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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 148 से 150 // डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

प्रविष्टि क्रमांक - 148

डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'


सातवां कुआँ                

"हाँ, तो सुनो राजा बबुआ! आज तुम्हें जंगल के राजा की नहीं, कारू राजा की कहानी सुनाती हूँ।" 

-राजा की पेशानी पर पड़ती लकीरें गहन से गहनतर होती जा रही थी और मंत्री भी मुँह लटकाए, गर्दन झुकाए सोच में गुम। सात पुश्तों के लिए सात कुएँ भरने का निश्चय अब एक चौथाई सिक्कों की कमी से अधर में ही लटका रह जाएगा क्या?

चार कुएँ तो युद्धों में लूटे गए माल-असबाब से ही भर लिए थे। दो कुएँ ज़मींदारों-अमीरों से धन निकलवा-निलकवा कर भरे गए, पर यह सातवाँ कुआँ इतनी बड़ी आम-जनता के यहाँ से गहने-ज़ेवर और पाई-पाई वसूल करने के बाद भी अभी तीन-चौथाई ही भर पाया है। क्या किया जाए?

राजा कारु ने झल्लाते हुए कहा, "मंत्री जी! कुछ करो! कुछ भी करो, इस सातवें कूएँ को भरो, जैसे भी हो; ये मेरा हुक्म है।"

"लेकिन महाराज! हमारे वफ़ादार सैनिकों ने हर आम-ओ-ख़ास के पास एक पैसा तक नहीं छोड़ी। और कहीं हमला कर धन-दौलत लूट लाने को असला नहीं है,उसके लिए धन चाहिए।"

"ख़ज़ाने से धन निकालने की बात आइन्दा भूल कर भी न सोचना। तुम सिर्फ़ सातवें कुँए को भरने की सोचो!" राजा कारू क्रोध में दांत पीसते हुए बोले।

मंत्री ख़ामोश हो सोच में पड़ गया कि तभी नगर कोतवाल बोल पड़ा, "महाराज! यकीन मानिये हमने पूरे राज्य में किसी के पास एक दमड़ी तक नहीं छोड़ी। हालत यह है कि मुर्दा दफ़नाने पर पहले कभी आम-आदमी भी अन्तिम चलान की एक अशर्फ़ी उसके मुँह में रखता था, पर अब हमने किसी के पास उसके लिए भी एक दमड़ी तक नहीं छोड़ी हमने।" 

"क्या? क्या बोला कोतवाल!" चौकन्ने हो राजा कारू मानो चहक उठे।

"हाँ महाराज! किसी के पास एक दमड़ी भी नहीं छोड़ी हमने।"

"वो बात छोड़ो और अभी अपने सिपाहियों को ले जाकर पूरे राज्य में सभी कब्रें खुदवा कर एक-एक अशर्फ़ी निकालो और सातवें कुएँ को भर डालो।"

और फिर क्या था; कारू के ख़ज़ाने का सातवां कुआँ भी कुछ ही दिनों में नक्को-नाक भर दिया गया।"

"पर दादी! लोगों ने गहने-ज़ेवर और पैसे क्यों दिए?" सात वर्षीय पोते ने पूछा

"अरे बेटा, कौन अपना पैसा-पैसा इकठ्ठा किया धन ख़ुशी से देता है, वो तो राजा के सैनिक ज़ोर-ज़बरदस्ती करके छीन ले जाते थे। राजा का हुकम जो होता था, वे बेचारे भी क्या करते।"

कहानी सुन बबुआ मम्मी के पास सोने को जाने के लिए उठा और जाते-जाते बोला,"दादी सुनो! अब मुझे 'राजा बबुआ, राजा बबुआ' कभी मत बुलाना और धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर चल दिया वह।  

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प्रविष्टि क्रमांक - 149

डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'


