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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 42 // ट्रॉयल रूम // वन्दना पुणतांबेकर

प्रविष्टि क्रमांक - 42

वन्दना पुणतांबेकर

लघुकथा
  [ट्रॉयल रूम]

एक साधारण घर में पढ़ी लिखी पूर्वा दुनियॉ की चकाचौंध औऱ सोशल मीडियां से जुड़ी एक आम लड़की।आये दिन मॉल में जाना

वहाँ ट्रॉयल रूम में ड्रेस पहनकर सेल्फी खीचकर वेड्स ऐप, फेसबुक में पिक डालना उसकी आदत सी बन गई थी।
इन आदतों से उसकी माँ हमेशा चिंतित औऱ परेशान रहती।वह हमेशा पूर्वा से कहती।   "बेटा हम लोग इतने अमीर नहीं है,जैसे हैं वैसे ही रहना सीखो। ये दिखावे की दुनियां हमारी नहीं है,तुम इस तरह की जिंदगी जी रही हो। तुम्हें इससे क्या हासिल होता है।
"चिल मॉम......घर मे तुम्हें कौन देखने आता है, ये तो आजकल का फैशन है। ओके बाय..कहते हुए पूर्वा स्कूटी स्टार्ट कर निकल गई।

उसकी माँ चिंतित नजरों से उसे जाते देख रही थी।
हमेशा की तरह आज भी पूर्वा अपनी सहेली के साथ मॉल गई। कुछ ड्रेसेस लेकर ट्रॉयल रुम में गई। उसने ड्रेस चेंज किया ही था कि अचानक लाईट चली गई। तभी उसने देखा कि वहाँ अंधेरे में एक लाल अगरबत्ती की तरह कोई लाईट सी दिखाई दी।
इतने में लाईट आगई। उसने बाहर सारे ड्रेस वही रख दिये। उसकी सहेली बोली.." दिखा कितनी सेल्फी ली ,बताना प्लीज़ जल्दी।

पुर्वा बिना कुछ कहे वहाँ से निकल पड़ी। उसकी सहेली कुछ समझ नहीं पाई। आज पुर्वा को अपने नारी के अस्तित्व का एहसास हो गया था। उसे एहसास हो चुका था ।कि अपने अस्तित्व को खोना नहीं चाहिए। आज वह एक गंभीर औऱ समझदार पुर्वा बन चुकी थी।
जो बात हमेशा उनकी माँ समझती पर वह न समझती। वही बात आज उसे ट्रॉयल रूम ने समझा दी थी।

श्रीमती वन्दना पुणतांबेकर

इंदौर

1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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