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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 90 // चुप रहना कसक // शशि दीपक कपूर

प्रविष्टि क्रमांक - 90

शशि दीपक कपूर

चुप रहना कसक

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जब से बुढ़ापा आया, किसी को अपना दर्द बताने ही नहीं देता, सब कुछ समझ- समझ पग धरने को कहता । बेटी से कुछ कहें तो कैसे? वह परेशान हो जाएगी , पति या सास से मनमुटाव कर जबरदस्ती हमसे मिलने चली आएगी, दो-चार दिन रह से ज्यादा रह भी नहीं सकती हमारे पास ।  बेटा इंजीनियर, बहू डॉक्टर, उन दोनों का ही स्वयं का कोई ठौर-ठिकाना नहीं, कब आते हैं कब जाते हैं । बच्चों को भी डे-केयर में दिन-भर रख जाते। शाम को नौकरानी उन्हें डे-केयर से वापिस ले आती है । वे भी हमारे साथ केवल समय-सूची अनुसार पूरे दिन में एक-डेढ घंटा ही बिताते हैं । कहने,देखने, सुनने में सब कुछ व्यवस्थित चल रहा है, कहीँ कोई यातना का तो प्रश्न ही नहीं उठता ।

हम दोनों दिन-भर मित्रों, रिश्तेदारों से फोन कर बतियाते, मानों हम दूसरे के घरों की टोह ले रहे हैं, बस, किसी के घर-परिवार में कोई ऐसी बात मिल जाए, जो दिन-भर के लिए हम दोनों के लिए चर्चा का विषय बन जाए या कभी कभी छिड़ भी जाए ।  सुबह आदतन जल्दी उठ जाना, पूजापाठ कर टहलने जाना, नाश्ता कर अखबार के पन्नों को उल्ट-फेर कर शुरू से आखिर तक पढ़ना, टी.वी पर कुछेक पसंदीदा प्रोग्राम देखना, जैसे सारे सारे जहाँ को हम अपने में समेटकर जरूरत पड़ने पर बहसों में बढ़-चढ़ कर अपनी भागीदारी साबित कर सकें ।

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केवल अपने कमरे के हल्के-फुल्के समानों को इधर से उधर व्यवस्थित कर देना, दवाएं व भोजन समय से ले आपस दोनों का गप्पे हांककर दो विचारों में भिन्नता द्वंद से बरामदे की कुर्सी या गार्डन के पेड़ के नीचे बैठ सांझ ढलने का इंतजार करना, हमारी रोज की प्रक्रिया में  सटीक शामिल है, इसे बदलने का कोई विशेष कारण तलाशने पर नहीं मिलता, घड़ी की सूईयों की तरह रात का डिनर कभी कभार सबका एकसाथ डाईनिंग टेबल चुपचाप बिना आवाज किए चबाते हुए रोटी, चावल,दाल,सलाद,दही-रायता,सब्जियां, खीर,फ्रुटस्, जूस वगैरह टेबल की खातिरदारी बढ़ाता । आखिर टेबल मैनर्स भी कोई चीज़ होती है । खा-पीकर थोड़ा टहलकर अपने कमरे में चूहे की तरह बिल में घुस जाते ।

इतनी सुख सुविधाओं के बीच में मचलता मन कुछ न कुछ कमियां ढू़ंढता ही रहता है, बार-बार बेटी को पुकारता है, आखिर वही है जब आती है बिना एक पल गवाएं अपनी ढेरों बाते करती है, हमारी  बातें सुनती है । मन को भी तब कहाँ ख्याल रहता है अपने होने का, वह बेटी में ही रच बस जाता है ।

तभी सपना की मां ने आवाज देकर आज फिर कहा, ऐ जी !सुनो, सपना को फोन कर यहां बुला लीजिए, और हां, उसे बच्चों के साथ यहां दो-चार दिन रहने को कहिएगा ।”

यह सुन मेरा मन खीजन से भर गया, “तुम क्यों नहीं फोन करती उसे “, अनायास मुंह से निकला, “क्या तुम्हें दो युवा, दो बच्चे, एक बूढ़ा, और तीन नौकर कम लगते हैं दिन-भर गप्पें हांकने के लिए ।”

वह रुआंसी हो गई, मैं वहां से उठकर बाहर चला, सोचा कुछ बाहर की हवा खा आऊं, घुटने की ऐंठन पर थोड़ा मलम भी लग जाएगी। फिर न चाहते हुए मैंने उसे बुलाया, “क्या तुम चलोगी मेरे साथ ।” शायद वह इंतजार ही कर रही थी, मैं ऐसा कहूँ, और वह मेरे साथ चल दी । मेरी कसक अब चुप्पी में बदल गई ।

                     (शशि दीपक कपूर -29.12.2018)


नाम           : शशि कपूर

पता           : फ्लैट नं. 2, सुजय एन्क्लेव, प्लॉट नं. 27,

                   सेक्टर - 12, वाशी, नवीं मुंबई - 409703.


इ मेल।        : shashicapoor10@gmail.com

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