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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक 'डोलर-हिंडा' का अंक १३ “पहला नशा” लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक का अंक १३ “पहला नशा”

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“नमकहरामों। नालायकों, रात-दिन मुझसे हलुआ-मांडा खाकर सांड की तरह पड़े रहते हो..? मगर बड़े भैय्या के लिए चन्दा इकट्ठा करते तुम्हारी मां मरती है, वहां तुम्हारी इज़्ज़त का सवाल खड़ा हो जाता है...तुमसे तो वे भिखारी कहीं अच्छे, जो हरिद्वार के गंगा-तट पर बैठकर स्वर्ग-नर्क बेचते हुए रोज़ पच्चास रुपये अपनी अंटी में बाँध लेते हैं।”

सुदर्शन बाबू ने देखा ‘परहित धाम’ नाम के उस शाही दरबार में एक ऊंची चौकी पर धवल वस्त्र पहने त्रिपुंड धारी मिडल स्कूल बिठुड़ा-पीरा के हेड मास्टर मक्खन लाल, अपने शागिर्द मास्टरों पर अंगारों की तरह बरस रहे थे। उनके सामने टेबल पर, कुछ अधकटी रसीद-बुकें, चंद नोट और कुछ सिक्के पड़े थे।

सुदर्शन बाबू पर नज़र गिरते ही, मक्खन लालजी की भृकुटी धरती पर उतर आयी। और, वे बोले “आओ पी.ए. साहब। तुम भी, कौनसे कम हो ? मगर, इन हरामखोरों से तो अच्छे हो। बड़े भैय्या साहब का हज़ारों का फ़ायदा करवाते हो, मगर एक पैसा नहीं माँगते उनसे।” फिर, आगे कहते गए “इन हरामखोरों से भी मिलिए, आप। दिन-रात में, कुल मिलाकर सौ-सवा सौ की रबड़ी चाट जाते हैं। दूध में केसर न पड़ी हो तो, वह दूध इनके हलक़ से नीचे नहीं उतरता। मगर चन्दा उगाहकर लाते हैं, मात्र पांच रुपये..? लानत है, इन पर। पेट बजाते और गिड़गिड़ाते हुए शर्म आती है, इनको। इनसे तो अच्छा मुफ़त लाल था, मान्यता के नाम पर दिन में बीस प्राइवेट स्कूलों में फिर जाता था..कहता-फिरता “कटा चंदे की रसीद, मान्यता फ़ेहरिस्त में पहली तेरी स्कूल होगी।” और फिर उसे सहज ही, मूंड लेता। आज़ ससुर ख़ुद परमोशन पा गया, मुझे धता बताकर।” इतना कहकर उन्होंने सुदर्शन को इस तरह देखा, जैसे वह सुदर्शन न होकर मुफ़तिया ही हो..?

भला, सुदर्शन क्या बोलते ? बेचारे मक्खन लालजी की सोच, उनके अनुसार सही हो..जब भी वे दफ़्तर से आते यही सुनते...साहब कहाँ गए ? साहब गए होंगे, बाबू सुदर्शन के साथ स्कूटर पर बैठकर।

ज़िला सिक्षा अधिकारी का असली नाम, कोई बिरला ही जानता हो..? कोई उन्हें कलाकार भाई कहते, तो कोई उनको कहते बड़े भैय्या। अक्सर वे बड़े भैय्या के नाम से ज़्यादा फेमस थे, ज़माना आर.एस.एस. के पॉवर में रहने का था..इसलिए, लोगों को भाई साहब या बड़े भैय्या कहने की जो आदत बन गयी। ये बड़े भैय्या, भी कैसे..? वे भी इस संस्था के सिद्धांतों के अनुसार बाहें फैलाए मुलाक़ाती से मिला करते थे, वह भी बड़े प्रेम से। तब मुलाक़ाती सज्जन के मुख से, अपने-आप उनके लिए “बड़े भैय्या” अल्फ़ाज़ ही निकला करता।

