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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक 18 - भेंगी आँखों वाला यानी बाडा लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “ डोलर-हिंडा ” का अंक 18 भेंगी आँखों वाला यानी बाडा लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित लेखक दिनेश चन्द्र पुर...

संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक डोलर-हिंडा का अंक 18

भेंगी आँखों वाला यानी बाडा लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित


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जब से यह एलिमेंटरी दफ़्तर हवाई-बिल्डिंग में शिफ्ट हुआ, तब से दफ़्तर के चपरासी रमेश कुमार चौहान की जन्म-पत्री में राहू के ऊपर शनि चढ़ गया। बार-बार दफ़्तर के काम से, इस हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियाँ गिनना..उसकी मज़बूरी बन गयी। और इसके अलावा, कैलाश बाबू सैन के साथ काम करने की पीड़ा...उससे बर्दाश्त नहीं होती। हुआ यूं, ‘इस कैलाश बाबू सैन में कई जातिगत गुण आ गए, जिसमें प्रमुख थे - दूर की हांकना, झूठ बोलना, अपने स्वार्थ के लिए एक-दूसरे को सियासती ज़ाल में फंसाना और फंसाकर गिराना, चमचागिरी करना वगैरा-वगैरा।’ एक दिन कैलाश बाबू ने अपने जाति के गुणों से वशीभूत होकर, घसीटा रामजी के पास झूठी-सच्ची ख़बरें पहुंचाकर उसने अपना फ़र्ज़ पूरा किया। उनका ‘अज़ीज़ बनने के परम-पद’ को हथियाने के लिए, उसने चुगल-खोरी जैसी रामबाण औषधि उपयोग में ले ली। बस इसके बाद उसका यही कहना पर्याप्त रहा, ‘बाबू गरज़न सिंह के पास, आपकी लेखा शाखा की गोपनीय ख़बरें कैसे चली जाती है? ख़बरों को पहुँचाने का काम, कौन करता है?और आगे यह भी कह देना कि, आप तो बड़े भोले हैं, हुज़ूर। यह रमेशिया है, ना..? जो आपकी शाखा में ताक-झाक करता-करता, ००७- जेम्स बांड की तरह सारी गोपनीय ख़बरें पोटली में डालकर बाबू गरज़न सिंह को परोस देता है।

यह ख़बर सुनकर, लेखाकार घसीटा राम तुनककर बोले “क्या कहा, अभी-तक वह सुधरा नहीं..कमबख़्त?”

“अजी क्या सुधरे, उसके बाप-दादा भी नहीं सुधरे हुज़ूर..। कल की बात है, मैंने कचरा निकालते वक़्त इस काठ के उल्लू को रंगे-हाथ पकड़ा..यह देखो, जनाब।” इतना कहकर, कैलाश बाबू सैन ने झट अपनी जेब से एक तुड़ा-मुड़ा काग़ज़ बाहर निकालकर उनके सामने प्रस्तुत किया।

“अब कहिये, हुज़ूर। यह शिकायत-पत्र है..गरज़न बाबू के खिलाफ़ सबूत एकत्रित करके, आपने साहब को शिकायत लिखी थी..। हुज़ूर, अब आपसे क्या कहूं? शिकायत-पत्र को प्रस्तुत करने के पहले ही, यह कमबख़्त इसे चुरा बैठा...आपकी लेखा शाखा से। यह तो मैंने इसे रंगे-हाथ पकड़ लिया, न तो यह मर्दूद आपकी खटिया खड़ी कर देता।” इतना कहकर, कैलाश बाबू सैन ने कटीली मुस्कान अपने लबों पर फैलाई। कैलाश बाबू की बात सुनकर, लेखाकार घसीटा राम के चेहरे पर फ़िक्र की रेखाएं साफ़-साफ़ नज़र आने लगी। बस इस तरह, कैलाश बाबू सैन के एक ही चुगल-मन्त्र के शिकार बन गए घसीटा राम।

दफ़्तर में जब भी कोई नया अफ़सर आता था, तब रमेश कुमार उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटा करता..और और उससे बराबर कार्यालयों के महारथियों की चुगली खाया करता...यह बात, घसीटा राम को पहले से मालूम थी, मगर अब कैलाश द्वारा रहस्य खोलने पर उनको भरोसा हो गया..वे सोचने को बाध्य हो गए कि, ‘इस पापी के द्वारा चुगल-तंत्र की बौछार करने पर, इसका असर साहब पर ज़रूर पड़ा है? यही कारण रहा होगा, आये दिन, मेरे सर क़यामत की घंटी बजा करती है।’ अब इन्हें फिक्रमंद पाकर, कैलाश बाबू आगे कहने लगा “आप काहे फ़िक्र करते हैं, साहब? चाहे कितने ही खूंखार हो हमारे डी.ई.ओ. साहब, मगर आप फ़िक्र न करें..मैं उनको ऐसी पट्टी पढ़ाऊँगा यह काग़ज़ दिखलाकर कि, ‘साहब भी समझ लेंगे, हम भी क्या कुत्ती चीज़ हैं..?’ तब, आप ख़ुद देखेंगे हमारा डी.ई.ओ. कैसे लट्ठ लेकर, इस रमेशिये को पीटने पीछे दौड़ता है?” इस तरह घसीटा राम को सात्वना देकर, खुद मुंह उतारकर बैठ गया..खिड़की के पास।

