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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 60 // बोध // राजेन्द्र श्रीवास्तव

प्रविष्टि क्रमांक - 60


बोध  
     राजेन्द्र श्रीवास्तव


शहर में  दंगे हो रहे थे। तनाव का माहौल था।
रथीस और मनोज आफिस से निकल कर जल्दी घर पहुँचना चाहते थे।
शाम का धुंधलका और सुनसान सड़क उनकी बेचैनी बड़ा रहे थे। रथीस ने मोटर साइकिल की स्पीड साठ के ऊपर कर दी। मनोज ने कस कर रथीस को पकड़ लिया। अगले मोड़ पर चार-पाँच लोगों का झुण्ड नजर आया। रथीस सावधानी से उनसे बचते हुए मोटर साइकिल निकाल ले गया।
लेकिन दोनों ने उस झुण्ड से बचने की कोशिश कर रही उस महिला की बेबस पुकार सुनी थी।
इन दोनों को देखकर बड़ी आशा से आर्त स्वर में उसने कई बार पुकार कर कहा था। "भैया! प्लीज मुझे बचा लीजिये, भैया.... ।"
उसकी वह पुकार अभी तक मानो दोनों का पीछा कर रही थी।
"रथीस! यार गाड़ी रोक।"  मनोज ने कहा।
"यार क्या हुआ! देखता नहीं, कितनी मुश्किल से बच कर आये हैं।" रथीस ने मोटरसाइकिल की स्पीड पचास के आसपास करते हुये कहा।
"हाँ! लेकिन उस बहिन को बचाना भी हमारा फर्ज है।" मनोज ने दृढ़ता से कहा।
"सोच लो! फर्ज निभाने के चक्कर में जान भी जा सकती है!! जिंदा नहीं रह पायेंगे!! "
रथीस ने  कहते हुये स्पीड और कम कर दी।
"भाई तू भी सोच! उस बहिन को ऐसे हालात में छोड़कर भागने के अपराध बोध को लेकर भी क्या हम जिंदा रह पायेंगे??? "  मनोज ने रथीस के कंधों पर जोर डालते हुए कहा।
रथीस ने मोटरसाइकिल मोड़ दी। अब मोटरसाइकिल उस बहिन की ओर फिर साठ की स्पीड से दौड़ रही थी।

पता:- राजेन्द्र श्रीवास्तव
          श्री साईं सदन
           आर एम पी नगर फेज - 1
          विदिशा म.प्र 464001
    
         ईमेल - rpshrivds78@gmail.com

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