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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 114 एवं 115 // भुवन चन्द्र पन्त

प्रविष्टि क्रमांक - 114

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भुवन चन्द्र पन्त

कठपतिया का रहस्य

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पहाड़ी पगडण्डियों के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए मैं पहाड़ की चोटी पर पहुँच चुका था, अब वह गांव सामने नीचे घाटी में दिखने लगा था , जहाँ मुझे जाना था । रिश्तेदारी में इस गांव आने का मेरा पहला मौका था । खुशकिस्मती रही कि राह चलते मुझे उसी गांव जाने वाले खीमसिंह मिल गये थे । बातों ही बातों में रस्ता कटता जा रहा था और साथ ही मेरी उनसे नजदीकियां भी । उम्र में मुझसे कोई 15-20 बरस बड़े होंगे , तो मैं उन्हें खीमदा कह संबोधित करने लगा । ज्यों ही हम धार (चोटी) पर पहुंचे उन्होंने मुझे बताया कि ये स्थान कठपतिया कहलाता है और यहाँ के स्थानीय वन देवता को प्रसन्न करने के लिए कोई पत्ती या काष्ठ खण्ड रास्ते में भेंट स्वरूप चढ़ाना पड़ता है। इससे पहले भी जो लोग इस रास्ते पर गुजरे होंगे , उसका प्रमाण रास्ते में चढ़ाई गयी पत्तियां व लकड़ियां स्वयं दे रही थी । परम्परा का निर्वाह करते हुए मैंने भी पास की झाड़ियों से पत्तियां तोड़कर रास्ते में डाल दी । लेकिन मन ही मन सवाल उठा कि उसी वन देवता के क्षेत्र की वनस्पतियां तोड़कर उसे ही अर्पित करना ये कैसी अर्चना और ये कैसी परम्परा ?

क्षणिक विश्राम के बाद मैं खीमदा के साथ ढलान को उतरने लगा, लेकिन इस अनूठी परम्परा पर मेरे मन में ऊथल पुथल मची थी। जिज्ञासा वश मैंने खीमदा से प्रश्न कर ही लिया -

’’खीम दा, ये बताइये यदि कोई कठपतिया पर ये सब कुछ नहीं करता है तो कोई अनिष्ट होता है क्या ?’’ खीमदा बोले -’’ लोगों की मान्यता है कि जो इस परम्परा का निर्वाह नहीं करता कठपतिया वन देवता साया बनकर उसका साथ नहीं छोड़ता, जिसे हम स्थानीय भाषा में छल लगना कहते हैं । ’’

मैंने पूछा -’’ कब से है ये परम्परा ?’’

खीमदा - ’’ हमारे बाप-दादाओं के जमाने से हम तो यही सुनते और करते आये हैं ’’

मैंने पूछा - ’’ अभी तक ये छल लगा है किसी को ?’’

खीम दा - ’’ मेरी जानकारी में तो नहीं है, लेकिन लोगों का कहना है ।’’

मैंने पूछा - ’’ क्या यह कठपतिया वन देवता आप ही के गांव में है ?’’

खीमदा -’’ नहीं नहीं,। पहाड़ के कई इलाकों में ये परम्परा है। ये कठपतिया ऊॅची धार (पहाड़ की चोटी ) के चौबाटे पर ही होते हैं ।’’

मेरे मन में ये बात बार बार सोचने को मजबूर कर रही थी कि जरूर इस परम्परा के पीछे कोई कारण रहा होगा । अचानक ही मुझे लगा कि मुझे इसका उत्तर मिल गया । मैं खीमदा को समझाने लगा ।

’’ खीम दा ! ये कोई वन देवता नहीं और नहीं कोई साया या भूत-प्रेत है । कठपतिया का शाब्दिक अर्थ है - काष्ठ और पत्तियां । दरअसल आप जिन बाप-दादाओं की बात कर रहे हो , उस जमाने में मोबाइल तो था नहीं और न यातायात के साधन आज की तरह थे । लोग कई दिनों का सफर पैदल ही तय करते थे । यह उस समय के लोगों की अपनी युक्ति रही होगी कि आगे जाने वाला राहगीर पीछे आने वाले राहगीरों को रास्ते का संकेत दे सकें । इसलिए संकेत स्वरूप कुछ चीजें रास्ते में डाल दिया करते होंगे । धीरे धीरे लोग इसके पीछे का कारण जाने अन्धानुकरण करते गये । ऐसा नहीं हो सकता क्या खीम दा ?’’ मैं तो पूरी तरह आश्वस्त हो चुका था , केवल खीमदा की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी।