“कैलाशिया, चल उठ..पानी पिला।” घसीटा राम ने अपनी आंखों पर ऐनक चढ़ाकर, तल्ख़ आवाज़ में कैलाश बाबू सैन से कहा “ओय कुतिया के ताऊ, बहन के..मुंह उतारे काहे बैठा है? कौन मर गया, तेरा?”

“क्या करूँ, साहब? आपने कह दिया, और हमने मान लिया। हम तो ठहरे कुतों के ताऊ, बिल्ली के ताऊ..और कुछ बना दीजिये, इस ग़रीब आदमी को।” रुठता हुआ, कैलाश बोला।

“पिल्ले की तरह मिमियाता है, बकवास करता है? पाजी..यह क्या बकवास लगा रखी है? मतलब की बात कर, मूर्ख।” घसीटा राम बोले।

“जनाब, काँटों की सेज़ पर सोता हूँ, अपने दुःख-दर्द किससे कहूं..कुछ भी हो जाय मेरा...मगर, यह बीड़ीबाज ओ.ए. की औलाद छुट्टी देगा नहीं। और इधर आप नाराज़, कौन है...जो मेरे सर पर, हाथ रखे..?” इतना कहकर, कैलाश बाबू ने मटकी से लोटा भरा, और लाकर घसीटा राम को थमा दिया। इस तरह कैलाश बाबू ने अच्छा-ख़ासा अभिनय करके, बेचारे घसीटा राम को इमोशनल [द्रवीभूत] कर डाला।

“चिंता मत कर, गेलसपा। हम बैठे हैं, ना..? ले देख ले, हमारा हाथ तेरे सर पर है।” इतना कहकर, घसीटा राम ने अपना हाथ ज़ोर से कैलाश बाबू के सर पर रख दिया। फिर, आगे कहने लगे “आज़ से तेरे सारे दुःख-दर्द मेरी झोली में, समझा? ले तूझे टूर देता हूँ, दो दिन का। जा.. अपने घर घूम-फिरकर, आ जा। ले अब तो हंस दे, अपनी बत्तीसी निकालकर।”

टूर का नाम सुनते ही, कैलाश बाबू का चेहरा कमल की तरह खिल गया। अब वह दांत निपोरकर, बन्दर की तरह खी-खी करता हंसने लगा। फिर वह ऐसे तेज़ी से उठा, मानों किसी कौए को हंस के पंख लग गए हों..?

कैलाश बाबू सैन इस दफ़्तर के ऐसे सुलझे हुए ‘चतुर्थ श्रेणी अफ़सर’ ठहरे, जो वास्तव में श्रेष्ठ चुगली कर्ता ठहरे। जनाब ने जिन-जिन दफ़्तर के महानुभवों ऊपर अपने मारक चुगल-मन्त्र का प्रयोग किया है, वे मासूम इंसान इस दफ़्तर के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए अपना अन्यंत्र तबादला करवाकर यहाँ से कूच कर गए। इनके सामने, दूसरा चतुर्थ श्रेणी अफ़सर रमेश चौहान किस खेत की मूली ठहरा? उसको बिना कहे बिना बताये, जनाब कैलाश बाबू सैन सरकारी टूर पर चले गए। यह तो मक़बूले आम बात है, टूर पर जाए तो इसको कोई आपत्ति नहीं होती..मगर बिना कहे उस बेचारे रमेश के ऊपर अपने हिस्से का काम लादकर चला जाय तो, इस आरामतलबी जीव को कैसे बर्दाश्त होता...?

