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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 111 // "सलाम" // वन्दना पुणतांबेकर

प्रविष्टि क्रमांक - 111

वन्दना पुणतांबेकर

लघुकथा

"सलाम"

12 साल का छोटू अपनी माँ का इकलौता बेटा था। हमेशा से ही गरीबी, भुखमरी और जिल्लत की जिंदगी जी रहा था। झुग्गी झोपड़ी में उसका जीवन बिता था। जब से आँख खोली तब से कभी पिता को नहीं देखा, जब भी माँ से पूछता तो पिता के नाम पर उसको दो-चार गालियां सुना देती।

"जारे ,आज काम पर नहीं जाना क्या?माँ की आवाज में छोटू की नींद खोल दी सर्दियां जोरों पर थी। जनवरी का महीना था। उठने का मन नहीं कर रहा था।मगर पेट की आग तो बुझानी हीं थी। छोटू बिना ना नुकुर के उठ गया। माँ ने आधी प्याली चाय पिलाई वह बोरा उठाकर चल पड़ा। आज सारे शहर में एक विराना सा मंजर दिखाई दे रहा था। कल ही 26 जनवरी बीती थी। उसने देखा की बाजार में जगह-जगह कागज के झंडे पड़े हुए थे। उसने उन झंडों को उठाकर अपने बारे में भर लिया। और घर ले आया। रोज तो वह पन्नी बिनता था।मगर आज उसे पन्नियां कम ही नजर आई।

घर आकर हाथ-मुंह धोकर माँ से बोला,"माँ मुझे पैसे दे दो ,एक गोंद की शीशी लानी है।

" क्यों रे..?

"मुझे चाहिए माँ, वह कुछ नहीं बोली और बौरा खोलकर देखने लगी। देखा तो सारा बोरा झंडों से भरा पड़ा था।

"अरे आज यह क्या उठा लाया? "क्या करता अम्मा, आज बाजार में जगह-जगह यहीं पड़े थे। तो उठा लाया,"क्या करेगा इन झंडों का? अम्मा में इसकी बड़ी सी पतंग बनाऊंगा, और आकाश में उड़ाऊगा,कह कर हंसने लगा ।

"तू इन झंडू के बारे में इत्ता सोचता है,तुझे कोई प्रधानमंत्री बनना है, क्या? अनपढ़ कहीं का। माँ ने डांटा।

"काहें..,जब चाय बनाने वाला प्रधानमंत्री बन सकता है। तो मैं एक पन्नी बीनने वाला काहे नहीं बन सकत? इसमें पढ़ाई की कोनो जरूरत नहीं,जज्बा होना चाहिए, में सारे शहर की पन्नी बिनकर शहर साफ कर सकता हूं, तो क्या देश की गंदगी साफ नहीं कर सकत का? छोटू ने कहा,

चल बावला कहीं का, कहते हुए छोटू की माँ अंदर चली गई। बेटे के जज्बे को देखकर "सलाम"कर मुस्कुरा...उठी।

वन्दना पुणतांबेकर

इंदौर(म.प्र)

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