मेरे ठाकुर जी  

यूँ तो कस्तूरी अपने जद्दी घर अलीपुर में सुख-शान्ति से रह रही थी, किन्तु पिता के जाने के बाद अशोक को माँ की चिंता हर समय सताती रहती। चाहे वह हर इतवार बेटे अंकुर को ले मंडी बंद होने पर, उनसे मिलने जाता और हर बार माँ को अपने साथ चलने की कहता भी, पर पहले रस्में निभाने के नाम पर और अब कोई भी बहाना बना माँ टाल देती। "बेटा, मैं यहाँ ठीक हूँ, तुम लोग परेशान न हो, रामु है न। क्यों परेशान होते हो।"

"पर, माँ! हमें चिन्ता रहती है तुम्हारी। मोहिनी हर बार तुम्हें साथ लाने को कह चुकी है।"           

"चिंता न करो मैं ठीक हूँ। तुम दूर थोड़े हो, कोई तकलीफ़ हुई तो मैं ख़ुद चली आऊँगी।" अक्सर यही जवाब मिलता। 

इस बार सभी मिल कर आए तो मोहिनी को माँ पहले से कमज़ोर लगी। उसने अशोक को कहा, "आप समझते क्यों नहीं? गाँव में भरी बिरादरी में मेरी क्या थू-थू हो रही होगी कि बहु सास को रखना नहीं चाहती। उन्हें वहां कुछ हो गया तो मैं क्या मुंह दिखाऊँगी?"    

बात मोहिनी की सही थी। अशोक ने अपनी बहन शकुन को कह माँ को शहर लाने पर राज़ी कर ही लिया।

माँ घर के पिछवाड़े बग़ीचे के आम से टोकरी-भर आम लाई। उसने मोहिनी से कहा, "बहु पहले आम ठाकुर जी के भोग के लिए रख दो और फिर अंकुर को मीठे आम जी-भर खिलाओ।" मोहिनी ने अच्छे से दो आम लेकर मंदिर की अलमारी में रख दिए। माँ ने आते ही अपने ठाकुर लड्डू गोपाल को उसी मंदिर में सजा दिया था। खाने से पहले उन्हें घी-शक़्कर की रोटी के साथ आमों का भी भोग लगाया गया।        

दादी के आते ही अंकुर के तो पौं-बारह हो गए। दिन भर दादी के साथ मज़े से खाने-खेलने में मम्मी-पापा को जैसे भूल ही गया। सुबह की पूजा से लेकर ठाकुर जी को सुलाने तक वह दादी के साथ बड़े कोतुहल से लगा रहता फिर सोते समय कभी कहानी तो कभी लोरी का भजन सुन, दादी के पास ही सो जाता। वह भी सुबह आराम से जागती, अंकुर जो उनके साथ ही उठ जाता। पोते की अठखेलियों से कस्तूरी के चहरे की रौनक बढ़ने लगी।

लेकिन अभी चौथा ही दिन था उसे यहाँ आए कि अशोक ने देखा माँ सुबह-सुबह बहुत परेशान है। कभी मंदिर की अलमारी में ऊपर-नीचे कुछ ढूंढ रही है तो कभी अपने कमरे में पड़े अंकुर के खिलौनों को टटोल रही है। उसके रोज़मर्रा के ज़ुबानी पाठ की आवाज़ भी अचानक ग़ायब थी। मोहिनी को रसोई में चाय  बनाने में व्यस्त देख, बिस्तर छोड़ माँ के पास आकर उसने पूछा, "क्या हुआ माँ? परेशान लग रही हो।"

"हैं, कुछ नहीं।" कह कर बिस्तर उलटने-पलटने लगी।

"क्या खो गया अम्मा!" परेशान हो बोला अशोक। उसकी आवाज़ सुन मोहिनी भी आ गई।

"हैं.. ठाकुर जी... "

"मंदिर में देखो न, वहीं तो सुलाती हो!" अशोक का ध्यान गया अंकुर वहाँ नहीं है वह समझ गया कि वही अम्मा के ठाकुर जी को ले गया होगा सुन्दर खिलौना समझकर, तो आवाज़ लगाई, "अंकुर, बेटे कहाँ हो?"     