बात यही हुई, जैसे ही कैलाश बाबू सैन ने घसीटा राम से टूर लेकर इस दफ़्तर से पलायन किया..और, इधर बेचारे रमेश पर मुसीबतों का पहाड़ गिर पड़ा। कैलाश बाबू के हिस्से का तमाम काम, रमेश की झोली में आ गिरा। बह तो बेचारा हमेशा की तरह सज़-धजकर आया दफ़्तर में..क़रीब दस बजे। हाज़री-रजिस्टर में हस्ताक्षर भी नहीं किये, उसके पहले ओ.ए. घीसू लाल शर्मा के कड़वे शब्द उसके कानों में गिरे “भईजी का राज़ समझ रखा है, दस बजे आता है चपरासी होकर..? भईजी राम पानी कौन भरेगा, कौन झाड़ू निकालेगा?” घीसू लाल शर्मा की ज़बान ऐसी..जैसे उनको नीम की पत्तियों की चटनी, खिला दी गयी हो..? रमेश के लिए उनका व्याख्यान सुनना, ख़ुद के कानों में गर्म-गर्म तेल उंडेलने के बराबर था। उनका बोला गया हर कड़वा शब्द इंसानियत के दायरे से बाहर होता था, वह इसे अच्छी तरह से जानता था। आम बात यही है, ‘अगर घोड़ा घास से यारी करेगा तो, खायेगा क्या?यही दशा, हमारे कार्यालय सहायक घीसू लाल शर्मा की थी। उनका काम था, कार्यालय व्यवस्था को दिशा देना। उन्हें मालूम था ‘प्रेम-मोहब्बत की भाषा बोलना, कार्यालय सहायक की कमज़ोरी मानी जाती है।’ फिर, उनके लिए मानवीय-संवेदना से दूर रहना ही उनके हित में था।

“कानों में रुई डाल रखी है रे, कामचोर? सुन, आज़ तुझको अपने हिस्से का तो काम करना ही है, मगर इसके साथ तूझे कैलाश बाबू के हिस्से का भी काम करना है। ये नापट कंवर साहब गए हैं दो दिन का टूर लेकर। समझा..? अब, हो जा चालू..फ़टाफ़ट।” घीसू लाल शर्मा की कड़कती आवाज़, होल में गूंज़ उठी। तभी उन्हें खेनी [सुर्ती] चखने की तलब हुई, झट उन्होंने पेसी से ज़र्दा और चूना बाहर निकालकर अपनी हथेली पर फैलाया...फिर दूसरे हाथ के अंगूठे से उस मिश्रण को अच्छी तरह से मसलकर जैसे ही थप्पी लगानी चाही, और उनको याद आया कि ‘उनकी पेन की नली में, स्याही ख़त्म हो चुकी है।’

तभी रमेश लेखा शाखा से झाड़ू निकालता हुआ कचरा सामान्य शाखा में ले आया, मगर इत्तफाक़ से लेखा शाखा में बैठे आनंद बाबू को गर्मी बर्दाश्त नहीं हुई, और उसने तपाक से छत-पंखें का स्विच ओन कर डाला..ओन करते ही हवा के झोंके ने उड़ा दिया कचरा, पाकिस्तान के सेबरजेट की तरह काग़ज़ के टुकड़े पूरे होल में बिखर गए। उधर खेनी तैयार करते घीसू लाल ने जैसे ही ज़र्दा और चूने के मिश्रण पर हाथ से थप्पी लगाई, और तुरंत उसकी डस्ट उड़कर होल में बैठे बाबूओं के नासा-छिद्रों में जबरन जा घुसी....और आंक छी ss ss आंक छी ss ss की आवाज़ करती, धुआं-धोर छींकों की बेटिंग चालू हो गयी।

“रमेश। पंखा बंद कर, हाय मार डाला रे इन छींकों ने।” इन छींकों से आहत होकर, सदानंद बोल उठा। आनंद बाबू का साथ ख़ास दोस्त होने के कारण, इसका नाम सदानंद पड़ गया। दफ़्तर में यह आनंद और सदानंद की जोड़ी, अक्सर व्यंगात्मक वाकये पैदा करती हुई लोगों को खूब हंसाया करती थी। इस बेचारे सदानंद का असली नाम, घनश्याम था। इस वक़्त वह इन छींकों की बेटिंग से त्रस्त होकर, चीख़ उठा “ हाय मार डाला रे, इस पापड़ वाले ने।”

उधर लेखा शाखा से उसका दोस्त आनंद बाबू गर्मी से परेशान होकर, ज़ोर से चिल्लाता हुआ बोल उठा “पत्ता नहीं, क्यों सुबह-सुबह बांग दे रहा है? पड़ा रह, चुपचाप। सुन ले, अब पंखा बंद नहीं होगा। फिर वह आराम से टेबल पर लेट गया, और रुमाल से ज़ब्हा पर छलक रहे पसीने के एक-एक कतरे को साफ़ करता हुआ फ़िल्मी गीत गाने लगा “धीरे से आना ओ खटमल, धीरे से आना खटियन में....”

