 14)। महाकाल की किताब (15-16) में समय के तीनों काल खण्डों को बहुभांति परिभाषित करते हैं. जीवन के अतीत (बचपन) वर्तमान (युवावस्था) और वृद्धावस्था एवं अंतिम छोर पर मृत्यु की व्याख्या की। यह कविता दो स्तरों पर जीवन का समय के तीन खण्डों का विश्लेषण करती है। अपने समय के लिए (17) के ये पंक्तियां काबिले गौर हैं पर यह तो बतलाओ/मेरे समय/ तुम्हारे महाकाव्य का हर सर्ग/ हाहाकार से प्रारम्भ हो/अंश और अपभ्रंश की इतियों पर/ समाप्त क्यों हो रहा है।

‘धारा के विपरीत’ (पृ. 23) की ये पंक्तियां ‘सृजन के लिए/ जरूरी है समय की/ धारा के विपरीत बहना/ यह चुनाव नहीं/ होती है एक शर्त जो रेखांकित करती है कवि जो धारा के विपरीत रहे. उनकी रचनायें कालजयी रही। घाव और कविता’ (पृ.) एक छोटी किन्तु सारगर्भित कविता है- ‘अश्वत्थामा/ तुम्हारी ही तरह/ भटक रहा है कवि/ इसके अदृश्य बातों पर/ विष भरे वाण की संधात/ बढ़ता ही गया है। कवि और अश्वत्थामा के चिर स्थायी घावों पीड़ाओं और कवि के ऊपर अवहेलना तिरस्कार और उपालम्बों से जनित पीड़ादायक घावों का तुलनात्मक चित्रण है।

स्त्री विमर्श पर कवि की अनेक कवितायें अकेली (पृ.26-27), प्रश्नों से जुझते हुए (पृ. 29) स्त्री का बचपन (पृ. 32), चुटकी भर सिंदूर (पृ. 33) और स्त्री और समुद्र (पृ. 34-35) है जो इस काव्य संग्रह की शीर्षक कविता है। स्त्री को नदी और पुरुष को इठलाते समुद्र की कल्पना एक अहतीय प्रतीक है। यह पुरुष स्त्री अन्तः सम्बन्धों की सटीक बिम्बात्मक प्यार है। चीदर गर्ल्स आज की नारी के शोषण का प्रतीक है जो सनातन काल से अब तक विविध स्वरूपों में है। अरे ओ स्त्री (पृ. 39) भ्रमित और शोषित गरिमा खोती स्त्री का चित्रण है। प्रार्थना (पृ. 42) प्रार्थना के मौन तल्लीनता को करती हुई रचना है, जिसमें जड़ और चेतन सभी प्रार्थनारत हैं।

उनकी इस संग्रह की अन्य रचनाओं में अनदेखे जलजले (पृ. 60) स्वरूप के खण्डहर (पृ. 62) बाजार का भ्रमजाल (पृ. 63-64) भाषा का प्रश्नवाची होना (पृ. 65) यातनायें बनाती है बुद्ध (पृ. 77) कविता सत्य का नवनीत (पृ. 9) उल्लेखनीय है। अंगुलीमाल पौराणिक प्राचीन संदर्भों को लिए हुए वर्तमान समय की कविता है। तुम जयद्रथ (पृ. 67) पौराणिक संदर्भों को वर्तमान से जोड़ती है।

संक्षेप में राकेश शर्मा की यह नवीनतम कृति आज और अतीत के गुम्फित संदर्भों का दर्पण है.

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पुस्तक का नाम : स्त्री और समुद्र (कविता संग्रह)

रचयिता : राकेश शर्मा

प्रकाशक : नीरज बुक सेंटर,

सी-32, आर्य नगर सोसाइटी, प्लॉट नं. 91

आई. पी. एक्सटेंशन, दिल्ली-110092

मूल्य- 200 रुपये, पृ. 112

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संपर्क : ए-1401, पटेल हेरिटेज, सेक्टर - 7,

खारघर, नवी मुम्बई-410210

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