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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 142 व 143 // डॉ. मौसमी परिहार


प्रविष्टि क्रमांक - 142

डॉ. मौसमी परिहार

उड़ान
धर की छत पर आज बहुत दिनों के बाद आकर बैठी थी साँची। शाम का समय, ढलती शाम। पीपल का विशाल वृक्ष, जिसकी डाल पर गौरैया का घोंसला था। गौरैया अपनी नन्ही गौरैया को पंख फैलाना और उड़ने का पाठ सिखा रही थी। साँची बैठकर देखने लगी। उसकी उत्सुकता थी कि गौरैया किस तरह अपने बच्चों को उड़ना सिखाती है?

उसे याद आया जब नवल ने पहली बार उसका हाथ पकड़कर चलना सीखा.......’’अरे वाह! मेरा बेटा चलने लगा।’’ खुशी से उछल पड़ी थी, वीडियो भी बनाया था। हल्की सी मुस्कान बिखेरे, अपनी यादों से बाहर आई, अंधेरा होने को था।

सुबह फिर साँची गौरैया को देखने पहुँची। नन्हीं गौरैया पंख फैलाना सीख गई थी। शाम होते-होते उड़ना भी सीख गई।

समय तो जैसे पंख लगा कर ही उड़ता है। साँची को फिर याद आया नवल का स्कूल जाना, कॉलेज जाना, नवल की पहली जॉब और........नवल के पिता का चले जाना.......? नवल की शादी और इक दिन नवल का दूर देश में बस जाना। उसकी आँखें भर आई।

जैसे गौरैया ने दो दिन में उड़ना सीख लिया, लगता है उसकी जिंदगी सिर्फ दो दिनों की ही रही हो।
अचानक नन्हीं गौरैया ने ऊँची उड़ान भरी, तेज हवा के झोंकों ने नाजुक पंखों को धक्का सा दिया पर गौरैया ने अपने पंखों का सहारा दिया। वापस उसे घोंसले पर ले आई। साँची ने आसमान की ओर देखा...... एक विमान
कोलाहल करता हुआ, दूर देश जा रहा था। ’पता नहीं, अब किस माँ का नवल उससे दूर जा रहा है।’
उसने सोचा ......’काश कि गौरैया की भाँति मैंने भी अपने नवल को ऊँची ’उड़ान’ भरने से रोक लिया होता.....?
विमान की आवाज हवा के साथ कहीं दूर चली गई। साँची आसमान में देखती रही। घोंसले पर गौरैया अपनी नन्हीं गौरैया को चोंच से कुछ सिखा रही थी.....?
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प्रविष्टि क्रमांक - 143
डॉ. मौसमी परिहार

वादियों का दर्द
अतिसुंदर, अप्रतिम, किसी ने सच ही कहा है ’’धरती पर स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है।’’ ’’काश की पहले यहाँ घूमने आई होती। कितना सुंदर है यह पहाड़ जो बर्फ की सफेद चादर से ढका है। मनोहारी, हरियाली, मन को तृप्त और सुकूं देने वाली वादियाँ...अहा! सुखद.......’’ रानी प्रकृति की सुंदरता निहारते सोच रही थी। अचानक उसकी नजर पेड़ों पर पड़ी, कुछ गहरे निशान थे उन पर- बंदूक की गोलियों के थे! ओह....! इतने जख्म?

लोगों के लिए सुकूं देते हैं पर इनका दर्द किसी ने समझा है क्या? कुछ दूर पर ही P.O.K. का बोर्ड लगा था। कटींले तार दूर तक लगे थे एक धरती को दो भागों में बाँटने के निशान थे, ये।

रानी ने आसमान से लेकर धरती पर नजरें दौड़ाई.... नीला आसमान, स्वछंद पंछी सरहद के इस पार और उस पार जा रहे थें बिना रोक-टोक, हवाएँ भी पेड़ों से बातें कर रहीं थी, और यहाँ भी, फिर क्यों.....? ये बंदूक लिए लोग खड़े है? सोचने पर मजबूर हो गई रानी...?
अचानक गोलियों की आवाज से छाई शांति भंग हुई। कोलाहल मचा काफी देर घमासान के बाद रानी ने पुनः देखा कि पेड़ो से पत्तियाँ, टहनी, गिर व झड़े पड़े थे बर्फ की चादरें छलनी, दरारों से फटी पड़ी थी, जैसे पूछ रही हो हमारा कसूर क्या है.......?
 क्यों कोई हमारे दर्द को नहीं समझता......!
सांय...सांय हवाओं से वादियाँ दर्द की दास्तां को बाँट रही थी......जो इंसान की समझ से परे था।
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1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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