लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 128 से 132 // डॉ. लता अग्रवाल

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प्रविष्टि क्रमांक - 128 डॉ लता अग्रवाल १. संता न सुख तीन - तीन अफसर बेटों की माँ होकर भी यूँ इस तरह अभाव ग्रस्त, एकांत जीवन जी रही हूँ , य...

प्रविष्टि क्रमांक - 128

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डॉ लता अग्रवाल

१. संतान सुख

तीन - तीन अफसर बेटों की माँ होकर भी यूँ इस तरह अभाव ग्रस्त, एकांत जीवन जी रही हूँ , ये कैसा न्याय है तेरा भगवान ? आज अपने अकेलेपन से मन कुछ ज्यादा व्यथित हो उठा। बस उसी पीड़ा ने कदम मंदिर की ओर मोड़ दिए।

स्वयम को परमात्मा कहाये फिरते हैं ; आज पूछूँगी उनसे , 'आखिर क्यों किया मेरे साथ ऐसा...?क्या यही दिन देखने मैंने पति के न रहते हुए भी उन्हें काबिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी...!'

मंदिर की सीढियां चढ़ते हुए मेरी नजर सीढ़ी पर बैठी एक स्त्री की ओर गई। जो दो मानसिक रूप से विकृत बच्चों को बारी - बारी से निवाले खिला रही थी। बच्चे आधा खाते आधा मुँह से टपका देते , आते जाते लोगों को देख बच्चे याई....याई ....कहकर पुकारते , और वह स्त्री उन्हें प्यार से समझाती नहीं ऐसे नहीं करते , उनके मुख से टपकती लार को वह मुस्कुराते हुए अपनी साड़ी के छोर से पोंछती ।

"ये .....? मैंने उससे पूछना चाहा।

"ये मेरे बच्चे हैं ?" उसने दोनों के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा ।

"दोनों...! क्या बचपन से ही .....? "

" जी बचपन से ही दोनों ऐसे हैं ।"

" बहुत परेशानी होती होगी इन्हें सम्हालने में ...?"

"शुरू में होती थी अब आदत हो गई है। "

"कोई इलाज....? मेरा मतलब ...डॉक्टर क्या कहते हैं ? "

"डॉक्टर अपना प्रयास कर चुके, कहते हैं अब भगवान ही कुछ चमत्कार कर सकते हैं।"

जितने आक्रोश से कदम सीढ़ियाँ चढ़े थे अब आभार के भार से लदे उतर रहे थे |

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प्रविष्टि क्रमांक - 129


डॉ लता अग्रवाल

२. दीवार का दर्द

“ काहे इतनी उदास बैठी हो ,सन्नाटे से मन बोझिल है क्या ? “ उसने पूछा |

“हाँ ! मन बहुत बेचैन है जी |”

“कहा न इतना मत सोचा कर , ‘जाहि विधि रखे राम ताहि विधि रहियो‘ गोदना गुदाए है खुद पर तब भी |”

“का करूँ बेर - बेर पिछली बात आंखन के सामने घूम जात है , कभी इहाँ भी बहुत रौनक हुआ करती थी, वार त्यौहार तो दूर की बात है हर अमावस पूनम घर की लछ्मियाँ कित्ते चाव से मोय संवारत रहीं ,मजाल है मेय सयानेपन पर कोई आंच आ जाये | सुबह उठते ही बड़े बुजुर्गन के साथ तुमाये मोय भी कित्तो आदर भाव देत हीं | बड़की , मझली फिर छोटी फिर लखन की पतोहू तक के बालकन के जनम पे हरे - हरे गोबर के सतिये से लेके ब्याह में हल्दी के थापे से कितनी सजत रही मैं । “

“मैं समझूं हूँ तेरी पीर , जानत ना हूँ सिंगरती , सिंहरती तू फूली न समाती थी |”

“सच्ची जी ! आज बिन सिंगार मन बहुत टूटे है | अम्मा ने कित्ती अच्छे संस्कार डाले हे बहुअन में कभी अहोई अष्टमी के थापे तो कभी चौथमाता के मांडने , कभी गणगौर की ठिपकियाँ तो कभी सुन्दर सोमवती के मनभावन छाप से सब मिलकर मोहे इंद्र धनुषी रंगन ते सजाए रखतीं । फिर बाबूजी ते लेकर सभी छोरे, नाती पन्ती कितनी श्रद्धा से ढोग दिया करते । मैं भी सबको दिल से असीसती ‘ दूधो नहाओ - पूतों फलों ‘। साँझ ढलते ही मेय आला दिए ते जगमगा जात हा |” हं...उसने एक लम्बी साँस छोड़ते हुए कहा |

