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सर्दियों में गर्मियों की सज़ा - राजकुमार कुम्भज

इस बरस सर्दियों में गर्मियों जैसी तपिश की सजा़ मिल सकती है। बारिश के मौसम में मॉनसून की मनमानी से परेशान किसानों और आम लोगों को इस बरस की सर्दियों के दौरान भी राहत की उम्मीद नहीं है। पिछले कुछ वर्षों की तुलना करते हुए इस बरस सर्दी का असर थोड़ा कम दिखाई देने की आशंका है। आशंका यह भी है कि इस बरस रबी की फ़सल के लिये हालात शुष्क रहेंगे और सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से अधिक बना रहेगा। सामान्यतः सर्दियों के आगमन का संकेत अक्टूबर से मिलने लगता है, लेकिन इधर नवम्बर बीत गया है और दिसम्बर चल रहा है, किंतु सर्दियों का सांकेतिक पता भी नहीं मिल रहा है। घरों-दफ़्तरों मे पंखे चल रहे हैं और कहीं-कहीं तो कूलर तथा एयर कंडीशनर भी सेवाएँ दे रहे है। ज़ाहिर है कि ये सब जलवायु-परिवर्तन की वज़ह से ही देखने को मिल रहा है। इस सबका एक सीधा-सा आशय यही है कि हमें सर्दियों में गर्मियों की सजा़ मिल रही है।

पुणे स्थित भारतीय मौसम विभाग में कार्यरत् जलवायु निग़रानी और विश्लेषण-समूह का कहना है कि प्रशांत महासागर में अलनीनो की मौजूदगी के मद्देनज़र ही यह सब हो रहा है। अगले कुछ महीनों तक अलनीनो की उपस्थ्ति से प्रशांत महासागर के तापमान में वृद्धि हुई है और वह धीरे-धीरे अरब सागर की तरफ़ बढ़ रहा है। जिसका असर भारतीय उपमहाद्वीप पर पड़ना तय है। अलनीनो का प्रभाव दक्षिण में भूमध्यतटीय क्षेत्रों की ओर बढ़ने की आशंका बनी हुई है। इसका असर जनवरी तक बना रह सकता है। इस वज़ह से हमें सर्दियों में भी गर्मियों जैसी तपिश की सज़ा मिल सकती है। हालांकि अभी यह कह पाना तो ज़रा कठिन ही है कि इस बरस की सर्दियों में औसत तापमान वृद्धि कितनी रहेगी। फिर भी सामान्य सर्दियों के उलट बहुत कुछ हो सकता है और गर्मियाँ अपना असर दिखा सकती हैं।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अलनीनो के प्रभाव से समुद्री सतह का तापमान बढ़ने लगता है। जिसकी वज़ह से तटीय इलाक़ों में तापमान बढ़ जाता है। अरब सागर और प्रशांत महासागर में अलनीनो मौजूद है। अलनीनो की यह मौजूदगी, भारत में, सर्दियों के दौरान तापमान, औसत से अधिक रखेगी। तापमान में औसत गिरावट न आने से रबी की फ़सल के लिए शुष्क हालात रह सकते हैं, जिससे फ़सलें प्रभावित होंगी और हमें सर्दियों के मौसम से वंचित तक होना पड़ सकता है। ईश्वर को कोसना व्यर्थ है; क्योंकि ये सब करा-धरा हमारा ही है।

भारत के उत्तरी राज्यों में सर्दियों के दौरान प्रायः जनवरी माह में पश्चिमी विक्षोभ की वज़ह से बारिश का संक्षिप्त-संस्करण देखने को मिलता है। जिसे स्थानीय भाषा में ’मावठा’ कहा जाता है। जो कि रबी की फ़सल के लिये लाभदायक माना जाता है। बारिश का यह संक्षिप्त-संस्करण तापमान में गिरावट की मूल वज़ह बनता है, लेकिन इस बरस अलनीनो के संभावित प्रभाव के मद्देनज़र पश्चिमी विक्षोभ भी प्रभावित होगा और सर्दियों में गर्मियों की वज़ह बनेगा। कम सर्दियों की वज़ह से सामान्य जन-जीवन प्रभावित हुए बगै़र नहीं रहेगा। साधारण सर्दियों में साधारण तापमान से अधिक तापमान का होना अच्छा संकेत नहीं है। यह तो उल्टे बांस बरेली हुए!