"पापा मैं यहाँ हूँ।"

"यहाँ ,कहाँ ?"

"टॉयलेट में।"

"जल्दी बाहर आओ, तुम से कुछ पूछना है।"

"पर जल्दी कैसे आऊं, अभी ठाकुर जी ने पाटी नहीं की।"

"ये लो। ..." कह कर अशोक की त्यौरी चढ़ गई, मोहिनी ने हंसी रोकने को मुंह पर हाथ रखा।

"कोई बात नहीं बेटा!" कस्तूरी ने हौले से कहा, "बच्चा है!" पर अशोक फिर भी भुनभुनाता-सा अपने कमरे में चल दिया और वह अंकुर की तरफ़।     

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प्रविष्टि क्रमांक - 150

डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

अप्रत्याशित प्रश्न                                         

इतनी अपसैट क्यों है वह? उसे ख़ुद ही समझ नहीं आ रहा कि वह करे तो क्या करे! फ़ील्ड सर्वे से क्या लौटी कि प्रश्नों के बवण्डर में घिर गई। एक प्रश्न ने उसके अंतर्मन में खलबली मचा दी है। कल तक कितनी ख़ुश थी कनु अपने काम की प्रोग्रेस पर और आज.... !     

डेरी अनुसंधान के अंतर्गत माइक्रोबयॉलॉजी में पी.एच.डी के बाद कनुप्रिया को यू. एस. ए. की मल्टीनेशनल कंपनी के रिसर्च विंग में नौकरी क्या मिली कि मानो उसे कारू का ख़ज़ाना मिल गया।

अरे ! ना ना ये वो ख़ज़ाना नहीं, जो आप समझ रहे हैं या जिसे रुपये-डॉलर से आंका जाता है। हाँ; इतना तो है कि उसे पैकेज अच्छा मिला था, वो मल्टीनेशनल कंपनी का होता ही है इसमें कोन-सी  बड़ी बात थी। उसे तो चौबीसों घंटे नवीनतम संसाधनयुक्त प्रयोगशालाओं में आज़ादी से काम करने का मौका मिलना किसी अमूल्य ख़ज़ाने से कम न लगा, जहाँ न पॉवर-कट, न किसी तरह का दबाव या एहसान और न ही असुरक्षा का डर। दिन-रात काम करने और निधड़क आने-जाने की सुविधा। जहाँ सोशल सिक्योरिटी कार्ड का काग़ज़-टुकड़ा या टिकट मात्र नहीं था बल्कि पाँच मिनट में हर तरह की सुरक्षा मुहैय्या करवाने का पुख़्ता सबूत था। उसका प्रत्यक्ष प्रमाण कनु ने एक दिन देर शाम लैब से वापिस लौटते यूनिवर्सिटी बस के सफ़र में ही देख लिया था कि जब अचानक बस में उसके सामने की सीट पर बैठी लड़की को मिर्गी का दौरा पड़ा और ड्राइवर ने बस सड़क-किनारे रोक पुलिस को फ़ोन किया था। तब एक तो इस अचानक घटी घटना से तनु विचलित थी ही, दूसरे सोच रही थी कि न जाने अब दूसरी बस लेने में कितनी देर बाहर असहनीय ठण्ड में खड़ा रहना पड़े।

उसने पूरी बस में नज़र दौड़ाई न तो कोई सवारी बस से उतरी न ही ड्राइवर ने कोई अनाऊंसमैंट ही की। वह कुछ समझ पाती कि तभी शायद तीन मिनट में ही बस के आगे पुलिस की गाड़ी रुकी, डाक्टर सहित तीन स्क्योरिटी गार्ड बस में चढ़े, लड़की का मुआयना कर उसे स्ट्रेचर से अपनी गाड़ी में अस्पताल ले गए। तब से कनु इतनी आश्वस्त हो गई कि रात-दिन समय पर काम निपटाने की होड़ में लगातार काम में जुट गई।

उसी सिलसिले में वह डेविड के साथ उन गऊओं के रख-रखाव को देखने व कुछ ताज़ा दूध के सैम्पल लेने गई थी जिनकी गुणवत्ता को लेकर उसका काम चल रहा था।