इस घनश्याम को अब हो गया, क्या? ऐसा लगा, शायद पनवाड़ी [पान बेचने वाला] का काला कुत्ता उसे काट गया हो? इस मर्दूद ने चीख़-चीख़कर, उस गीत गा रहे आनंद बाबू रूपी बेजू बावरे की आत्मा को जंझोड़ डाला। सत्य बात यह थी, ‘उस घनश्याम को, इसका यह प्रेम-गीत काहे पसंद आता? वह बेचारा था शादी-शुदा, उसे ये छिछोरी आदते अच्छी नहीं लगती।’ क्योंकि, वह तो शादी के बंधन रूपी खूटे से बांधा जा चुका था, अब उसे इस आज़ाद परींदे का प्रणय-गीत कैसे बर्दाश्त होता..? बात यह थी...आनंद बाबू रोज़ जोधपुर से रेलगाड़ी में बैठकर पाली आता, तब गाड़ी में उसके साथ यात्रा करने वाली सुन्दर हसीनाओं से गुफ़्तगू [बातचीत] भी होती रहती। अब इस वक़्त वह इन हसीनाओं के साथ बीते वक़्त को याद करता हुआ, प्रेम-गीत गा रहा था..जो इस निष्ठुर घनश्याम को, बर्दाश्त नहीं हुआ..। ख़ुद तो शादी के लड्डू खा गया, अब दूसरों की लड्डू खाने की बारी आयी तब वह निष्ठुरता दिखाने लगा।

उधर बेचारा रमेश बुरी स्थिति में फंस गया, इन बाबूओं ने तो इस बेचारे को ग़रीब की ज़ोरु [पत्नी] समझ लिया..? इन करमज़लों बाबूओं के बोल सुनकर, रमेश मन ही मन जल उठा। इधर वह घड़ी के कांटे की बढ़ती गति को वह रोक नहीं सकता, उस चलते कांटे को देखकर वह व्याकुल हो उठा। हायsss.. कैसी बुरी स्थिति बन गयी बेचारे रमेश के लिए, यहाँ तो ये दोनों बाबू उसे दो चक्की के पाट की तरह..नज़र आने लगे? एक कहता है, पंखा चालू रहेगा, तो दूसरा कहता है पंखा बंद करो..अब वह किसका आदेश माने? इन दो पाटों के बीच में आ फंसा, बेचारा भोला पंछी। क्या करे, और क्या न करे..? एक की माने तो दूसरा फरकट, दूसरे को ख़ुश करे तो पहला रुष्ट। एक को बैठाएं, तो दूसरा खड़ा हो जाय..एक को मनाये, तो दूसरा आ धमके। इस तरह दो पाटों के बीच में फंसा हुआ उसका व्यक्तित्व, लल्लू बनाकर रह गया। बड़ी पेशो-पेश की स्थिति, इधर गिरे तो अंध-कूप नज़र आये..और उधर गिरे तो भयंकर खाई। मसलन यह निश्चित हो गया कि, वह मरेगा तो सही। अगर नहीं मरा तो, मरे से भी बदतर स्थिति..। फिर क्या? ले बालाजी का नाम, रमेश उठा। पंखे का स्विच ओन करके बढ़ गया डस्टर लेकर, घसीटा राम की सीट की तरफ़। वह बेचारा जैसे ही उनकी टेबल साफ़ करने लगा, तभी इस होल में बैठा हर बाबू उसे ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ देता हुआ अलग-अलग आदेश देने लगा। कोई कहता पहले मेरी टेबल साफ़ कर, कोई कहता पहले मेरी कुर्सी साफ़ कर..छोटे से लेकर बड़े बाबू तक उसे डपटने लगे, तब वह बेचारा गुहार लगाता हुआ इतना ही बोल सका ‘एक-एक, बोलिए हुज़ूर। रहम करो मेरे मेहरबान, यहाँ खड़े-खड़े टांगों में दर्द उठने लगा है। हुज़ूर, सुबह आते ही मैं काम में जुटा हूँ।”

तभी ओ.ए. घीसू लाल शर्मा, शेर की तरह दहाड़ उठे “चुप रह, मर्दूद। टांगों में, दर्द होगा कैसे? सुबह से तूने दफ़्तर का एक काम किया नहीं, ख़ाली जीने पर बैठकर धूम्रपान का मज़ा लेता रहा..साला, तू गया कहाँ...जो दर्द उठे, तेरे पांवों में? अब झूठ बोल रहा है, कुतिया के ताऊ? कब से कह रहा हूँ, ‘मेरी नली की स्याही ख़त्म हो गयी, जाकर पेन में नयी नली डलवाकर ला..’ मगर, तूने तो कानों में रुई डाल रखी है? कमबख़्त, सुनने का नाम नहीं लेता।”