जलवायु परिवर्तन ने दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक युग के प्रारंभ की तुलना में एक डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। अगर तापमान वृद्धि की गति यही बनी रही, तो वर्ष 2040 तक 1.5, वर्ष 2065 तक 2 डिग्री तथा वर्ष 2100 तक 4 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ जाएगा। केरल की बाढ़ से लेकर कैलिफोर्निया की आग तथा सूखे, तूफ़ान और ग्लेशियरों के पिघलने तक से हुई तापमान की एक डिग्री वृद्धि ने ही दुनियाभर में तबाही मचा दी है। तापमान वृद्धि अगर डेढ़ डिग्री पर रोकी नहीं गई, तो निर्धन वर्ग की रक्षा करना मुश्किल हो जाएगा, जबकि दुनिया साढे़ तीन डिग्री सेल्सियस तापमान की ओर दौड़ रही है। वायु-प्रदूषण से भारतीय लोगों का जीवन, चार बरस घट रहा है और दुनिया में प्रतिवर्ष तीस लाख लोग मर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम संगठन का अनुमान है कि इस बरस सर्दियों में अलनीनो आ सकता है। जिससे सर्दियों में गर्मियाँ बढे़ंगी।

प्रशांत महासागर में गर्मधारा अलनीनो का बनना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। अलनीनो के बनने से समूची दुनिया का मौसम प्रभावित होता है। अलनीनो की धारा ताक़तवर होने से अक़सर कई स्थानों पर औसत तापमान में वृद्धि हो जाती है और कई इलाक़ों में सूखे जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। अलनीनो की गर्मधारा अभी स्थिर नहीं हुई है। भारत में अलनीनो का असर सर्दियों के दौरान देखने को मिलेगा। अलनीनो की प्रक्रिया प्रशांत महासागर में गत कई महीनों से चल रही है। इसी कारण जून से सितम्बर के महीनों में देश के कई इलाक़ों में सामान्य से कम बारिश हुई है। इसीलिए हम कह सकते है कि इसका असर सर्दियों के मौसम में दिखाई देगा और बेहतरीन सर्दियों का बेहतरीन मज़ा जाता रहेगा।

हालांकि भारतीय मौसम विभाग ने इस बरस सामान्य से 97 फ़ीसदी बारिश होने का अनुमान लगाया था, जबकि 9.4 फ़ीसदी बारिश कम हुई और देश के कई क्षेत्रों में तो तीस फ़ीसदी से भी कम बारिश हुई। मौसम की चाल ने भारतीय नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है; क्योंकि मॉनसून प्रभावित 60 फ़ीसदी इलाक़ों में सिंचाई की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। गर्मियों के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ़ की फ़सल से देश की पचास फ़ीसदी खाद्यान्न-ज़रूरतें पूरी होती हैं, जिसकी निर्भरता पूर्णतः मॉनसून पर ही रहती है। मौसम के बदलते-बिगड़ते स्वभाव से सामान्य जन-जीवन, सामान्य काम-काज और सामान्य कृषि-व्यवस्था का प्रभावित होना एक गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। सरकार ने इसके समाधान के लिए कुछ नीतियाँ ज़रूर बनाई हैं, लेकिन ज़रूरी तंत्र का अभाव पूर्ववत् ही बना हुआ है। सरकारी जुमलेबाज़ी और क्रियान्वन के बीच की सच्चाई बहुत कुछ बयान कर देती है। कथनी-करनी के बीच की दूरी, कभी-कभी जीवन-मरण का प्रश्न भी बन जाती है।

पिछले दिनों मुंबई का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच गया था, जो कि सामान्य से तक़रीबन 4 डिग्री सेल्सियस अधिक था। लोगों को धूप और गर्मी की तपिश से बचाव के लिए छाते और चश्मे निकालने पडे़। तापमान वृद्धि की वज़ह से मुंबईकरों को भारी मुसीबत उठानी पडी। यहाँ तक कि दोपहर के वक़्त में बाहर निकलने वाले लोगों को पसीने से तरबतर, छाँव की तलाश में भटकते देखा गया। सर्दियों के दिनों में गर्मियों की सज़ा ने पिछले दस बरस का रिकॉर्ड सिर्फ़ दूसरी बार में ध्वस्त किया है। चिकित्सकों के द्वारा भी लोगों को संभलकर बाहर निकलने की हिदायत दी गई । यह सब ग्लोबल वार्मिंग और मनुष्यों की मूर्खतापूर्ण लिप्सा का नतीज़ा है।

मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक़ मुंबई को फ़िलहाल गर्मी से राहत मिलना संभव नहीं लग रहा है। पुणे सहित इन्दौर का भी यही हाल है। दरअसल मॉनसून के आखिरी दिनों में इन इलाक़ों में बारिश कम हुई है, जिसकी वज़ह से सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है। मॉनसून की अकस्मात हुई विदाई ने भी इधर चौंकाया है। निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्कॉईमेट का कहना है कि पिछले कई दिनों से मौसम की बेरूखी रहने से बेहद सूखा बना हुआ है। आसमान साफ़ है और तापमान में वृद्धि हो रही है। यह वृद्धि कब तक बनी रह सकती है, कहना कठिन है। स्काईमेट के अध्यक्ष महेश पलावत कहते हैं कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को लेकर स्कॉईमेट का पूर्वानुमान बिल्कुल सटीक रहा है। स्कॉईमेट ने सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान लगाया था, जबकि पुणे स्थित भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान ग़लत साबित हुए हैं। भारतीय मौसम विभाग द्वारा जारी की गई मौसम भविष्यवाणी में 97 फ़ीसदी बारिश होने का अनुमान लगाया गया था, जोकि ग़लत साबित हुआ और बारिश, घोषित किए गये 97 फ़ीसदी से 9.4 फ़ीसदी कम हुई, जबकि देश के अन्य कई इलाक़ों में तो 30 फ़ीसदी से भी कम बारिश हुई।

दक्षिण एशिया के नेपाल क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के लिए सतर्क रहने और इसके लिए काम करने की तमाम योजनाएँ अपनाने का दावा करने के बावजूद, हम उल्टी दिशा में ही जा रहे हैं। हमारे पास इसके ख़तरों से निपटने के लिए अब बहुत लंबा वक़्त नहीं है। यदि हम अपनी विकास योजनाओं और अर्थव्यवस्थाओं में आमूलचूल परविर्तन नहीं ला सके, तो इसकी भयावहता हमारा सर्वनाश कर सकती है। चारों तरफ़ लंबे समय से सूखा चल रहा है। तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है। पृथ्वी पहले से कहीं ज़्यादा तप रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। कार्बन-उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्ति से भटक रहा है। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हुए लगभग सभी देश बहानेबाज़ी कर रहे हैं। मौसम के बदलते मिजाज़ से कभी-कभी भारी बारिश भी हो जाती है, जिसकी वज़ह से कृषि बर्बाद हो रही है, जबकि दुनियाभर के कई-कई देशों के जंगल जल रहे हैं।

उधर पौलेंड के कोरेनिक्स शहर में इसी माह अर्थात् 3 दिसम्बर से 14 दिसम्बर तक जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का सीओपी अर्थात् ’कांफ्रेंस ऑफ पॉर्टीज’ -24’ हो रहा है। जिसमें इस बार दुनियाभर के देशों पर ग्रीन हाउस उत्सर्जन कटौती के नए लक्ष्य घोषित करने का दबाव होगा। सीओपी-24 में भले ही इसके लिए तैयारी भी की जा रही हो, लेकिन उसके पास अपने प्रयासों के नाम पर दिखाने लायक़ कुछ ख़ास नहीं है। कुछ ख़ास करने की ज़िद से ही ये दुनिया बचेगी।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने बिल्कुल सही कहा है कि जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते से बढ़कर दूसरा कोई विकल्प नहीं है। अब से तीन बरस पहले फ्रांस की राजधानी पेरिस में दुनियाभर के 197 देशों में से 184 देशों ने जलवायु समझौते के तहत अपने-अपने देशों सहित, सामूहिक दायित्व भी तय किए थे, जो कि लंबे विचार-विमर्श के बाद ही संभव हो सके थे और कि जिसमें भारत सहित बराक ओबामा की भूमिका भी ख़ासतौर से महत्वपूर्ण रही थी। भारत की ओर से अपने तय लक्ष्य पूर्ति के लिए बहुत कुछ सकारात्मक काम किए गए हैं, किंतु अमेरिका साझेदार होते हुए भी पीछे हट गया। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस समझौते से बाहर कर लेने के बाद पुनर्विचार की बात कहीं है। देर आयेद, दुरूस्त आयेद।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि पेरिस समझौते में रूस और चीन को छूट मिली हुई है। भारत को विकासशील देश होने के निमित्त क्षतिपूर्ति मिलेगी, जबकि सिर्फ़ अमेरिका के हाथ-पाँव बांध दिए गए हैं, लेकिन ट्रंप यह क्यों भूल जाते हैं कि भारत, रूस और चीन से कहीं ज़्यादा कार्बन-उत्सर्जन एक अकेला अमेरिका करता है? पृथ्वी, वायुमंडल और जलवायु परिवर्तन के संबंध में, संकल्प और साहस सहित सामूहिकता की ज़रूरत हैं, तभी संसार सभी के लिए सुरक्षित हो सकता है, वर्ना सर्दियों में गर्मियों की सज़ा का विस्तार होता रहेगा। प्रकृति-प्रकोप से बचना मुश्किल है।

सम्पर्क-331, जवाहरमार्ग, इंदौर-452002

ईमेलः rajkumarkumbhaj47@gmail.com

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