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दर्शन लेख - काँटा लगा हाय लगा ........ - कमल किशोर वर्मा

फिल्म समाधि का अमर लोकप्रिय गीत काँटा लगा, को लोग आयटम सांग या उचक्का गीत कहते हैं परन्तु मेरी नजर में यह एक गहन दार्शनिक भक्ति गीत है । कलमकार अपनी ओर से गीत रच देता है परन्तु उसका अर्थ, भावार्थ, निहितार्थ तो पढ़ने-सुनने वाला अपनी बुद्धि और मानसिक योग्यता अनुसार ही समझता है । यह गीत आशाजी की दिलकश आवाज, मादक गायकी का अंदाज और अपने संगीत सुर ताल के अद्भुत मिश्रण के कारण संगीत सागर का नायाब रत्न बना हुआ है । मैंने इस गीत का अर्थ अलग ही समझा है ।

गीत इस प्रकार शुरू होता है - बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे हाय रे पिया कांटा लगा ............. सबसे पहला प्रश्न है वो बंगले के पीछे क्यों गई ? मिलना ही था तो बंगले में जाती ? और बेरी के नीचे जाने से तो कांटा ही लगेगा , जैसी जगह जाओगे वैसा ही फल पाओगे ? बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय ? मधुशाला में शराब ही मिलेगी दूध थोड़ी मिलेगा ? कसाई के घर मांस ही मिलेगा, मावा थोड़ी मिलेगा ? बेर के नीचे तो कांटा ही मिलेगा, फिर शिकायत किस बात की ? और किसी ने जबरदस्ती वहाँ ले जाकर खड़ा तो नहीं किया ? वह तो अपनी मर्जी से गई । और यह कांटा चुभने की शिकायत करने वाली है कौन ?

यह बंगला क्या है ? सच्चिदानन्दन परब्रह्म परमात्मा का धाम ही बंगला है, ईश्वर ही उसका मालिक है। उस बंगले में प्रकाश ही प्रकाश है परन्तु उस बंगले के पीछे माया मोह लोभ पाप वासना ईर्ष्या द्वेष और वासना के घने अंधकार है और वहाँ स्वार्थ और पाप के कँटीले वृक्ष होते हैं वही तो बेरी है, वहीं पर आत्मा चली जाती है तब उसे काम क्रोध लोभ मोह के काँटे चुभ जाते है तब वह उस ईश्वर को पुकारती है कि हाय रे पिया कांटा लगा ....... क्यों कि सबका मालिक पिया वही तो है। मीरा ने कहा था- जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई । सांसारिक दुःख दर्द कष्ट झमेले में पड़ी आत्मा ही काँटे की शिकायत करने वाली दुखाया है ।

बिंदिया छिपाए रे लाली चुनर ओढ़ के मूँद के मुखड़ा अपना

निकली अँधेरे में दुनिया के डर से मैं सजना

रात बैरन हुई ओ रे साथिया

देख हालत मेरी, आ लेकर दिया ............ बंगले के पीछे ....

जब आत्मा संसार में आई, बिंदिया छिपाके अर्थात आत्मज्ञान और पवित्रता खोकर, लाली चुनर ओढ़ के अर्थात काम वासना और स्वार्थ के चक्कर में पड़कर, मूँद के मुखड़ा अपना अर्थात अपना विवेक त्याग कर, बिना सोचे समझे, दुनिया के डर से अर्थात जीवन के दुख से घबराकर सत्यमार्ग से विचलित हो गई अँधेरे की ओर चल पड़ी । रात बैरन हुई, जिसमें संसार जागता है वह योगी के लिए रात है और जब संसार सोता है तब योगी जागता है । ओ रे साथिया पति पत्नी कुटुम्ब कबीला सब एक दिन साथ छोड़ देते है अंत में ईश्वर ही साथी है । वह अपनी हालत भगवान को बताता है - देख हालत मेरी, आ लेकर दिया, यही तो आत्मा की पुकार है तमसो मा ज्योतिर्गमय, मुझे प्रकाश दो आ लेकर दिया,

आई मुसीबत तो अब सोचती हूँ मैं क्यूँ रह सकी ना तेरे बिन

सच ही तो कहती थी सखि्याँ फँसेगी तू इक दिन

भूल तो हो गई जो किया सो किया

तू बचाले बलम आज मोरा जिया ............ बंगले के पीछे ....

अब जब नाना प्रकार के काँटे उसे चुभ गए, उमर बीत चली शरीर ढलने लगा तब पश्चाताप हुआ । अब उस पर आई मुसीबत तो संसारी माया को कोसकर कहती है - अब सोचती हूँ मैं क्यूँ रह सकी ना तेरे बिन ? और सच ही तो कहती थी सखि्याँ फँसेगी तू इक दिन, ये सखि्यां कौन है ? ये ज्ञानेन्द्रियां हैं जो समय समय पर सचेत करती रहती थी कि भोग विलास में मत पड़, एक दिन पछताएगी । पर वो नहीं मानती थी । भूल तो हो गई जो किया सो किया, अब अपने समस्त शुभ अशुभ कर्म याद आए और ईश्वर से माफी माँग के विनती करती है - तू बचाले बलम आज मोरा जिया, बलम अर्थात जो बल पूर्वक रक्षा करे । जैसे बल पूर्वक गज की ग्राह से रक्षा करी ।

सबको पुकारे अनाड़ी न समझे ये मिलने का सारा जतन है

कैसै बताऊँ ये चाहत की सैंया चुभन है

ये वो काँटा सजन जाए लेकर जिया

नैन सुई लगे तो निकले पिया ............ बंगले के पीछे ....

सबको पुकारे अनाड़ी न समझे ये मिलने का सारा जतन है, उस पश्चाताप और प्रायश्चित को अनाड़ी संसार नहीं समझ सकता! वह संसार ईश्वर भक्ति में लीन मनुष्य को पागल और ढोंगी कहता है और नाना प्रकार के विषय भोग सुख के तामझाम सजाकर, बुलाकर, उनको उपलब्ध करवा कर, उसे बहकाने की कोशिश करता है । परन्तु उसके ये प्रयास तो मिलने का सारा जतन है। उसके हृदय में प्रभु मिलन की जो तीव्र लालसा उत्कण्ठा व्यग्रता है वही चाहत की सैंया चुभन है। ये वो काँटा सजन जाए लेकर जिया, लोग प्रभु प्रेम में घरबार संसार प्राण देह सबका मोह छोड़ देते हैं , तथा ये काँटा आत्मा को परमात्मा के पास लेकर ही जाता है। और ये काँटा नैन सुई लगे तो निकले पिया , नैन सुई क्या है ? प्रभु की प्रेम भरी चितवन कृपा दृष्टि हो तो ये काँटा निकले ! नहीं तो जनम जनम लगा ही रहेगा । यही तो समर्पण है , और जाना था बंगले में परन्तु जा पहुँची बेरी के नीचे यही तो प्रमाद है । यह प्रमाद तभी दूर हो सकता है जब बंगले वाला चाहे -

बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिन सुलभ न सोई ।


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लेखक परिचय

कमल किशोर वर्मा ,

दुर्गा कालोनी - कन्नौद

जिला देवास म.प्र.

कवि, लेखक, गीतकार, संगीतकार, चि़त्रकार, ज्योतिषी, हस्तरेखा विशेषज्ञ, सामुद्रिक शास्त्र, वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ, आयुर्वेद के ज्ञाता, प्राचीन भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ इतिहासकार ,दार्शनिक

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