कनुप्रिया वहाँ के बार्न (गौ-शालाएं) व खुली दूर-दूर तक फैली गौ-पालकों की व्यक्तिगत चरागाहें देख कर काफ़ी प्रभावित हुई। उसने दूध के कुछ सैम्पल लिए और गौपालकों से बातचीत कर सभी जानकारी हासिल की।

सब सही व काफ़ी ख़ुशगवार चल रहा था कि वापसी में सामान्य बातों में पता ही न चला; कब बातचीत का रुख़ भारतीय गऊओं की ओर यू-टर्न ले गया! और उसमें भी किसी वैज्ञानिक मुद्दे से जुड़ा प्रश्न या गऊओं के रख-रखाव से जुड़ी कोई बात न थी। वह तो सीधे गाय को लेकर फैले धार्मिक उन्माद पर एक बड़ा विकट प्रश्नचिह्न था ! 

"वाई पीपल आर सो फ़ेनेटिक अबाउट काऊ इन इण्डिया? (भारत में लोग गाय को लेकर इतने उन्मादी क्यों हैं?)"

क्या जवाब देती कनुप्रिया इस अप्रत्याशित प्रश्न का? डेविड ने इसी मुद्दे पर तब कुछ समाचारों का भी ज़िक्र किया था जिन्हें कनु के कान सुन कर भी अनसुना करते गए। तब उस शूल से तेजधार प्रश्न से पीछा छुड़ाने के लिए वह इतना ही कह पाई, "ओह डेविड,ऍम सो बिज़ी इन रिसर्च नो टाइम फॉर न्यूज़। सो, नो आईडिया ! (अरे डेविड, मैं अनुसंधान में इतना व्यस्त रही ख़बरों का समय ही नहीं मिला। कुछ पता नहीं।"

'ओ! रियली! (अच्छा ! सच्ची !!)" कह कर डेविड तो ख़ामोश हो गया और वह भी पूरे रास्ते कुछ न बोल पाई, बस दिमाग़ में एक खलबली-सी मच गई और वह यूं ही अपने नोट्स पर आँखें गढ़ाए व्यस्त रहने का बहाना खोजती रही। डेविड ने गंतव्य पर पहुँच गाड़ी रोकी तो उसने औपचारिक मुस्कान से उसका थेंक्स किया और अपना सामान समेत झट फ़्लैट की तरफ़ चल दी, कि कहीं डेविड की मुस्काती आँखें फिर से वही प्रश्न न पूछ बैठें जिससे उसने बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया है।

फ़्लैट के अन्दर कदम रखते ही वह घिर गई उससे जुड़े कई-कई प्रश्नों से जिनसे बचना चाहती थी वह। उसके ज़हन में कभी गलियों में रोटी का टुकड़ा लेती, कभी कूड़े के ढेर में मुँह मारती गऊएं, ठण्ड में ठिठुरती बूढ़ी गऊ, तो कभी रंभाते बच्छड़े की छवियों के साथ 'गौ-माता, गौ-रक्षा' के प्रवचन, गाय को लेकर उलटी-सीधी ख़बरें अंधड़ मचाती गई और दिमाग़ भट्ठी-सा जलने लगा। और उस पर यहाँ सामान्य लोगों के बार्न में गौओं का इतना अच्छा रख-रखाव उसे सकून देने की बजाय आज क्यों उस जलन में  घी डालने का काम करने लगा। उसने अपने नोट्स के पुलिन्दे को ज़ोर फ़र्श पर पटक दिया। औंधे मुँह बिस्तर पर गिर पड़ी और बैड पर मुक्के मार-मार चीखने लगी 'मैं क्यों यहाँ आई? क्यों आई मैं यहाँ ??'                       

