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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 41 // परम्परा // अनघा जोगलेकर

प्रविष्टि क्रमांक - 41

अनघा जोगलेकर

..........परम्परा.........

चिताएं धूँ-धूँकर जल रही थीं। उसके पहले तिरंगों को ढंग से सहेज कर रख दिया गया था। सारे अफसरान इन शहीदों के सामने नतमस्तक थे।

मेजर वर्मा सूनी आँखे लिए चिताओं से उठते धुँए को देख रहे थे। उस धुँए में तरह-तरह की आकृतियाँ बनती, बिगड़ती, फिर बनती जा रही थीं। मेजर की आँखों के सामने फिर एक बार युद्ध का मंज़र तांडव करने लगा।

दुश्मन फौज आगे बढ़ती जा रही थी। मेजर के सारे साथी मारे जा चुके थे। वे किसी भी वक्त दुश्मन की गिरफ्त में आ सकते थे। तभी अचानक सेना की एक टुकड़ी अपने सेनानायक के साथ, तीर की तरह तेजी से, दुश्मन और उनके बीच आ धंसी। मेजर को संभलने का समय मिल गया। दोनों ओर से धुआँधार गोलीबारी हुई। अंततः सारे दुश्मन सैनिक मारे गए। इधर भी कोई न बचा लेकिन लाशों के उस ढ़ेर में से मेजर वर्मा को जिंदा निकाल लिया गया। जब उन्हें होश आया तो उनका सबसे पहला वाक्य था, "उस सेना का लीडर कौन था?"

         "लेफ्टिनेंट विजयवीर......जनाब।" एक जवान ने उत्तर दिया।

अभी मेजर वर्मा उन दुखद यादों से बाहर भी न आ पाए थे कि किसी ने आकर उन्हें सेल्यूट किया और कड़क आवाज़ में कहा, "सूबेदार विजयवीर... रिपोर्टिंग सर।"

मेजर वर्मा ने चौंककर उसकी ओर देखा। फिर उसके कंधे पर हाथ रखते हुए गर्व से बोले, "विजयवीर....यह केवल नाम ही नही बल्कि एक परम्परा है...शहादत की। विजयगाथा है इस देश की।" कहते हुए उनकी आँखों में मोती चमक उठे। सीना दो इंच और चौड़ा हो गया। मस्तक गर्व से तन गया।

चिताएं अभी भी धूँ-धूँकर जल रही थीं लेकिन उनके धुँए में दिखती आकृतियाँ गर्व से मुस्कुरा रही थीं।

©अनघा जोगलेकर

2 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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