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अंकुश्री की लघुकथाएं - १.आदत, २. गुलाम मानसिकता ३. निजी अस्पताल

अंकुश्री (Ankushri)



गुलाम मानसिकता
                                          

    साहेब बार-बार उससे एक ही सवाल पूछते कि वह बंगला पर काम करने क्यों नहीं आता है और वह हर बार एक ही जवाब देता, ''आफिस में जो काम कराना है उसके लिये मैं तैयार हॅू, लेकिन मैं बंगला पर नहीं जा सकता.''
     बार-बार बात काटते रहने से वह साहेब की नज़र में चढ़ गया था. साहेब कभी धमकी देते कि उसका यात्रा भत्ता विपत्र पारित नहीं करेंगे तो कभी कहते कि उसे यात्रा  में साथ नहीं ले जायेंगे. लेकिन वह किसी तरह भी साहेब का घरेलू कार्य करने के लिये तैयार नहीं हुआ.
     उसका पिता भी उसी की तरह चपरासी था और उससे कहा करता था, ''मैं  अंग्रेज के जमाने का चपरासी हॅू. बहुत से साहेबों को देख चुका हॅू. लेकिन किसी साहेब से मुझे कभी अनबन नहीं हुई.'' अनबन हो भी कैसे ? उसके पिता अपने घर-परिवार की चिंता छोड़ कर साहेबों के घर-परिवार की चिंता में लगे रहते थे. वह अपने पिता के बारे में सोचने लगा. पिताजी ने अपने घर-परिवार की थोड़ी भी चिंता की होती तो क्या वह पढ़-लिख नहीं पाता ? वह चपरासी बनता ही क्यों ?
     शाम को जब वह घर जाता है तो दरवाजे पर प्रतीक्षारत पत्नी की मुस्कुराहट देख कर कार्यालय की सारी डांट भूल जाता है. जलपान के बाद वह अपने बेटा को टो-टाकर पढ़ाने बैठ जाता है.
     पिता जैसी गुलाम मानसिकता उसमें नहीं आ पायी है. उसे संतोष है कि किसी की कृपा का सुख उसे भले नहीं मिल पाये लेकिन अपने घर-परिवार के सुख से वह वंचित नहीं है.

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निजी अस्पताल 
                                        

    ''सूई पड़ गयी ? ''
     ''हां !'' कुछ रूक कर नर्स ने आगे कहा, ''मगर आपने यह सूई क्यों दिलवाई ?''
     ''- - - - - -''
     ''उसे तो प्रसव पीड़ा हो रही है. सूई देकर पीड़ा रोकना ठीक नहीं - - -.'' कस्बे में एक ही सरकारी अस्पताल था. उसमें डाक्टर भी एक ही थे.
     ''- - - - - -''
     ''जब मुंह खुल गया है तो उस प्राकृतिक पीड़ा को सूई देकर नहीं दबाना चाहिये था. इससे प्रसव और जटिल हो जायेगा.''
     ''- - - - - -''
     अस्पताल का नियमित समय खत्म होने पर डाक्टर जाने लगे तो नर्स ने पूछा, ''यदि इस औेरत की हालत ज्यादा खराब हो जायेगी तो मैं क्या करूंगी ?''
     ''उसे मेरे निजी अस्पताल में भेज देना.''
                  

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आदत
                     
     पति को सब्जी में अधिक मिर्च पसंद नहीं थी. लेकिन पत्नी को अधिक मिर्च वाली सब्जियां ही अच्छी लगती थी. पत्नी के कारण पति को भी मिर्च वाली सब्जियां खानी पड़ती थी.
     दोनों खाने बैठे थे. इसी बीच पड़ोसन भी आ गयी. उसे भी खाने  पर बैठा लिया गया. पत्नी चटखारे ले-लेकर सब्जियां खा रही थी. पड़ोसन को भी सब्जियां अच्छी लग रही थी. लेकिन सब्जी में मिर्च अधिक थी. उसने कहा, ''इतनी अधिक मिर्च वाली सब्जियां जीजाजी खा लेते हैं ?'' जीजाजी को उसने एक सप्ताह तक खिलाया था. उसे पता था कि उसके पड़ोसी जीजाजी मिर्च बहुत कम खाते हैं.
     ''हां.'' पत्नी ने कहा,''पहले तो नहीं खाते थे, लेकिन अब आदत हो गयी है.''
     उधर बेचारा पति पानी का घूंट ले-लेकर खाना खाए जा रहा था. मिर्च अधिक होने के कारण उसकी आंख-नाक से पानी निकल रहा था, जिसे वह धीरे से रुमाल में पोंछ लेता था.
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                  अंकुश्री
8, प्रेस कॉलोनी, सिदरौल,
नामकुम, रांची (झारखण्ड)-834 010

1 टिप्पणियाँ

  1. जनाब अंकुश्री की लघु कहानी 'गुलाम मानसिकता' इतनी दमदार नहीं है, जितनी उनकी दूसरी लघु कहानियां आदत और निजी अस्पताल बेहतर है । इनके लिए मेरा सुझाव है कि वे कहानी में ऐसी अंतिम घटना देनी चाहिए जिससे कहानी का उद्देश्य और शीर्षक के नाम का बोध होता हो ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित (लेखक - डोलर-हिंडा)

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