“मेरे मालिक, अब बरसों मत। अभी, आपका काम किये देते हैं।” रमेश ने डस्टर को, एक तरफ़ फेंककर कहा। फिर उसने घीसू लाल से पेन और पैसे लेकर, जीने की तरफ़ क़दम बढ़ाए। आख़िर, जीना उतरना और चढ़ना तो इन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के नसीब में लिखा हुआ ही था । इसके साथ हानि-लाभ, जीवन-मरण सब कार्यालय के हाथ..। रमेश के दिल में उठी आह “है रामा पीर, मुझे आप ऐसी तरक़ीब बता दो..जिससे इस दफ़्तर की सभी टेबलें अपने-आप साफ़ हो जाए, और मुझे उन पर पोचा नहीं लगाना पड़े..। आप चाहें तो, इन कुर्सियों पर ये आगंतुक मास्टर बैठते रहें...और इनके पहने क्रीज़ किये कपड़ों से, ये कुर्सियां अपने-आप साफ़ हो जाए। तब, कमाल हो जाएगा, रामा पीर..और इन हाथों को भी, थोड़ा आराम मिल जाएगा।”

जीना उतरते, उसे कैलाश बाबू सैन पर गुस्सा आने लगा। साला भेंगी आँखों वाला ‘बाडा’। तूने कर डाला, कबाड़ा। बड़बड़ाता हुआ रमेश जीना उतरने लगा, उसने क़रीब दस ही सीढ़ियां उतरी होगी..उसके सामने, डिस्पेचर नारायण सिंह अवतरित हो गए।

“मेरी टेबल पर डाक कैसे पड़ी रह गयी, रमेश?” अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, नारायण सिंह तल्ख़ आवाज़ में बोले।

“कैसे पड़ी है, मैं क्या जानू? सबका ठेका, मैंने नहीं ले रखा है।” बाबू नारायण सिंह पर गुस्से से उबलते हुए, रमेश ने कहा। इस कैलाश बाबू के न आने से ढेर सारा काम बढ़ गया, इससे वह नाराज़ होकर मन में कैलाश बाबू को थोक-बंद गालियों की पर्ची निकाल बैठा।

“नामाकूल गया है, टूर पर। अब कुतिया के ताऊ, कौन करेगा तेरे हिस्से का का काम? कौन डाक ले जाए? यहाँ तो डाक का काम करें, तो दफ़्तर की सफ़ाई कौन करेगा? सफ़ाई करने बैठ जाए तो, भईजी राम कौन पानी भरेगा..ऊपर से इस डोकरे नारायण ने पूछ लिया ‘भईजी डाक कैसी पड़ी है, टेबल पर?’ अरे डोकरे, जब तुम चपरासी थे तब तुम कितना काम कर लेते थे दफ़्तर का..? जो अब, मुझसे पूछ रहे हो रौब से। यहाँ तो इस मर्दूद ने टेंथ क्लास क्या पास कर ली, बन गया साला एल.डी.सी. मुझ पर हुक्म चलाने? अगर समझदार होता तो टूर पर जाने के पहले इस कैलाश से पूछ लेता, भईजी, पहले तेरा डाक का काम निपटा दे..और फिर, टूर पर जा।”

यहाँ तो इस दफ़्तर के जनाब घीसू लाल शर्मा ओ.ए. का कहना भी अलग है, वे कहते हैं ‘भइये, दफ़्तर में बनानी है अपनी छवि, तो डोलते रहो कुर्सी के नज़दीक..अच्छे-ख़ासे कमाऊ चार्ज पाने के लिए, लोग रातों-रात मार-काट मचवा देते हैं..और अपने आकाओं के लिए, शिक्षक-संघों से पत्थर भी खा लेते हैं कफ़न बांधकर..। तब तो भैय्या यहाँ पत्थर खाने की बात तो है नहीं, बस आपको तो हुक्म की गुलामी करनी है..यानी, आदेश की पालना। चाहे वह आदेश नारायण बाबू का हो, या घीसू लालजी का।’

सुरेश को ख़ाली हाथ आया देखकर, जनाबे आली घीसू लाल शर्मा की भृकुटी चढ़ गयी..और वे आँखें तरेरकर लगे, तड़कने “डाक को मार, गोली। पहले तू पेन की रिफल [स्याही की नली] लेकर आ। अब बता, तू। यहाँ इन काग़ज़ों पर मार्किंग, तेरा बाप नारायण आकर करेगा..?”

सुनकर, रमेश को बहुत बुरा लगा। वह अपने होंठों में ही बड़बड़ाने लगा ‘कोज़ी कीधी, रामा-पीर। अभी-तक हाज़री रजिस्टर में चिड़िया भी नहीं बैठाई, और इस बीड़ी-बाज ओ.ए. की औलाद ने हुक्म की झड़ी लगा दी..? क्या करे, बेचारा रमेश? अब यहाँ तो पानी में रहकर, इस मगरमच्छ से बैर कैसे..?’ बेचारा मायूस होकर, वापस जीना उतरने लगा।

