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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 59 // परम्परा // शुभ्रा ओझा

प्रविष्टि क्रमांक - 59

शुभ्रा ओझा

लघुकथा - परम्परा

'अरे सुबह से ही भागदौड़ कर रही हो, पहले चाय पी लो फिर कुछ करना, ये कहते हुए मैंने अपनी बेटी पम्मी को अपने पास बिठा लिया।'

'चाय का कप अपने हाथ में लेते हुए पम्मी ने कहा-

अम्मा, गांव की लगभग सभी औरतें आ गई हैं,

क्या मैं मुंह-दिखाई रस्म के लिए भाभी को ले आऊं?'

"अभी एक दो लोग बाकी है उनके आते ही मुंह-दिखाई के लिए बहू को ले आना, बहू तैयार तो है ना ?"

'हां अम्मा, लेकिन बाहर गांव की औरतों में तरह-तरह की बातें चल रही है नई बहू के बारे में।'

"ये तो होना ही था अमेरिका में पढ़ी-बड़ी भारतीय लड़की जब इस गांव की बहू बनकर आयी है तो सौ तरह की बातें बनेगी ही, लेकिन मुझे लोगों की बातें सुनकर अपना मन खराब नहीं करना। कुछ हफ्तों में बेटा और बहू वापस परदेश चले जाएंगे ऐसे में जितना भी समय हमारे पास है वो हंसी खुशी बीत जाये ऐसा यत्न करना चाहिए।"

'अम्मा, नई बहू से तुम खुश तो हो ना ?'

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"मैं बहुत खुश हूं पम्मी, नई बहू पराये देश में रहते हुए भी भारतीय सभ्यता संस्कृति से जुड़ी हुई है, यह बहुत बड़ी बात है। घर के सभी सदस्यों का कितना आदर करती है, उसे देखकर लगता ही नहीं कि इतने दूर देश से आयी है। मुझे अपने बेटे की पसंद पर गर्व है। अब जाओ नई दुल्हन को लाओ सभी लोग आ चुके है।"

नई दुल्हन की मुंह-दिखाई शुरू होती है और गांव की सभी औरतें कुछ ना कुछ सगुन के रूप में बहू को देती है, और नई बहू धन्यवाद स्वरूप सभी बड़ों के पैर छूती है। मैं भी सभी के समक्ष बहू को मुंह-दिखाई में अपने खानदान का पुश्तैनी कंगन देती हूं।

"ये मेरी सास ने मुझे दिया था आज मैं तुम्हें दे रही हूं। इसे सिर्फ कंगन नहीं समझना बहू, यह हमारे पुरखों का आशीर्वाद है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परा के रूप में हमारे परिवार में चली आ रही है।"

नई बहू उठकर मेरे पैर छूती है और फिर पम्मी के पास जाकर उसे एक कंगन पहनाते हुए कहती है-

"दीदी, अगर ये कंगन हमारे पुरखों का आशीर्वाद है तो उनका आशीर्वाद हम दोनों को मिलना चाहिए इसलिए यह एक कंगन हमेशा आपके पास रहेगा और दूसरा मेरे पास।

यह सुनते ही पम्मी ने नई बहू को गले से लगा लिया।

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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