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2 लघुकथाएँ // संतोष सुपेकर

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मजा नहीं, फायदा

मोटरसाईकिल से घर लौट रहा था तो शहर पहुंचने के थोड़ा पहले एक दृश्य देख चौंक पड़ा। व्यस्त सड़क के कोने पर खड़े एक विशाल वृक्ष के नीचे हरी-हरी घास पर मेरे पड़ोसी नरेंद्रजी बैठे हुए थे, ठंडी-ठंडी हवा खाते हुए, सिंकी मूंगफली के दाने चबाते, मोबाईल फोन पर पुराना फिल्मी गीत सुनते हुए...

अरे वा, क्या बात है?" बाईक उनके पास खड़ी करते हुए गहन आश्चर्य से मैंने कहा, ''क्या देख रहा हूँ ये? मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा। यहाँ तो दम लेने की फुर्सत नहीं है और आप खूब मजा ले रहे हैं जिंदगी का?"

''मजा नहीं भाई" उन्होंने माहौल के अनुरूप इत्मीनान से उत्तर दिया, ''फायदा! फायदा उठा रहा हूँ और जिंदगी का नहीं, आम आदमी होने का! सात-आठ दिनों से लाईनों में, क्यू में, लग-लगकर थक गया था, कभी पेट्रोल के लिए लाईन, कभी रिजरवेशन कराने के लिए लाईन, कभी बैंक की लाईन तो कभी दूध लेने के लिए लाईन! रोज आम आदमी होने का नुकसान उठाता हूँ तो सोचा, क्यों न आज वो सुख ले लूँ जो सिर्फ आम आदमी को नसीब है, किसी खास को नहीं! और फिर क्या पता कब, फिर कौनसी अनसोची लाइन में लगना पड़ जाए, ठीक है न?ÓÓ

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आम कथन

''हो आए सर वॉश रूम?" वेटिंग हॉल में यात्रियों के बीच चर्चा हो रही थी, ''यस हो आया, वैसे फेक्ट कहूँ" - चिकित्सक ने मुस्कुराते हुए सहयात्री को देखा, ''टॉयलेट बाथरूम मेरी फेवरेट प्लेस है, जहाँ कोई डिस्टर्बन्स नहीं है।"

''मुझे भी इसलिए पसंद है क्योंकि मेरी अधिकांश रचनाओं के प्लॉट वही बनते हैं" सहयात्री लेखक ने समर्थन किया।

''और मुझे इसलिए क्योंकि आज के समय में इससे ज्यादा निरापद जगह कोई नहीं है, टॉयलेट-बाथरूम ही तो है, जहाँ सीसीटीवी कैमरे नहीं होते।ÓÓ जाँच और निगरानी से उकताए एक आमजन का कथन था।

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