सीढ़ियों के मोड़ पर खड़े नारायण सिंह, आराम से बैठे बीड़ी सेवन कर रहे थे। इधर रमेश को डर था ‘कहीं यह मुच्छड़ बाबू नारायण, उन्हें कोई काम सुपर्द न कर दे..?’ उसको जाते देखकर, नारायण सिंह लबों पर रखी अधज़ली बीड़ी को हाथ में थामकर बोले “बाहर ही जा रहा है, रमेश..तब दफ़्तर की डाक लेता जा।” उनकी कही बात अनसुनी करके, वह तो तेज़ी से हवा की तरह सीढ़ियां उतरने लगा। नारायण सिंह ने बीड़ी के सुलग रहे अंतिम छोर [टुकड़े] को झट नीचे फेंक दिया, जो सीधा जाकर रमेश के थोबड़े पर गिरा। इस-तरह काम से बचने की तमन्ना ने, उसे सुलगती बीड़ी का शिकार बना डाला। एक तो काम का भार...ऊपर से नारायण सिंह का हुक्म और तीसरा उनकी सुलगती बीड़ी का शिकार होना, मानों बादल आपस में टकरा गए हों..? बस, उसे थोबड़े का जलना बर्दाश्त नहीं हुआ...और, वह लगा कूकने “हाथी जैसे पसरने से काम नहीं होता, बाबू साहब। यह दफ़्तर है, कोई मय-ख़ाना नहीं। इधर हुज़ूर-ए-आला ने फ़रमाया, और उधर साकी दारु का ज़ाम लिए हाज़िर। जनाब, काम करने के लिए हाथ-पैर भी चलाने पड़ते हैं।”

इधर सुरेश का बिफ़रना और उधर नारायण सिंह को आ गया याद..”हाय राम। डाक को पियोन-बुक में चढ़ाई नहीं और न लिफ़ाफ़ों पर टिकट चिपकाए...” ख़ुद की ग़लती याद आते ही, नारायण सिंह ने चुप्पी साध ली। अब जैसे ही किसी तरह बेचारे रमेश ने सीढ़िया उतरी, और उसे सामने वाले मकान के चबूतरे पर बैठे बाबू गरज़न सिंह नज़र आये। रमेश को देखते ही, उन्होंने भी हुक्म की तोप छोड़ दी “अरे ए फिटोल। कहाँ जा रिया है, तू इधर-उधर? अब वापस जा, ऊपर। मेरे टेबल पर रखे, टिफ़िन को लेता आ। फिर जा, मंडिया-रोड..वहां मेरे ननिहाल से टिफ़िन में खाना डलवाकर लेता आ। आज़ मैं वापस जोधपुर नहीं जाऊंगा, यहीं रुकूंगा..काम अधिक है, समझे?”

“ओ.ए. साहब की नली की स्याही ख़त्म हो गयी, पहले नयी नली डलवा दूं..फिर आपका काम..” रमेश बोला।

“बूढ़े हो गए हैं, तेरे ओ.ए साहब। अब उनकी नली ख़ाली हो गयी, तो क्या भरी हुई होगी?” बाबू गरज़न सिंह के बगल में बैठे, भंवर बालवंशी बीच में लपक पड़े।

“चढ़ जा sss वापस। पहले टिफ़िन, बाद में नली।” बाबू गरज़न सिंह दहाड़ते हुए बोले, जिससे बेचारे रमेश के हाथ-पाँव कांपने लगे। अब बेचारा रमेश, करता क्या? वह तो अपने-आपको, ग़रीब की जोरू समझ बैठा। बेचारा लाचारगी से, वापस जीना चढ़ने लगा। दफ़्तर के दरवाज़े पर पहुंचते ही, गेट के बिल्कुल सामने बैठे घीसू लाल शर्मा उसे देख लिया..और उसे देखते ही, जनाब बोल उठे “ नली लाया?”

“नहीं, ओ.ए. साहब। गरज़नजी टिफ़िन मंगवा रहे हैं, वह दे आऊँ फिर..” कहते-कहते रमेश के बदन में, डर के मारे सिहरन दौड़ पड़ी। उसे भय था, कहीं घीसू लाल उस पर गालियों की बौछार न कर दे..?

“पहले काम किसने कहा?” सवाल उठाते हुए, घीसू लाल ने कहा।

“हुज़ूर, आपने।” सहमता हुआ, रमेश बोला। और बाबू गरज़न सिंह की टेबल से, उसने जैसे ही टिफ़िन उठाया, और घीसू लाल की कर्कश आवाज़ होल में गूंज उठी “अरे नामुराद, चुपचाप वापस रख दे टिफ़िन। पहले पेन की नली लेकर आ, फिर टिफ़िन..।

“.........” कुछ न बोला, और फ़र्श को देखने लगा।

“जा नीचे। ज़मीन पर काहे देख रहा है? बारुड़ी चींटियाँ नहीं चल रही है, जो तेरे बदन पर सवार हो जायेगी..? सुना नहीं, मैंने क्या कहा?” घीसू लाल शर्मा की गगनभेदी कर्कश आवाज़, होल में गूंज़ उठी।

