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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 116 // सदभावना // चरण सिँह गुप्ता

प्रविष्टि क्रमांक - 116

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चरण सिँह गुप्ता

सदभावना

मैंने दिल्ली की तंग गलियों से निकलकर गुडगांवा के स्वच्छ वातावरण में अपने दो लड़कों की सोचकर एक दुमंजिला मकान बना लिया था। परन्तु परिस्थिति वश बड़ा लड़का दिल्ली में ही रहने लगा इसलिए मैंने मकान की पहली मंजिल किराए पर उठाने की मंशा बना ली। जल्दी ही एक अरूण शर्मा, अपने एक साथी के लिए, जो स्टेट बैंक ऑफ मैसूर में आने वाली थी, के लिए मकान देख गया। अचानक हमें देहली जाना पड़ गया और हम अपने बड़े लड़के के पास ही ठहर गए। इस दौरान मेरे छोटे लड़के पवन ने फोन पर बताया, शर्मा जी के साथ आई “नई किराएदार ‘साहीन’ किराए की अग्रिम राशि दे गयी है तथा वह एक मुस्लिम लड़की है।

यह जानकर हिन्दू रीतिरिवाजों के अनुसार पूजा पाठ करके पली बढी मेरी पत्नी विचलित होकर बोली, “नहीं, नहीं हम किसी मुस्लिम को अपने घर में नहीं रखेंगे। इस पर मैं दुविधा में पड़ गया। मैंने पत्नी को समझाते हुए उन्हें याद दिलाया, “देखो, हम शामली गए थे न ?”

“हाँ गए थे।”

“वहाँ बहन जी के घर का सारा काम कौन लोग कर रहे थे ?”

पत्नी ने अपना तर्क दिया,“वे काम ही तो कर रहे थे, घर में बस तो नहीं गए थे।”

“हम भी उन्हें अपने साथ थोड़े ही रख रहे हैं, वे तो ऊपर रहेंगे।”

पत्नी अपनी असमंजसता जाहिर करते हुए, “मुझे तो कुछ जँच नहीं रहा फिर भी आपके हामी भरने का ख्याल रखकर इतना जरूर चाहूंगी कि वे घर में कुछ गंदा न पकाएं तथा मैं उनसे कोई संपर्क नहीं रखूँगी।”

जिस दिन हम देहली से वापिस आए उसी दिन साहीन भी अपनी माँ तथा भाई के साथ सारा सामान लेकर आ गई। गर्मी का मौसम, मुजफ्फर नगर से गुडगाँवा का लम्बा रास्ता, वे प्यास से व्याकुल दिख रहे थे। अपनी खिड़की से उनका चमचमाता चेहरा देखकर मेरी पत्नी का दिल पसीज गया। उन्होंने फ्रिज से एक ठन्डे पानी की बोतल मुझे थमाते हुए कहा, “ऊपर दे आओ।”

मैनें अपने चेहरे पर मुस्कान लाकर धीरे से कहा, “अतिथी देवो: भव: ?”

मेरी पत्नी मुस्करा दी और मैं पानी की बोतल लेकर ऊपर चढ़ गया। बातों ही बातों में पता चला कि शाहीन के पिता जी गुजर चुके थे। उसका एक ही भाई है जो साथ रहता है। साहीन ने अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। उनका परिवार मांस-मछली इत्यादि का सेवन नहीं करता। उनका पहनावा तथा रहने का अंदाज भी वर्तमान युग के पढ़े लिखे लोगों की तरह है जिससे मुस्लिम समाज की छाप नजर नहीं आती।

ये बातें, खासकर साहीन के सिर पर पिता का साया न होना, मेरी पत्नी के मन में उसके प्रति संवेदना भर गई। थोड़े दिनों के अंतराल में ही मेरी पत्नी के व्यवहार से ऐसा प्रतीत होने लगा था जैसे वे संदेशा दे रही हो कि भगवान, ईश्वर, अल्लाह, परमात्मा आदि सब एक हैं तो फिर इंसान मिलजुल कर, एक होकर क्यों नहीं रह सकते। धर्म चाहे कोई हो मनुष्य के मन में एक दूसरे के प्रति इंसानियत और सदभावना हमेशा कायम रहनी चाहिए।


चरण सिँह गुप्ता

डब्लू.जैड.-653, नारायणा गाँव

नई देहली-110028


Email: csgupta1946@gmail.com

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