नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 57 // पीठ पीछे // रतन लाल जाट

प्रविष्टि क्रमांक - 57


लघुकथा- पीठ पीछे

IMG_20180309_162515
               रतन लाल जाट

शहर के चौराहे पर एक मशहूर चायवाले की दुकान पर टेबल के दोनों तरफ चार-पाँच जने चाय की चुस्कियाँ लेते हुए परस्पर बातें कर रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे उन्हें चाय से ज्यादा उन बातों से आनन्द आ रहा था।
तुझे पता है उस सक्सेना की कहानी?
कौन? वही जो तुम्हारे पड़ोस में रहता है।
हाँ, उसका पहले किसी से अफेयर था। जो घर-बार छोड़कर यहाँ पर आ बसा। अब लगता है शर्मा जी की लड़की पर जादू चला रहा है।
इसीलिए जब देखूँ, तब वहीं मंडराता नजर आता है। अब पता चला, आखिर माजरा क्या है?

[post_ads]
पर, यह मेरी समझ में नहीं आता है कि शर्मा जी शराब नहीं पाते हैं। परन्तु शराबी को घर-चौके तक आने-जाने की खुली करने के साथ-साथ लड़की भी सौंप दी है।
फिर सभी जोर-से हँसे। तब तक चाय खत्म हो चुकी थी। इसके बाद सभी उठकर बाहर निकलने ही वाले थे और तभी बाहर से अन्दर की ओर सक्सेना आता दिखाई दिया। तो वे सभी हाथ जोड़कर ठहर गये और कहने लगे, अरे! सक्सेना जी साहब आइये और बैठिए। बहुत दिन हो गये हैं आपको देखे हुए।
फिर उनमें से एक ने वापस चाय का ऑर्डर दे दिया था और सेक्सेना जी की तारीफों के पुल बाँधने लगे थे।
आप की तरह सब नहीं होते हैं। हर किसी की सहायता के लिए दिन-रात खड़े रहते हैं।
यह सुनकर सक्सेना के चेहरे पर मुस्कान आ गयी थी।

3 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है, परंतु हमारा ये मानना है कि जब हम साहित्य जैसी किसी विधा में लिख रहे हैं तो जाति विशेष का उल्लेख करने से बचें। ये आचार संहिता इसलिए जरूरी है क्योंकि हम मानव व्यवहार को दर्शा रहे हैं हमने कई पत्रकार बंधुओं से भी कई बार निवेदन किया है कि वे जातिगत हैडिंग बनाने से बचे, आखिर ये कहां तक उचित है कि किसी एक जाति विशेष के व्यक्ति के लिए समूचे समाज या जाति के लोगों को कठघरे में खड़ा कर दें। विश्वास है आपको हमारा सुझाव पसंद आएगा। ध्यानाकर्षण हेतु सादर प्रेषित।

    विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.