अब क्या करता, बेचारा रमेश? किसका कहना मानें? मक़बूले आम बात है, सबको लोड़ी लुगाई के नखरे देखने पड़ते हैं और दुधारू भैंस की लात भी खानी पड़ती है। ये दोनों तो, इस दफ़्तर के स्तम्भ हैं, फिर क्या? दोनों का हुक्म सर पर..दिल को मज़बूत करके वह सीढ़ियां उतर गया।

 ए..ए.. मुंह छिपाकर कहाँ हो रहा है, उड़न-छू? भईजी राम हम ठहरे गरज़न सिंह इस बियावान जंगल के शेर..कोई घसियारे नहीं, चल ऊपर पहले sss टिफ़िन। बाबू गरज़न सिंह के कड़वे बोल फूट पड़े। अगर आज़ इनके सामने फिल्म शोले का गब्बर सिंह सामने होता तो, वह भी इनकी गरज़ती आवाज़ को सुनकर सहम जाता। गरज़ती हुई इनकी आवाज़ सुनकर, बेचारा रमेश कांप उठा और इनका हुक्म तामिल करने वापस सीढ़ियां चढ़ने लगा। वहां सुस्ता रहे भंडारी [कुत्ते] भी, उसके पीछे भौंकते हुए सीढ़ियां चढ़ने लगे। इन कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनकर रमेश डर गया, और झट उसने चढ़ने की रफ़्तार तेज़ कर दी। इस मंज़र को देख रहे वहां बैठे अध्यापक भी, ठहाका लगाकर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।

“क्या डाइलोग मारा, उस्ताद? किसी ज़माने में डायला मास्टर साहब इसी तरह बोला करते थे। क्या कहूं, आपको? बिना माइक पूरे ग्राउंड में, उनकी आवाज़ गूंज़ा करती थी।” चाय से भरा प्याला उनको थमाता हुआ, चाय की केन्टीन वाला भंवर लाल बोल पड़ा। फिर उसने पास बैठे सभी अध्यापकों को, चाय के प्याले थमाए।

भंवर, तूझे बना दूंगा भंवरा..। फिर कमबख़्त, उड़ता रहेगा ठौड़-ठौड़..? तेरा पिछवाड़ा टिकेगा नहीं, तेरी दुकान पर। आया साला, मुझे मक्खन लगाने? बचा ले यार थोड़ा मक्खन, लस्सी बनाने के काम आएगा। बाबू गरज़न सिंह बोले। डायला मास्टर साहब के जिक्र ने, उनको याद दिला दिया अतीत। मास्टर साहब थे उनके दादाजी के ख़ास दोस्त, वे शिशु गरज़न सिंह को अपनी गोद में लेकर कहा करते थे “ढोकला, तू तो रह गया गोबर-गणेश...साला तू बैठा-बैठा दुकान पर, पतासे तोलता रहेगा। और, करेगा कुछ नहीं। मगर यह तेरा पोता मेरे ऊपर गया है, पूरा है दबंग..देख इसकी आवाज़, कैसे गुर्राता है..यह बदमाश?”

तभी भंवर वापस चाय की केन्टीन पर पहुंचा, और उसने चूल्हे पर चढ़े चाय के भगोले में कुरछी डालकर उसे ज़ोर-ज़ोर से हिलाने लगा। कुरछी चलने की आवाज़ से, गरज़न सिंह चेतन हो गए। और उन्होंने केन्टीन पर निग़ाह डाली, जहां बाहर लगी बेंच पर बैठा कैलाश बाबू सैन नज़र आया। जो मुंह से सुड़क-सुड़क की आवाज़ निकालता हुआ, चाय की चुस्कियां ले रहा था। उस पर नज़र गिरते ही, उसे बुलाने के लिए उन्होंने आवाज़ लगाई। मगर, अनसुनी करता हुआ वह चाय पीता रहा।

“कब से गरज़न सिंह तूझे बुला रहे हैं, कैलाश..तू जाता क्यों नहीं?” भंवर ने कहा, फिर उसने चाय के जूठे प्याले पानी की टंकी के नीचे रख दिए।

“अपना काम कर बे, मैं उसके बाप का नौकर नहीं। तू जानता नहीं, सरकारी काग़ज़ों में, मैं पाली में नहीं हूँ...? सोजत गया हुआ हूँ, सरकारी टूर पर। अपने काम से मतलब रखा कर, भंवर।” कैलाश बाबू अभिमान से बोला। फिर भंवर का ध्यान दूसरी तरफ़ ले जाने के उद्देश्य से, उसने सामने से गुज़रते मास्टर अल्लानूर की तरफ़ उंगली का इशारा किया। जो उसकी केन्टीन के सामने, साइकल थामें गुज़र रहा था। उंगली से इशारा करता हुआ, वह भंवर से बोला “उधर देख, मास्टर अल्लानूर तुझसे बचकर निकल रहा है। अब तू उससे, अपनी चाय की उधारी वसूल कर ले।” इतना कहकर, कैलाश बाबू ने चाय का ख़ाली प्याला बेंच पर रख दिया।