कलाकार भाई से मतलब हमारा बड़े भैय्या से है, बड़े भैय्या में संस्था बनाने व चन्दा वसूली के गुण वंशानुगत नहीं थे। वह सब उन्होंने, मां के पेट से जन्म लेने के बाद ही सीखे थे। उनके पिता एक स्वनामधन्य रिश्ता जोड़ू पंडित थे। जिनके दीवानख़ाने पर, शहर के सारे कुंआरे बच्चों के मां-बाप बच्चों की जन्म-पत्री लिए नियम से हाज़री देते थे। चपरासी से लेकर अफ़सर तक और सेठ से लेकर हमाल तक के रिश्ते, चुटकियों में तय करवा देते थे। शहर में किसकी कुड़ी, किसके कुड़े के साथ इश्क करती है ? सारी ख़बरें पाने के लिए, उन्होंने अपने विश्वस्त आदमियों के ज़ाल फैला रखे थे। इन ख़बरों के माध्यम से, इनके पिताश्री का पुश्तेनी धंधा अच्छा चलता था। आज़ की भाषा में, हम उन्हें एजेंट भी कह सकते हैं। इस प्रकार एजेंटों के माध्यम से, बड़े भैय्या ने भी अपना धंधा अच्छा-ख़ासा जमा रखा था। वे कई साहित्य-गतिविधियाँ कराते रहते थे, उसके लिए उन्होंने कई कमेटियां गठित की होगी ? उनकी कोई संख्या नहीं। हर कमेटी में कर्ता-धर्ता वे स्वयं बनते, और उनका सेक्रेटरी बनते उनके दोस्त हेडमास्टर मक्खन लालजी।

मक्खन लालजी बड़े भैय्या के थे, लंगोटिया यार..बचपन में साथ ही कबड्डी खेली थी, मगर पिछड़ गए ज़िंदगी की दौड़ में। बड़े भैय्या ने कमेटियों के साथ-साथ, अपने केरियर का भी ध्यान रखा। जिससे थर्ड ग्रेड अध्यापक से उन्नति करते, ज़िला शिक्षा अधिकारी बन बैठे। मगर मक्खन लालजी जहां के तहां, उन्हें तो कमेटियों के ऊपर की कमाई पर मक्खन नज़र आता था। आख़िर एक दिन बड़े भैय्या की मेहरबानी से पदोन्नति पाकर मिडल स्कूल के हेडमास्टर बन गए, वह भी घर से कुछ क़दम दूर स्थित स्कूल में। बड़े भैय्या के ज़िला शिक्षा अधिकारी बन जाने से, उनको हो गयी पौ-बारह। मास्टरों की पदोन्नति, तबादले करवाना और प्राइवेट स्कूलों को मान्यता दिलाना उनके बाएं हाथ का काम बन गया। किसी मास्टर को कहाँ से हटाना, और उस पद को वापस भरने के लिए किस मास्टर को वहां फिट करना..सारी बातें अपने कंप्यूटर दिमाग़ में, उसका नक्शा हर पल बनाये रखते थे हमारे मक्खन लालजी। जब भी बड़े भैय्या से उनके दीवानख़ाने पर मुलाक़ात होती, तब इधर-उधर की गप-शप के बाद बिछा देते थे तबादले के नक़्शे को। कभी-कभी बड़े भैय्या नाराज़ हो जाते, और कह देते “यार हमसे नहीं होता, कुछ तो नियमों का ख़्याल रखना होगा।” मगर, मक्खन लालजी उनको कहाँ छोड़ने वाले ? वे कह बैठते “ज़िला शिक्षा अधिकारी हो, अपने ज़िले में ही कुर्सी बनाए रखने के लिए लोग चौबीस घंटों सर के बल दौड़ा करते हैं, अब सुनो..पुरानी कथा है..वह एक राजा थे ना, भला सा उनका नाम था उनका..क्या नाम था ? हाँ, शिवी, शिवी ने तराज़ू के एक पलड़े पर कबूतर को बैठाया, और दूसरे पलड़े पर अपने शरीर का गोश्त काट-काटकर रखने लगे..इस तरह उन्होंने अपना पूरा शरीर चढ़ा दिया तराज़ू पर, फिर भी कबूतर भारी रहा।” इतना कहने के बाद उन्होंने बड़े भैय्या को ज़ोर से कोहनी मारी, और बोले “सुन रहे हो ना, वह कबूतर कोई चिड़िया-विड़िया नहीं थी..वह गद्दी थी। उस वक़्त राजा को भी, आज़ के ज़िला शिक्षा अधिकारी की तरह अनचाही क़ुरबानी देनी पड़ती थी। उस वक़्त का राजा, और आज़ का ज़िला शिक्षा अधिकारी है। अब बेशक तुम्हें अनचाही क़ुरबानी भी देनी पड़े – धर्म-कर्म, दोस्त-एहबाब सब चौराहे पर नंगे करने पड़े, वह गद्दी फिर भी वज़नी बनी रहती है। ...यह गुर अगर समझ लोगे तो, फ़ायदे में रहोगे। तुम तो गोस्वामी तुलसी दास के पुजारी हो, उनके काव्य पर पी.एच.डी करके भी भूल गए ? सबसे ऊंची गद्दी राम की। हम लोग राम को “है राम” पुकारते हैं, ऐसा बापू ने भी कहा था। बापू पर आप अफ़सर लोग थोक में भरोसा करते हैं, और तुम यह भी जानते हो ये अफ़सर लोग पाश्चात्य सभ्यता को अपनाते हुए बोलते वक़्त हिंदी शब्दों को छोटा कर देते हैं। अत: ये लोग ‘है’ के स्थान पर ‘ह’ बोलते हुए ‘’है राम’’ के स्थान पर ‘ह राम’ बोल देते हैं। इसलिए कहता हूँ उसके लिए राम की नहीं “ह राम”.... मतलब, हराम की गद्दी ऊँची होती है। सो तुम उसी को प्राप्त करो, कल्याण होगा।” फिर, आगे फुसफुसाए “सच्च तो यह होगा गृह-ज़िला पकड़े रखोगे, जितना गुड़ डालोगे..उतना मीठा होगा। चलो, चलो। अब मैं, सब समझा दूंगा।” इतना कहकर उन्होंने उन्हें साथ लेकर, अपने बंगले ‘परहित धाम’ की ओर बढ़ चले। उनके साथ बेचारे सुदर्शन को, लिहाज़ के मारे साथ जाना पड़ा।

