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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 141 // वो खत // ममता छिब्बर

प्रविष्टि क्रमांक -

ममता छिब्बर

वो ख़त

मैं स्नेहलता.. बाबा मुझे प्यार से स्नेह कह कर पुकारते थे..
मैं शुरू से ही शर्मीली स्वभाव की, सीधी-सादी लड़की रही हूँ.. सलवार-कमीज-दुपट्टा, एक लंबी सी गूथ, बस ऐसे ही गुजार दिए कॉलेज के वो ३ साल... मेकअप तो दूर घर पर काजल लगाने की भी मनाही थी...
बात उन दिनों की है जब प्यार होना किसी बड़ी भयंकर लाइलाज बीमारी होने जैसा था..
औरों से तो क्या, खुद से भी अपना प्यार छुपाना पड़ता था.. जो हुआ है वह नहीं हुआ है ऐसा खुद को यकीन दिलाना पड़ता था..

ग्रेजुएशन के २ साल के आखिरी के कुछ दिन थे.. मैं मैदान से कक्षा की तरफ लौट रही थी कि अचानक एक लड़के से टकरा गई किताबों का गिरना लाजमी था.. उसने सॉरी मैम कहते हुए मेरी किताबें उठाकर मुझे थमा दी और चला गया..
मैं कुछ समझ पाती इससे पहले ही मेरी सहेली बोल पड़ी - किस्मत वाले ही टकराते हैं...
मैं रात भर सोचती रही टकराना-किस्मत अजीब बातें हैं... मैंने तो चेहरा भी नहीं देखा था उसका..

लगभग १ महीने बाद मेरी नज़र एक शख़्स पर पड़ी सफेद पठानी सूट, काली जूतियां, हाथ में कड़ा, भगत सिंह सरीखीं मूछें- देखने में काफी आकर्षक था, कसरत करता होगा जिम करने का फैशन नहीं था उन दिनों..
मैं बस देखती ही रह गई.. तीन महीने दूर से देखते-देखते निकल जाने के बाद उत्सुकता मुझे उसके करीब ले गई...
मौका भी था वो पास के ही नल से पानी पी रहा था, मैं उसके दायीं ओर एक कदम दूर खड़ी थी जैसे ही वो दायीं ओर मूड़ा मुझे एकदम पीछे हटना पड़ा..
"ओह! सॉरी मैम" बोल कर मुंह पोछते हुए चला गया..
मेरी सहेली जो मेरे साथ ही थी बोली - अब क्या बार-बार इसी से टकराती रहेगी..??
यह वही शख़्स था.. मैं रात भर सोचती रही- तो क्या मैं "सॉरी मैम" को चाहने लगी हूँ...
नहीं ऐसा नहीं हो सकता.. मेरे साथ तो बिल्कुल नहीं..

३ साल शुरू होने से पहले २ महीने की छुट्टियां पड़ी..
२ महीने नहीं, २ जन्म थे वो..
दिल उसे देखने को बेकरार था..
क्या मोहब्बत थी वो "उसे देख पाना ही जीने के लिए काफी था.."
ऐसा ही तो होता था प्यार तब..
मोहब्बत में किसी को पा लेने की जिद्द नहीं हुआ करती थी, बस उम्मीद होती थी उसकी एक झलक पाने की और दिन-रात उसी पल को वापस जीते-जीते बीत जाते..

२ महीने बाद कॉलेज खुला और डेढ़ महीने बाद वह मुझे फिर नज़र आया..
उम्मीद खोने लगी थी मैं उसे दोबारा देख पाने की..
" मैं लाइब्रेरी से किताब लेने जा रही थी और वह हाथ में गणित की किताब लिए मेरे बिल्कुल सामने आ खड़ा हुआ.. उसकी आंखें, भूरे रंग की थी, शरारती-सी, बहुत कुछ था उन आंखों में पर मुझे पढ़ने को शेक्सपियर की किताब लेनी थी..
सॉरी मैम - फिर "सॉरी मैम" कहता हुआ चला गया.. नाम पूछने की हिम्मत भी तो नहीं थी मुझमें..
कुछ तो किस्मत भी साथ देने लगी थी- उसकी नईं कक्षा मेरी कक्षा के आगे वाली थी अब उसे ढूंढने की जरूरत नहीं थी मुझे..
क्लास की पहली सीट पर बैठी में उसे आगे से गुजरते देखती थी उसकी भी नजरे अक्सर किसी को तलाशती हुई होती थी, नज़रें मिल जाने पर नजर चुराने का खेल बहुत आम सा हो गया था उन दिनों...
एक दिन तो मास्टर जी ने मुझे उसे देखने की सजा में उसके ही सामने कक्षा के बाहर खड़ा कर दिया..
उसका मुस्कुराना, मूछों को ताव देना, शरारती सी आंखें, बोलने का अंदाज सब कुछ उस दिन मैंने तसल्ली से देखा लगभग आधे घंटे..
बिल्कुल भी दुख नहीं हुआ उस दिन क्लास से बाहर निकाले जाने का..

कॉलेज का आखरी साल भी खत्म होने वाला था..
अब आगे क्या होगा?? बहुत बेचैनी थी..
नाम तक तो नहीं जानती थी उसका.. तब मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे.. ना नंबर दिया जा सकता था और ना आज की तरह फेसबुक पर ढूंढा जा सकता है..
वह सामने होता या ख्यालों में ...