अब भंवर को ऐसा लगने लगा कि, ‘जब से यह एलिमेंटरी दफ़्तर यहाँ खुला है, तब से उसकी क़िस्मत ख़राब है..जो भी यहाँ चाय पीने आता है कमबख़्त, और उधार की चाय पीकर चला जाता हैं..। जब इन कमबख़्तों के पास उगाही करने जाएँ तो ये साले बहाना बनाकर, मुझे फुटास की गोली पकड़ा देते हैं। मैं ठहरा, ग़रीब आदमी। जो रोज़ नक़द माल लाता हूँ और रोज़ खाता हूँ। बाज़ार में, मुझे कौन माल उधार देने वाला? कौन देगा उधार मुझे, चाय-शक्कर? हर माह बीस-तीस हज़ार पगार पाने वाले ये सरकारी दामाद, साले अपनी जेब में रखते नहीं..चाय के पैसे? क्या ज़माना आया है? इस दफ़्तर के चपरासी भी ऐसे हैं साले, जो इन उधारिया मास्टरों के खातों में ओली मंडवाकर चाय पी जाते हैं.. कमबख़्त। अब इस अल्लानूर को न पकड़ा तो, क़यामत आ जायेगी..हिसाब के पैसे आयेंगे नहीं। जानता हूँ, यह कमीना कैलाश भी चाय के पैसे देने वाला नहीं।” बरबस भंवर के दिमाग़ में ऐसे विचार आते ही, भंवर उलटे-पाँव दौड़ा मियाँ अल्लानूर की तरफ़। तब-तक तो साइकल पर सवार होकर मियाँ अल्लानूर, आँखों से ओझल हो चुके थे। बेचारा भंवर उस अल्लानूर को, पकड़ न सका। और जैसे ही उसने पीछे मुड़कर, क्या देखा..? आँखें चुराकर कैलाश बाबू सैन भी, मियाँ अल्लानूर की तरह अपनी लुना पर सवार होकर यहाँ से नौ दो ग्यारह हो गया। फिर क्या? बहुत दूर उसे गाड़ी लूना, धुए के गुब्बार छोड़ती नज़र आने लगी। दौड़ रही लूना को देख, भंवर अपना दिल थामकर बैठ गया।

“ला डायरी, खाते में चाय मांड दूं।” भंवर के पास आकर बाबू गरज़न सिंह बोले, फिर उसे फिक्रमंद पाकर बोले “तेरे थोबड़े पर, यह हिन्दुस्तान का नक्शा कैसे? अरे ओय मां के दीने, कोई तेरे पैसे खा गया क्या?”

“साहब देखा, आपने? साला नापट कैलाश..भेंगी आँखों वाला यानी बाडा चला गया। हुज़ूर, आपके बुलाने पर भी वह आपके पास नहीं आया। क्या कहूं, हुज़ूर? वह तो साला, ऐसा कमीना है...सौ कमीने मरे होंगे, तब यह कमीना पैदा हुआ होगा..? अपनी भेंगी आँखों को मटकाता हुआ, इसने आपके लिए ओछे शब्द इस्तेमाल किये हैं हुज़ूर। यह नामुराद कहता गया कि, वह आपके बाप का नौकर नहीं..जो आपके बुलाते ही दौड़ पड़े? आप जानते नहीं, आज़ वह सरकारी टूर पर है?”

यह कमबख़्त भंवर भी ठहरा, उसका बिरादर। जैसा वह, वैसा ही था उसका यह बिरादर “कैलाश बाबू सैन”। उसने भी कैलाश बाबू की तरह चुगल-मन्त्र का उपयोग करते हुए, अपने बिरादर के खिलाफ़ चुगल-मन्त्र की बौछार कर डाली।

---


पाठकों।

यह अंक पढ़कर कैसा लगा, आपको? आप मेरे ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com पर अपनी समीक्षा टंकित करके भेजें। इस अंक के बाद, आप पढेंगे अंक १९ “ईर्ष्यालु”। इस बार आप, एक बार और रमेश की दास्तान पढेंगे। – दिनेश चन्द्र पुरोहित

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रचनाकार: संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक 18 - भेंगी आँखों वाला यानी बाडा लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित
संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक 18 - भेंगी आँखों वाला यानी बाडा लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित
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रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/01/18.html
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