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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 126 // दर्द का रिश्ता // मनीष श्रीवास्तव

प्रविष्टि क्रमांक - 126

मनीष श्रीवास्तव

दर्द का रिश्ता

अशरफ पार्क में गुमसुम बैठा बच्चों को खेलता हुआ देख रहा था। तभी आवाज आई - ‘‘तुम यहाँ रोज आते हो बेटा।’’ एक वृद्ध की आवाज से अशरफ की तंद्रा टूटी। पास ही खड़े वृद्ध को देखकर अशरफ ने हाँ में सिर हिलाया। असल में पार्क वृद्धाश्रम में ही बना मैदान था जिसके सामने एक बाल आश्रम था। बच्चे वृद्धाश्रम में खेलने आ जाते तो वृद्धों का भी मन बहल जाता। ऐसे ही एक वृद्ध राघवेन्द्र पिछले कुछ दिनों से अशरफ को पार्क में आते-जाते देख रहे थे। अशरफ की शादी को पाँच साल हो गये थे पर कोई संतान न थी। कई बार बच्चा गोद लेने का विचार भी किया, पर अशरफ के वालिद इसके लिए तैयार न थे। इसी उधेड़बुन में अशरफ रोज बच्चों को खेलते देखने और सुकून की तलाश में पार्क में आ जाता। दूसरी तरफ राघवेन्द्र थे जो घर से संपन्न होते हुए भी उनकी इकलौती संतान ने उन्हें वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर कर दिया था। इस एक मुलाकात के बाद ही धीरे-धीरे राघवेन्द्र और अशरफ का रोज का मिलना हो गया। रोज की मुलाकात में कब दोनों एक दूसरे के दर्द के साझेदार हो गये पता ही न चला।

एक दिन अशरफ के वालिद ने कहा ‘‘ऑफिस से कल की छुट्टी ले लेना। कहीं जाना है।’’ अगले दिन अशरफ सपरिवार जब निकला तो उसे रास्ता जाना-पहचाना दिखने लगा। जब गाड़ी आखिर में रूकी तो उसने खुद को उसी वृद्धाश्रम के सामने पाया, जहाँ के पार्क में वो रोज जाया करता था। इससे पहले कि अशरफ कुछ बोल पाता। उसके वालिद ने कंधे पर हाथ रखकर कहा ‘‘बेटा हम यहाँ बच्चा गोद लेने आये हैं। अब हमारी नजरों से जहालत का पर्दा हट चुका है।’’ अशरफ को समझ ही नहीं आ रहा था कि कहीं वो सपना तो नहीं देख रहा है। उसे असमंजस में देख वालिद ने कहा ‘‘उसी के एक दोस्त ने उन्हें अपनी जिंदगी के अनुभवों से रूबरू कराकर उनकी सारी गलफहमियाँ दूर कर दीं। उनके समझाने से ही समझ आया कि बच्चे खून के रिश्तों से नहीं परवरिश से अपने बनते हैं।’’ अशरफ समझ गया कि उनका यह दोस्त कोई और नहीं बल्कि उसके दर्द को महसूस करने वाले राघवेन्द्र ही हो सकते हैं। अशरफ ने बाल आश्रम से निकलते ही सामने राघवेन्द्र को पाया। और दिनों के मुरझाये चेहरे से इतर आज उनके चेहरे पे रौनक अलग ही दिखाई दे रही थी। उसी समय अशरफ ने सोच लिया कि एक दिन वो भी राघवेन्द्र को उनके अपने बेटे से मिला के ही रहेगा।

मनीष श्रीवास्तव

सह—संपादक

इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए

भोपाल, मप्र

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