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व्यंग्य // तुमने कर्ज़ लिया क्या ? // ओम वर्मा

व्यंग्य

             तुमने कर्ज़ लिया क्या ?

ओम वर्मा

सांता क्लॉज़ इतने परेशान कभी न थे।

पहले सिर्फ ईसाई परिवार के बच्चे उनकी राह तका करते थे। अब सबको उनका इंतज़ार रहता है। मजबूरन उन्हें अपने कुछ नए क्लोन पैदा कर आर्यावर्त पर भेजने पड़े थे। इनके वस्त्र भले ही लाल न हों मगर जो खुद इतने बड़े माई के लाल हैं कि अपने थैलों में साइकिलें, दो सौ रु वाले बिजली के बिल, तीर्थ यात्राओं के टिकट, जनम से लेकर परण और मरण तक के लिए नकद राशि के लिफ़ाफ़े लिए सालों घूमते रहे। इनका हर दिन ‘बड़ा दिन’होता था। उनकी विकास की गंगा गंगौत्री से निकलकर कब मुफ़्त उपहारों की गंगा में बदल गई, उन्हें ही पता नहीं चला।

कालांतर में इन क्लोनों में भी टकराव हो गया। क्रिसमस पर्व पर अक्सर गाए जाने वाला गीत "सांता क्लॉज़ इज़ कमिंग टु टाउन" में वर्णन है कि सांता क्लाज पूरी दुनिया के बच्चों की उनके व्यवहार के अनुसार  उपहार देने के लिए एक सूची बनाते है जिसमें उन्हें ‘अच्छे’ और ‘शरारती’ ऐसी दो अलग अलग श्रेणियों में रखा जाता है। फिर क्रिसमस की पूर्व संध्या वाली रात वे दुनिया के सभी अच्छे बच्चों को खिलौने, केंडी और अन्य उपहार देते हैं और कभी कभी शरारती बच्चों को ‘कोयला’ देते है। इस काम के लिए वह अपने एक बौने की सहायता लेते हैं जो वर्कशॉप में उनके लिए खिलौने बनाते हैं और रेंडियर उनकी गाड़ी को खींचते हैं। बौनों से तो इनका दरबार भरा रहता है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए नए क्लोनों ने भी दो सूचियाँ बनाईं- एक वे जो क़र्ज़दार हैं और दूसरी उनकी जो या तो क़र्ज़ अदा कर चुके हैं या जिन्होंने कभी क़र्ज़ लिया ही नहीं। क़र्ज़दारों के लिए हालाँकि क़र्ज़ देने वालों ने ही यह विकल्प भी खुला रखा था कि वे भरपूर क़र्ज़ लेकर ऐसी जगह हिज्रत कर जाएँ जहाँ कोई उनकी शांति भंग न कर सके।

अकस्मात इन सांता क्लॉज़ों को यह इल्हाम हुआ कि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो या तो क़र्ज़ ले ही नहीं रहे हैं  या लेते हैं तो उन्हें समय पर चुकाने की बीमारी लगी हुई है। इन्हें सुधारना बहुत ज़रूरी है। इनका इलाज बहुत ज़रूरी है। आख़िर इन्हें ठीक करने का उपाय भी नए सांता को सूझ ही गया। सारे क़र्ज़दारों ने ‘लूट सके तो लूट’ का उद्घोष करते हुए अपने बदबूदार मौजे बाहर दरवाजों पर लटका रखे थे। सुबह देखा तो मौजों में ऋणमुक्ति प्रमाणपत्र रखे मिले। ये आधुनिक सांता चाहते हैं कि हर क़र्ज़दार चार्ल्स डिकेंस के क्लासिक उपन्यास ‘डेविड कॉपरफील्ड’ के पात्र मिकॉबर की तरह क़र्ज़ा लेकर भी हँसता-मुस्कराता रहे। वे महर्षि चार्वाक के सच्चे अनुयायी हैं और उन्होंने अपने कार्यालय में उनकी एक आदमक़द तस्वीर भी लगा रखी है जिसके नीचे उनकी सूक्ति स्वार्णाक्षरों में लिखवा रखी है-

‘यावज्जजीवेत सुखं जीवेत

ऋण कृत्वा घृतं पीबेत ।

भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:”।

यानी “जब तक जियो सुख से जियो, कर्ज लेकर घी पियो, शरीर भस्म हो जाने के बाद वापस नहीं आता है।“– चार्वाक

कल तक जो बैंकों के आर्थिक रूप से क़र्ज़दार थे, अब वे उनके नैतिक रूप से ऋणी हो गए हैं। जो पहले अदा कर चुके हैं उन्हें अपनी ‘मूर्खता’ पर पछतावा हो रहा है। सदियों  पुराना भोगवादी चार्वाक दर्शन आज आर्थिक नीतियों की रगों में लहू बनाकर दौड़ाया जा रहा है। हक़ और हलाल की कमाई खाने का उपदेश किताबों में कहीं दबा सिसक रहा है। क़र्ज़ का धन अब समाज में लज्जा का नहीं, सम्मान का विषय बनता जा रहा है। खुद को धरतीपुत्र मानने वाला किसान अब हमारे लिए किसान या अन्नदाता नहीं बल्कि राजनीतिक आईपीएल के मैदान में खड़ा वह क्रिकेट खिलाड़ी हो गया है जिसको उसकी औक़ात या उपयोगिता अनुसार बोली लगाकर हम ख़रीद रहे हैं।   

बस तुम्हें अगले मैच में हमारे लिए रन बनाने हैं!

***

ओम वर्मा       

100, रामनगर एक्सटेंशन

देवास 455001(म.प्र.)

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