बंगला क्या था ? भव्य प्रासाद था। जहां रहते थे, स्वधाम धन्य संत समान हेडमास्टर मक्खन लालजी। अब बड़े भैय्या मक्खन लालजी के गले में बाहें डाले बढ़ चले, उनके व्यक्तिगत कक्ष की ओर। जहां बाहर एक बोर्ड लगा था, जिस पर स्वर्णिम अक्षरों से लिखा था “समाधि कक्ष”। कितनी लाज़वाब थी वहां की एक-एक चीज़..एकदम चार्वाक दर्शन की तरह दर्शनीय। राणकपुर की अनुकृतियां सचमुच कितनी भावुक [?] बना देती है..इंसान को ? आसन देकर, मक्खन लालजी बोल पड़े “तुम तो अफ़सरी करने चले गए, मगर समितियों के काम के अलावा मैं तंत्र-मन्त्र का भी धंधा खोल बैठा। जानते हो ? पूरी तहसील में, मौनी बाबा के नाम से विख्यात हूँ।” इतना कहकर, उन्होंने अलमारी से सोम-रस की बोतल बाहर निकाली। फिर फ्रीज़ खोलकर, बर्फ़ और सोडा बाहर निकाला..और सामने आ जमें, मक्खन लालजी। एक ज़ाम पीने के बाद, बड़े भैय्या को चुप देखकर बोले “तुम्हें बार-बार तबादले के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं नेताओं के, मगर मेरी तंत्र साधना के चमत्कार देख ये नेता-मंत्री सभी परहित धाम के चक्कर लगाते हैं।”

“क्या, तुमने तांत्रिक पाल रखे हैं ?” सोम रस की ख़ाली ग्लास को चाटते बड़े भैय्या बोले, क्योंकि सोमरस की बोतल तो मक्खन लालजी के हाथ में थी।

“तांत्रिक पाले, मेरी जूती। तांत्रिक पालने से तो अच्छा है, स्वयं तांत्रिक बनना। जानते हो, किसी तांत्रिक के मुख पर हज़ारों के नोट मारे और उस कमबख़्त ने छह-सात जादू सिखा दिये..उससे कमा लिए हमने, लाखों रुपये।” इतना कहकर उन्होंने अपनी जेब से सिगरेट बाहर निकाली, उसे बड़े भैय्या को थमाकर बोले “मैं उंगली के इशारे से, इसको जला दूंगा। समझ गए, बड़े भैय्या ?”