“अब वो बखत ना रहा, मत अफ़सोस कर |”

“कैसे न करूँ जी कित्ते बरस हो गये वार त्यौहार भी रोसनी को तरस गई | यही पीड़ा मोय भीतर ही भीतर खाय जा रई । कब ते एकांतवास झेलत येई आस में खड़ी रई , कोई तो आये, मेरा लुटा सुहाग लौटाए |”

“तू तो अपनी कह के हल्की हो रई मैं कौन सू कहूँ अपनों दर्द , मेरो तेरो दुःख साँझोई तो है । कभी मैं भी तो नन्हें कदमों की रुनझुन और किलकरियों से गुलजार रहा था । कभी इहाँ बैठ घर की सुहागिनें ढोल ढमाके संग नाच नाच के खूब मंगल गीत गात रहीं । चौक पूरती , तुलसी मैय्या को जाल चढ़ाती | कभी मेरी देहरी पे भी कोई आशा का दीप जोहता , अपनों के समाचार पाने घण्टों डाकिया का इंतजार करता |  जूही, मोगरा, चमेली की खुशबू से आबाद हो मैं भी तो अपने में इठलाता , फूला न समाता । अपनी गोद में मैंने भी तो कई पीढियां खिलाई हैं , यहीं न वो छायादार नीम जो अप साथ छोड़ गया पंछियों की कित्ती चहचाहट रहती थी , शाम होते ही पंछी दाना चुगके और घर के मरद काम ते लौटते कित्ता हो हल्ला मचा रहता था ।“

“सही कहो हो जी, तुमाये भीतर भी इत्तो दर्द है कभी कही क्यों न मन की ?”

“क्या कहता पगली , कुछ बातें कहने की ना होती , वक्त के साथ सारे पंछी उड़ते चले गए। पंछी पर कोन को बस है ?

सूनी आँखों से आंगन बीती स्मृतियों में मग्न था कि वह भरभरा कर उसकी गोद में ढह गई | पीड़ा तो उसकी भी कसक दे रही थी मगर उसने दिल बड़ा करते हुए ढही दीवार को अपने में समा लिया।

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प्रविष्टि क्रमांक - 130


डॉ लता अग्रवाल

३. गोलू की गुल्लक

सुबह से गोलू के चेहरे पर अजीब सी चमक थी। खुशी से चहक रहा था वह, उसकी गुल्लक जो भर गई थी आज। कितने दिनों से पाई - पाई जोड़ रहा था इस दिन के लिए आज वह आस पूरी हो गई।

बचपन की उस कच्ची मिट्टी को परिस्थितियों ने ऐसा गढ़ा है कि हर रोज सांझ ढलते ही खदेड़कर माँ से अलग कर दिया जाता। बन संवरकर माँ हर रात एक नए आदमी के साथ कमरे में बंद कर दी जाती। बालमन को बहलाने जाते - जाते माँ हर रोज एक नोट पकड़ा देती। गोलू घण्टों दरवाजे के बाहर बैठा रोता रहता, माँ के निकलने का इंतजार करता फिर उदास हो चुपचाप अपने बिछौने पर जाकर सो जाता। नींद में उसके नन्हें हाथ बिछौने में माँ का आँचल तलाशते मगर अफसोस ! मन का आकाश रीता ही रह जाता।

सुबह जब माँ कमरे से निकलती तो उसके हाथों में चंद नीले, गुलाबी नोट होते जिन्हें वह सम्हालकर तकिए के गिलाफ में रख देती।

तभी से नन्हा गोलू सोच रहा था काश ! उसके पास भी ऐसे नोट हों तो वह अपनी इच्छा पूरी कर पायेगा।

आज उसकी अभिलाषा पूरी हुई ,सांझ होते ही जब माँ जाने को हुई, गोलू में झट गुल्लक माँ के हाथों थमाते हुये कहा,

" ये ले माँ, आज तो तू मेरे साथ सोयेगी न ?"