एक दिन मैं हिम्मत कर उसके सामने जा खड़ी हुई.. अचानक ही मुंह से निकल गया "डेट-शीट आ गई है क्या??"
वह भी घबराया या बोला "हाँ-नहीं-पता नहीं, आप जाकर पता कर लीजिए"
इतना धीरे, इतना शालीन कोई लड़का कैसे बात कर सकता है?  आँखें भी तो नहीं मिला पा रहा था वह मुझसे...
एक तरफा प्यार अचानक ही जिंदगी लगने लगता है जब आपको एहसास होने लगे कि सामने वाला भी आपको चाहने लगा है..

परीक्षाओं से २ दिन पहले मेरी एक अन्य मित्र जिसे हम सुंदरी कहते थे (क्योंकि वह काफी सुंदर थी) - उसने मेरे हाथ में किताब थमाई और उसे देकर आने को कहा..
वो सामने था और मेरे पास मौका मैं कैसे छोड़ देती..
मैं चुपचाप जाकर किताब उसकी सीट पर रख आई.. करीब 2 घंटे बाद वो मेरी कक्षा के मुख्य द्वार पर किताब मेरे हाथ में वापस रख, मुस्कुराता हुआ चला गया..
मामूली मुस्कुराहट नहीं थी वो, कुछ पा लेने की खुशी थी जिसे उसका चेहरा छुपा नहीं पा रहा था.. सुंदरी मेरे हाथ से किताब लेकर कक्षा के अंदर भागी और मैं.. मैं देख रही थी उसे ओझल होने तक..
जब मैं अंदर गई तो देखा सुंदरी के हाथ में एक कागज का टुकड़ा था और आंखों में आंसू..
वो एक ख़त था.. मैंने उसके हाथ से लेकर पढ़ा जिसमें लिखा था -

" खत पढ़ा और जाना की तुम चाहती हो की पहल मेरी तरफ से हो.. मुझे मंजूर है..

मैं भी तुम्हें चाहने लगा हूँ.. तुम बहुत सुंदर हो.. बस तुम्हें ही देखना चाहता हूँ, मानो तुम्हें देखने के लिए ही कॉलेज आता हूँ...
काश तुम जिंदगी भर मेरे सामने रहो..

अच्छी नौकरी लगते ही मैं तुम्हारे घर शादी का प्रस्ताव भिजवा दूंगा.. प्रतीक्षा करना...

सिर्फ तुम्हारा आशीष

उसे मोहब्बत मिली थी, मुझे दर्द..
समझ नहीं आ रहा था क्या करूं..??
खुश हूँ उसके लिए या अपनी मोहब्बत अधूरी रह जाने का गम बनाऊं..

२ महीने का वक्त लगा खुद को समझाने में..
कॉलेज के आखिरी ३ महीनों में एक बार भी नहीं देखा मैंने उसकी तरफ जबकि वह हर दिन मेरे आस-पास ही मौजूद था..
कभी कैंटीन, कभी पानी की टंकी, कभी मैदान तो कभी लाइब्रेरी करीब ही तो थे हम दोनों..

पर वो दोनों एक दूसरे से प्यार करते थे मेरा बीच में आ जाना गलत था..
मैं भूलने की कोशिश कर रही थी उसे..

कॉलेज की पढ़ाई पूरी हुई..
१० महीने बिना उसे देखें कैसे बिताएं मैं ही जानती हूँ..
घर में मेरे लिए रिश्ते आ रहे थे और मैं बिना कोई कारण बताए मना किए जा रही थी..
बाबा परेशान रहने लगे थे..
इसी बीच सुन्दरी के विवाह की भी ख़बर मिली...

मैं टूट चुकी थी..
आखिर कब तक चलेगा ऐसा मैंने जिंदगी को फिर जीने का फैसला किया..
मैं शादी के लिए राज़ी हो गई, पर दिल राज़ी ही नहीं हो रहा था किसी और को चाहने के लिए...

शादी के लिए १ और रिश्ता आया हुआ था.. लड़का आर्मी में नौकरी करता था..
घर में लड़के के मां-बाप और बहन को मिलाकर कुल चार लोग थे..
माँ-बाबा खुश थे, मैं भी खुश होने की कोशिश कर रही थी...
पहले उन लोगों के रजामंद होने के बाद, मां-बाबा ने घरबार और लड़के को देखकर अंतिम निर्णय लेने का फैसला किया..
वह तीन लोग मुझे देखने आए.. देखना तो मानो यूं ही था उन्होंने बिना कुछ सोचे, बिना को पूछे रिश्ता पक्का कर दिया...
मैं कुछ बोल ही नहीं पाई..
जाते हुए मेरी होने वाली नंद मुझे एक ख़त पकड़ा गई....
मैंने ख़त पढ़ा -

" दस महीने लग गए तुम्हें ढूंढने में, 
इन दस महीनों में तुम्हें देखे बिना कैसे रहा हूँ नहीं जानता...
यह भी नहीं जानता तुम अनजाने में अपनी किस सहेली का ख़त मुझे दे गयी थी पर मेरा जवाब, उसमें लिखा हर एक लफ्ज़ सिर्फ तुम्हारे लिए था..
अब तुम मिल गई हो तो उम्मीदें लौट आई है.. इंतजार में हूँ कि तुम भी मेरी जिंदगी में लौट आओ...

सिर्फ तुम्हारा
स्नेह-आशीष

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ममता छिब्बर

० नाम : ममता छिब्बर
० पिता का नाम : एम एन छिब्बर
० शिक्षा : Msc Mathematic
० वर्तमान/स्थायी पता : 32/1 कैनाल रोड़ , राजपुर, देहरादून उत्तराखंड़

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