कमाल हो गया..! मक्खन लालजी ने उंगली का इशारा किया, और इधर सिगरेट लगी सुलगने।

“यार तू तो योगी बन गया, पूरा। मगर, उस तांत्रिक को देने के लिए रुपये कहाँ से लाया ?” आश्चर्य-चकित होकर, बड़े भैया बोल उठे।

“अफ़सर बन गए, ख़ाक..? अक्ल कहाँ रखकर आते हो, बड़े भैय्या ? समितियां बनवाई, अभिनन्दन-ग्रन्थ छपवाए इन सेठ-साहूकारों और नेताओं के। उनका काम क्या मुफ़्त में होता है, क्या ? इन सालों की दो नंबर की कमाई दूह ली मैंने, तभी तो यह परहित धाम कुटिया बना पाया हूँ।” मक्खन लालजी मुस्कराते हुए बोले।

“वाह, उस्ताद वाह। क्या कहना है, एक तू और एक मैं ? नेताओं को तू लूट लेता है, और मैं उनको चढ़ाता हूँ प्रसाद अपना तबादला रोकने के लिए। वाह, क्या हीरा है तू ?” मक्खन लगाकर बड़े भैय्या ने, मक्खन लालजी को भी शर्मिन्दगी महसूस करवा डाली। अब क्या शेष रहा, जानने को ? तबादले के दर्शाये नक़्शे को, अमल में लाना ही अक्लमंदी होगी..नियमों से ना तो पेट भरा जाता है, और ना इन मंत्री-नेताओं को ख़ुश रखा जा सकता है। जब ऊपर से नीचे तक, यही ढंग है..तो इनके ज़ाल से, कैसे बचा जा सकता है ? आख़िर, पानी में रहकर मगर से बैर कब-तक ? आख़िर, बकरे की मां कब-तक ख़ैर मना सकती है ? क्योंकि, हलाल तो होना ही है।

“ख़ाक हीरा हूँ ?” मक्खन लालजी ने प्रतिवाद किया “कोहिनूर कहो, यार। ये कूकने वाले सारे नेता, अख़बार वाले, सेक्रेटरी सभी मेरी चंगुल में है। फिर, काहे चिंता करते हो यार ? बस तुम बोलो जय श्री कृष्ण..और आज़ से ही काम चालू।”

फिर ज़मीन पर फैलाए चार्ट को, उनके नज़दीक लाते हुए बोले “श्री कृष्ण ने गीता में क्या कहा ? कर्म करो, और फल की इच्छा मत करो। बस, हम तो उनके ही चेले हैं।”

इस प्रकार येन-केन मक्खन लालजी ने, ज़िला शिक्षा अधिकारी बड़े भैय्या को अपने ज़ाल में फंसा ही लिया। उनकी गरमा-गरम वार्ता से, परहित धाम की नीरवता भंग हो गयी। बड़े भैया के परहित धाम में आने के समाचार, आकाशवाणी की तरह फ़ैल चुके थे। अत: कुछ ही देर में, परहित धाम के टेलीफ़ोन की घंटी बजनी शुरू हो गयी। टेलीफ़ोन के सन्देश सुनने के लिए, मक्खन लालजी ने जैसे ही क़दम आगे बढ़ाए..सुदेशन बाबू ने अच्छा मौक़ा पाकर, झट वहां से रुख़्सत हो गए। उनको भय था, ‘यदि अधिक देर वहां रुक गए तो यहाँ आने-जाने वाले अध्यापक भाई, उनको तबादले का एजेंट न समझ ले..?’ आख़िर काज़ल की कोठरी से, बेदाग़ बाहर निकलने का एक मात्र उपाय है, यहाँ से नौ दो ग्यारह होना।