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प्रविष्टि क्रमांक - 131


डॉ लता अग्रवाल

४. धमाका

फिर एक धमाका ...! , उफ़ ! लगा जैसे कहीं कुछ टूटा | वैसे कोई नई बात नहीं थी , जिस दिन से कलह ने इस घर की दहलीज़ पर कदम रखा है ऐसे धमाके नित ही होते रहते हैं ....मगर आज रोज से कुछ ज्यादा ऊँचा स्वर था , लगता है कोई बड़ा अहम टकराया है | सो मन की कोठरी से चेतना ने धीरे से झांक कर देखा , अंदेशा सही निकला .... दो अहंकार आपस में टकरा रहे थे , उनकी टकराहट की ऊष्मा में प्रेम, सद्भावना, अपनत्व भी भाप बनकर उड़ गये | नफरत, ईर्ष्या और द्वेष ने रौद्र रूप धारण कर रखा था जिससे सर्वत्र भाषायी व्यभिचार का साम्राज्य फैल गया था | मर्यादा लहुलुहान हो जमीं पर तडप रही थी | रिश्तों की हड्डियाँ चरमरा रही थीं |

आनन् – फानन में सदाचार ने उपचार हेतु चिकित्सक विवेक को बुलाया जिन्होंने रिश्तों की टूटी हड्डियों पर उनके बुनियादी प्रेम का प्लास्टर लगाया | प्लास्टर लगते ही अहंकार का चूना धीरे-धीरे झरने लगा था कि फिर एक धमाका हुआ| इस बार चेतना ने पलटकर देखा तो अहंकार जमीं पर पड़ा दमतोड़ रहा था ...रिश्ते मुस्कुरा रहे थे |

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प्रविष्टि क्रमांक - 132


डॉ लता अग्रवाल

५. देहलीज का दर्द

खबर पाते ही कि छोटी बहन का ब्याह हो रहा है | शिल्पा अपनी गुरु नाज बी के मना करने पर भी वहां का मोह त्याग न पाई | सोचा माँ तो रही नहीं , भाई भी छोटा ही है उसे कहाँ दुनियादारी की इतनी समझ ...छोटी बहन माँ की ममता को तरस रही होगी | वह जाकर सब कमी दूर कर देगी आखिर बड़ी बहन भी माँ के समान ही होती है | अब तक तो उसके प्रति उनकी तल्खी भी समाप्त हो गई होगी |

खैर ! उन पर बोझ नहीं अब वह ...दो दिन विवाह की रस्में पूरी कर लौट जाएगी अपनी बस्ती में ...| अपनी बचपन की गलियों में जाकर लगा जैसे फिर से पुराने दिन याद आ गये | इन्हीं गलियों में कभी खुशियाँ बरसती थी ...आज दर्द का अहसास दे रही हैं | शिल्पा जैसे ही घर की चौखट पर पहुंची ,

“अरे ! लो किन्नर आ गई ...” मेहमान चहकते हुए बोले , मानो उनके मनोरंजन का साधन आ गया | शिल्पा की नजर छुटकी को खोज रही थी , ये... रही , छुटकी कुछ लडकियों से घिरी मेहँदी लगवा रही थी | शिल्पा छुटकी को सीने से लगाने उसकी ओर बढ़ी कि आखिर बहन तो पहचान ही लेगी |

“ अरे..! अरे !.. वहां कहाँ जा रही हो , इन्हें तो न बस नेग लेने की पड़ी रहती है |” छुटके की बहु है शायद मालिकाना हक़ दिख रहा था बोलने में | तभी हलवाई के लिए सामान लेने छोटू वहां आ पहुंचा ..नजरें टकराई मगर वही उपेक्षा भाव...!!! शिल्पा ने बढ़कर छुटकी की बलैय्या ली उसका माथा चूमने छुकी ही थी कि छुटकी कान में बोल पड़ी ,

“दीदी ! माँ –बाबा के न रहने पर बड़ी मुश्किल से ब्याह तय हुआ है | अब तुम्हारे आने से सब गडबड हो जायेगा ....प्लीज़ ! यहाँ से चली जाओ दीदी | मेरा ब्याह राजी ख़ुशी हो जाने दो |” कुछ कहती शिल्पा इससे पूर्व मेहमान बोल पड़े ,

“अरे ! खड़ी क्या हो कुछ ठुमके तो लगाओ ...ऐसे नेग नहीं मिलने का ...हा !हा ! हा! |” दो हंसों की जोड़ी दरवाजे खड़ी रे ...आज मेरी बन्नो ससुराल चली रे |” दिल में शूल की चुभन , आँखों में आंसू ले शिल्पा ने ठुमके लगाये | बेग से सोने की अंगूठी निकाल छुचुटकी के हाथ में धर दरवाजे की ओर बढ़ गई |

“अरे ! अरे ! तुम्हारा नेग तो लेती जाओ ..|” छुटके की बहु पीछे से चिल्लाई | मगर शिल्पा ...अपना कोई दर्द उधार रह गया था इस देहलीज पर वह झोली में समेट अपनी बस्ती की ओर चल दी |

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डॉ लता अग्रवाल

शिक्षा - एम ए अर्थशास्त्र. एम ए हिन्दी, एम एड. पी एच डी हिन्दी.