खीमदा मेरे तर्क के आगे निरूत्तर थे , बोले-’’आपकी बात में भी दम है । ’’

मैं इस रहस्य से पर्दा उठाने में कामयाब हो गया था और इसी बात चीत में हम गांव के सिरहाने पहुंच चुके थे ।

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प्रविष्टि क्रमांक - 115

भुवन चन्द्र पन्त

श्रद्धा का अपहरण

इस बार बड़ी श्रद्घा से वैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग, देवघर जाने की योजना बनाई । देवघर, संथाल परगना के अन्तर्गत एक झारखण्ड का प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है । मन में अगाध श्रद्धा के साथ ज्यों ही हमारी गाड़ी देवघर मन्दिर के क्षेत्र में पहुंची , पण्डों की भारी जमात के बीच एक हृष्टपुष्ट पण्डा गाड़ी की ओर लपका और हमारी गाड़ी के पीछे पीछे आते बोला - ’’ मेरा नाम गणेश है , याद रखियेगा और गाड़ी सामने पार्क में लगा दीजिए । जानता था कि पण्डों के चंगुल में फॅसकर निकलना आसान नहीं होगा , सो मैं उसे इन्कार करता रहा कि मुझे पंडित जी की आवश्यकता नहीं है, हम तो यों ही दर्शन करने को आये हैं । लेकिन वह हमारी बात को मानने वाला कहां था , बोला - ’’आपकी मर्जी हम आपको मन्दिर बता देते हैं , व्यवहार भी कोई चीज होती है । आप चाहें तो 10 रूपये का गंगा जल और 25 रूपये के फूल चढ़ाकर भी दर्शन कर सकते हैं । रूद्राभिषेक का 1600 रूपये होगा, मर्जी आपकी ।’’ मैंने किसी तरह पिण्ड छुड़ाने के बहाने उनसे बोला - पंडित जी 501 रू0 की पूजा करवा दीजिए। हमें चंगुल में फंसता देख उसने हाँ कर दी ।

कुछ ही देर में हमें मन्दिर परिसर में बिठाकर एक टोकरी में पूजा सामग्री ले आया बमुश्किल 100 रूपये का सामान होगा उसमें । लम्बी लाइन को चीरते हुए हमारा हाथ पकड़कर वह मन्दिर के गर्भगृह तक ले गया, जहां लाइन में लगे लोगों को घण्टों का इन्तजार करना पड़ता , चन्द मिनटों में हम वहां पहुंच गये । सामग्री को गर्भगृह में शिव लिंग पर अर्पणकर बाहर निकले तो बोले आप जोड़े में आये हो , सामने पार्वती जी का मन्दिर है , प्रत्येक जोड़े को शिव पार्वती का गठबन्धन करना ही चाहिये , पत्नी थेाड़ी धर्मभीरू थी, बहकावे में आ गयी । एक कपड़े की डोर हाथ में थमाते हुए बोले - ये 501 रूपये का और जो मोटा वाला है , 1001 रूपये का । हमने 501 के लिए हाँ कर दी । मन्दिर के शीर्ष में चढ़कर सामने पार्वती जी के मन्दिर तक अंचल ग्रन्थि बध चुकी थी । अब समय था आरती का , मन्दिर में आरती करते समय संयोगवश थाल हाथ से फिसल गया , पत्नी के मन में शंका तो स्वाभाविक थी ,पण्डित जी ने आग में घी डालने का काम किया और बोले यह अपशकुन है , इसके लिए आपके नाम का अनुष्ठान हमें करना पड़ेगा । 5001 रूपये का खर्च आयेगा सब अनिष्ट टल जायेगा । खैर पत्नी की शंका तो दूर करनी ही थी , मोलभाव के बाद 2500 में ये भी निबटा ।

अब विदा लेने लगे तो पण्डित जी बोले -’’इस पण्डित के पेट का ख्याल कुछ नहीं रखोगे ?

मैंने कहा-’’ ये सब दिया तो है आपको ’’

बोले-" ये तो अनुष्ठान का सामान का खर्चा है, हमें क्या मिला । खैर कोई बात नहीं अपनी श्रद्धा से इस पण्डित को जो उचित समझो खुशी से दे दो । आखिर हमारी रोजी रोटी तो यही है ।" 500 रूपये का नोट पण्डित जी को पुनः थमाकर सुकून की सांस ली । सचमुच जिस श्रद्धा के भाव से आये थे, वो श्रद्धा कहाँ काफूर हो गयी पता नहीं , सारा ध्यान पण्डित जी से निबटने में केन्द्रित हो गया ।

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