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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 163 // मोक्ष // मोती प्रसाद साहू

प्रविष्टि क्रमांक - 163

मोती प्रसाद साहू

 
मोक्ष

          सेठ नागर मल अब जीवन के उत्तरार्ध की तरफ बढ़ने लग गये थे। इस कारण उन्हें कुछ कुछ परलोक की चिंता सताने लग गयी थी। परलोक की चिंता इसलिए भी क्योंकि; अब उनके बच्चे बड़े होकर  व्यापार व घरगृहस्थी की जिम्मेदारी उठाने लग गये थे। पुत्रों ने पिता को  धर्म - कर्म की पूरी आजादी दे रखी थी। सेठ नागरमल ने जीवन में धन ,दौलत ऐश्वर्य आदि बहुत कमा लिया था। जीवन के चार पुरुषार्थों धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष में से प्रथम तीन को उन्होंने बखूबी प्राप्त किया। ईश्वर ने उन्हें इसके लिए अवसर भी उपलब्ध कराये। शेष चौथा पुरुषार्थ  यानी मोक्ष ही अब पाना शेष था। जिसके लिए वे धर्म कर्म में पूरी तरह जुट गये थे।  जैसे भजनकीर्तन ,पूजापाठ सामर्थ्यानुसार दानदक्षिणा आदि। तीर्थयात्रा पर तो वे पहले भी कई बार जा चुके थे। खाली समय में सद्ग्रंथ पढ़ते , आये गये  समवयस्कों के साथ बैठकर  सत्संग करते। जो धर्म कर्म के बारे में दूसरों की बातों पर अमल भी करते । इसी क्रम में उन्होंने एक मठ में जाकर गुरु से दीक्षा भी  ले रखी  थी।
      
         यानि कहीं से भी मोक्ष सम्बन्धी उपायों में कोई कमी न रह जाय अन्यथा दुबारा इसी धरती पर लौटकर आना पड़ता है। उन्होंने प्रवचनों में सुन रखा था।
        
         आज वे सत्संग कर लौट रहे थे कि सामने से एक बहेलिया चोरी छिपे तोता बेचता दिख गया। उन्होंने झट मोलभाव करके उसे खरीद लिया। जैसे कब से इसकी प्रतीक्षा में लगे हों ।


’गुड़िया , जरा घर से रोटी लाना बेटा ! ’
नागर मल ने अपनी चहेती नातिनी को आवाज लगायी।

’क्या नाना जी ? कुछ कहा , कहती हुई नातिनी बाहर आयी।

’अरे!, यह क्या लाये नाना जी ?’

’बेटा देख नहीं रही हो , तोता है यह ’
’इससे क्या होगा?’

’पहले तू रोटी तो ला , या सवाल ही पूछती रहेगी’
गुड़िया घर में से रोटी लाती हैं
नागरमल तोते को रोटी तोड़कर पिंजड़े की कटोरी में रखते हैं । कभी अनार के दाने तोड़कर रखते हैं।

’अब बताओ न नाना जी?
गुड़िया के साथ घर के और बच्चे भी कुतूहलवश देखने आ जाते हैं।

’सुन बिटिया इसको हम राम राम रटायेंगे और सीख लेने पर यह स्वयं ही राम राम बोलना शुरु कर देगा।’

’फिर . उससे क्या होगा?’

          ’तो सुन, बहुत पहले एक गणिका थी । उससे जीवन में  कुछ पाप कर्म हो गये थे। किंतु उसने एक तोता पाल रखा था जो राम राम बोलता था। मरते समय गणिका के कान में तोते के द्वारा उच्चरित राम नाम पड़ गया और उसे मुक्ति मिल गयी।’

’ये मुक्ति क्या होती है? नाना जी’
’जीवन मरण से छुटकारा ’

’ किंतु नाना जी एक बात पूछूँ ,आप अपनी मुक्ति के लिए इस तोते को बंधन में क्यों डाल रहे हो?

नागरमल स्तब्ध ? उनकी अंगुलियॉ होठों पर चिपक गयीं।
नाना का ज्ञान पोती के आगे दम तोड़ गया। उन्होंने तुरन्त पिजड़े से तोते को आजाद कर दिया।


परिचय-

मोती प्रसाद साहू
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
एक कविता संग्रह 2013 में प्रकाशित
’हस्तक्षेप 2011’ का सहसम्पादक
दैनिक पत्रों में कहानियॉ प्रकाशित
सम्प्रति संस्कृत प्रवक्ता उत्तराखंड

ई मेल- motiprasadsahu@gmail.com

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 6310013034063346259

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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