घर जाने के लिए बाबू सुदर्शन ने बस पकड़ी, इधर आसियत का अन्धेरा फ़ैलने लगा। थोड़ी देर में ही सवारियों से बस खचा-खच भर गयी, और ड्राइवर अपनी ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया। आख़िर, गाड़ी स्टार्ट हुई। सुदर्शन बाबू ने खिड़की से बाहर तब-तक नहीं झांका, जब-तक बड़े भैय्या का शहर आँखों से ओझल न हुआ। उन्हें भय था, कहीं त्रिपुंड धारी मक्खन लालजी का चेहरा उनके सामने न आ जाए..? और आकर उन्हें कह दे कि, “जांच में अमुख-अमुख अध्यापक को हटाने की कार्यवाही, शीघ्र शुरू कर दें..यह अमुख-अमुख अध्यापक साला, बदमाश है।” अब उनको, भली-भांति उनको ज्ञान हो गया “बड़े भैय्या और संस्थापन प्रभारी बाबू गरज़न सिंह, क्यों बार-बार जांच में दोषी पाए गए अध्यापकों की सूचि माँगा करते हैं ?

दोषी अध्यापकों को हटाने से ज़िले के विद्यालयों में अनुशासन की लहर पैदा होगी, इसी मंशा को मद्दे नज़र रखकर बाबू सुदर्शन और कार्यालय सहायक घीसू लाल ने मिलकर दोषी अध्यापकों की फ़ेहरिस्त तैयार की..इसके बाद पूर्व योजना के तहत बाबू गरज़न सिंह ने, दोषी अध्यापकों को तबादले द्वारा हटाने की कार्यवाही कर डाली। इससे जो भी स्थान ख़ाली हुए उन स्थानों पर पूर्व प्लान के अनुसार, इच्छुक अध्यापकों को तबादले द्वारा वहां लगाने की कार्यवाही करके....उन्होंने ज़िले में, तहलका मचा दिया था।

गहन अन्धकार फ़ैल गया, बस ने द्रुत गति पकड़ ली। नभ में उड़ती हुई कोई कुरज़ा नज़र न आ रही थी, ऐसा लगता था कि ‘ये परिंदे अपने नीड़ में, अपने चूज़ों के पास पहुँच चुके थे।’ तभी सुदर्शन बाबू की निग़ाह पड़ोस की खिड़की के पास बैठे किसी अध्यापक पर गिरी, जो ठंडी आह लेता हुआ बरबस बड़बड़ा रहा था “है भगवान। कब घर आएगा ? मुझे न देखकर, मेरे बच्चे रो रहे होंगे..? ग़लती मैंने की, और सज़ा मेरे बच्चों को मिली..मेरा अन्यंत्र तबादला होने से। अब इस खटारा बस से, रोज़ का आना-जाना करना पड़ रहा है।” उसके बोल सुदर्शन के कानों में पिघले लोहे की तरह आकर पड़े, पछताते हुए उनके दिल में यह आवाज़ उठी “कहीं ग़लती हुई है, मुझसे। कहीं इस अध्यापक के तबादले में मेरा सहयोग तो नहीं ? शायद कहीं दोषी अध्यापकों की फ़ेहरिस्त मेरे द्वारा तैयार की गयी हो, और उसका फ़ायदा बड़े भैया और बाबू गरज़न सिंह ने उठाया हो...?” मुख से, बरबस ये अल्फ़ाज़ निकल गए “पहला नशा न होता..क्या होता ?”

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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पाठकों,

कहिये, कैसा लगा यह अंक १३ “पहला नशा”। पहला नशा होता है, ख़तरनाक, अपने-आपको काबू में रखने के लिए इंसान को अपने होश नहीं खोने चाहिए। भावी परिणाम को पहले ही सोच लेना चाहिए कि, इस नशे से किसी का अहित न हो..? अब आप पढ़ेंगे, अंक १४ “लीडरी”। हास्यास्पद अंक है, आपको ख़ूब हंसी आयेगी इसे पढ़कर। बेसब्री से इन्तिज़ार कीजिये।

आपके खतों की प्रतीक्षा में

दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक – पुस्तक “डोलर-हिंडा”]

ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com

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