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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 127 // समाधान // शशांक मिश्र भारती

प्रविष्टि क्रमांक - 127

शशांक मिश्र भारती

समाधान

एक विद्वान दक्षिण घूमने गए। वहां इनको चार पुराने मित्र मिल गए। हालचाल पूछा फिर कहा मैं आप चारों को पांच -पांच सौ रुपये देना चाहता हूं बताओ उन रूपयों का क्या करोगे ?

उनमें से पहला तमिल था वह बोला मैं तो इस पर व्यय करूंगा ।

दूसरा केरल से था बोला मैं इस पर व्यय करूंगा।

तीसरा कर्नाटक से था वह बोला यह क्या होता मुझे तो यह चाहिए। चौथा ओड़िसी था। सबको चुप कराते हुए बोला क्यों झगड़ा करते हो। यह सब तो मूर्खता के लक्षण हैं। मैं तो यह खरीदने वाला हूं।

यह सुनकर तीनों उस चौथे से लड़ गये। इस तरह चारों का झगड़ा मारपीट तक पहुंच गया। चारों अलग-अलग भाषा-भाषी थे। एक-दूसरे की भाषा नहीं समझ पा रहे थे। अन्यथा ऐसी स्थिति न आती।

उन विद्वान को आगे बढ़कर समझाना पड़ा मित्रों आप सभी जिस वस्तु के लिए लड़ रहे हो वास्तव में वह एक ही है और एक-दूसरे की भाषायें न समझ पाने के कारण ऐसा हो रहा है ।चिन्ता मत करो मैं सबकी इच्छा पूरी कर दूंगा ।

कोई भाषायी सेतु न होने से ऐसी स्थिति अक्सर आ जाती है। सामंजस्य का आधार शब्द असामंजस्य का कारण न बने इसका समाधान है एक राष्ट्रभाषा -सम्पर्क भाषा।

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1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय,
    विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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