जन्म – शोलापुर महाराष्ट्र

प्रकाशन - शिक्षा. एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं में 50 से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन| पिछले 9 वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर संचालन, कहानी तथा कविताओं का प्रसारण पिछले 22 वर्षों से निजी महाविद्यालय में प्राध्यापक एवं प्राचार्य का कार्यानुभव ।

सम्मान

१. अंतराष्ट्रीय सम्मान

Ø प्रथम पुस्तक ‘मैं बरगद’ का ‘गोल्डन बुक ऑफ़ वार्ड रिकार्ड’ में चयन

Ø विश्व मैत्री मंच द्वारा ‘राधा अवधेश स्मृति सम्मान |

Ø " साहित्य रत्न" मॉरीशस हिंदी साहित्य अकादमी ।

२. राष्ट्रीय सम्मान

, 24 अभिनव कला परिषद भोपाल द्वारा "शब्द शिल्पी सम्मान" । अग्रवाल युवा चेतना मंच द्वारा "सशक्त नारी सम्मान"।साहित्य पीडिया द्वारा बेटी कविताओं पर प्रतियोगिता में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कविता चयनित ।बाल लघुकथा संग्रह 'तितली फिर आएगी' को "स्व. मोहिनी रिजवानी स्मृति सम्मान" । कथाबिम्ब द्वारा "कमलेश्वर स्मृति सम्मान" कहानी 'सिग्नल के पार'। समीर दस्तक की ओर से "राष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान"। राष्ट्रीय बाल कहानी प्रतियोगिता में परशुराम शुक्ल पुरस्कार कहानी "कबीट वाली नानी"। लघुकथा "सांझा दुख" को सितंबर में 'स्वर्गीय मंगत राम चौधरी स्मृति पुरस्कार' ।"शिक्षाविद" के रूप में नागरिक कल्याण समिति भोपाल द्वारा सम्मानित ।शीर्षक साहित्य परिषद द्वारा 'लघुकथा रत्न सम्मान"। अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता अजमेर में राष्ट्रीय शब्द्निष्ठा सम्मान, समीर दस्तक चित्तौड़ से साहित्य गौरव सम्मान,स्वतंत्रता सेनानी ओंकारलाल शास्त्री पुरस्कार सलूम्बर , महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान, बेटियों पर राष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता सविता चड्ढा स्मृति सम्मान ।उद्गार मंच द्वारा कविता "किताबों का कफ़न ओढ़े", "बरसोदया","मनभावन चरित्र" , "गुड़ गोबर",'चयन' श्रेष्ठ रचना ।राजस्थान नाथद्वारा साहित्य मंडल द्वारा मानद उपाधि से सम्मानित। शिलांग ,श्रीमती सुषमा तिवारी सम्मान,भोपाल, प्रेमचंद साहित्य सम्मान,रायपुर छत्तीसगढ़ , श्रीमती सुशीला देवी भार्गव सम्मान आगरा, कमलेश्वर स्मृति कथा सम्मान, मुंबई ,श्रीमती सुमन चतुर्वेदी श्रेष्ठ साधना सम्मान ,भोपाल ,श्रीमती मथुरा देवी सम्मान , सन्त बलि शोध संस्थान , उज्जैन, तुलसी सम्मान ,भोपाल ,डा उमा गौतम सम्मान , बाल शोध संस्थान, भोपाल , कौशल्या गांधी पुरस्कार, समीरा भोपाल, विवेकानंद सम्मान , इटारसी, शिक्षा रश्मि सम्मान, होशंगाबाद, अग्रवाल महासभा प्रतिभा सम्मान, भोपाल ,"माहेश्वरी सम्मान ,भोपाल ,सारस्वत सम्मान ,आगरा, स्वर्ण पदक राष्ट्रीय समता मंच दिल्ली, मनस्वी सम्मान , अन्य कई सम्मान एवं प्रशस्ति पत्र।

निवास - 73 यश बिला भवानी धाम फेस  - 1 , नरेला शन्करी . भोपाल - 462041

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नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 128 से 132 // डॉ. लता अग्रवाल
लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 128 से 132 // डॉ. लता अग्रवाल
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