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परिचय: डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

(शिक्षाविद,लेखिका, सम्पादिका)   

जन्म-20-7-1952, गाँव-जनसूई, अम्बाला -हरियाणा ,भारत

पिता: श्री हेमराज शर्मा, माता: श्रीमती सदा कौर शर्मा

जीवनसाथी: श्री पुष्प राज चसवाल

शिक्षा: ऍम ए (हिंदी ) पीएच.डी-'मुक्तिबोध काव्य में जनवादी चेतना' (हिंदी), बी.एड, एम.एड.         


प्रकाशित कृतियाँ : 'दर्पण' (खंड-काव्य-1986), 'ममता' (कहानीसंग्रह-1993), 'मुक्तिबोध-काव्य: जनवादी चेतना के संदर्भ में' (समीक्षात्मक शोधग्रंथ-2001), अनुवादित पुस्तक 'कल्याणी-1' मूल-लेखक (उर्दू) श्री खजान चंद हरनाल (लोक-कथाएँ-2005), 'हिंदी-शिक्षण' (बी.एड. के पाठयक्रम हेतु 2008), आवाज़ें मेरे अंदर (काव्य संग्रह - 2014 ), कण-कण फैलता आकाश मेरा (काव्य-संग्रह, प्रकाशनाधीन)

लेखन: कविता, कहानी, लघु-कथा, बाल-साहित्य, नाटिका, लेख, लिप्यांतरण इत्यादि।

प्रथम रचना क्षणिका 'आश्चर्य' 1982 के प्रकाशन से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियां, लघु-कथाएं, लेख आदि निरंतर प्रकाशित;

मूल-लेखक श्री खजान चंद हरनाल की लोक-कथाएँ (उर्दू) का पुस्तक रूप (कल्याणी-1) हिंदी में लिप्यान्तरण, तथा जाने माने ग़ज़लकार प्रो.आबिद आलमी की पुस्तक नए ज़ाविये (उर्दू) की ग़ज़लों का हिंदी लिप्यान्तरण उनके ग़ज़ल संग्रह 'अलफ़ाज़' में संकलित।

सम्पादन : कॉलेज मैग्ज़ीम "ऑब्ज़र्वर (Observer) हिंदी प्रभाग की सह-सम्पादिका(1997), बेजोड़ रत्न,ग्वालियर, मध्यप्रदेश, से अल्प-कालीन हिंदी पत्रिका में सह-सम्पादन (१९९८),

             त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अनहद कृति' का 2013 से सह-सम्पादन एवं नियमित संचालन।           

प्रसारण: समय- समय पर ऑल इण्डिया रेडियो, शिवपुरी-मध्यप्रदेश, ऑल इण्डिया रेडियो, ग्वालियर, व ऑल इण्डिया रेडियो, कुरुक्षेत्र-हरियाणा, से कवितायेँ, कहानियां लेख आदि प्रसारित 

सम्प्रति: महर्षि मारकंडेश्वर शिक्षण महाविद्यालय में हिंदी प्राध्यापिका एवं बी. एड इन्चार्ज के पद से सेवानिवृति के बाद वर्ष 2013 से 'अनहद-कृति ई-त्रैमासिकी में सह-सम्पादन;' पी.पी.प्रकाशन (अम्बाला शहर) की सह-संस्थापक।

सम्मानित लेखिका :

- पंजाब यूनिवर्सिटी से 1995 में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त हुई; 

- प्रथम पुस्तक 'दर्पण' का हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह द्वारा स्वतन्त्रता-दिवस (1986) पर देहरा (हिमाचल प्रदेश) में लोकार्पण;

- प्रख्यात साहित्यकार डॉ.मुल्खराज आनंद जी के सम्मान में धर्मशाला-हिमाचलप्रदेश में आयोजित गोष्ठी में  कविता "मैं सीता सती हूँ" कविता-पाठ की आनंद जी द्वारा मुक्त-कंठ से प्रशंसा तथा नवीन पत्रकारिता के स्तम्भ श्री प्रभाष जोशी (तत्कालीन सम्पादक) द्वारा जनसत्ता समाचारपत्र में "मैं सीता सती हूँ" प्रकाशित एवं प्रशंसित।

- सोहनलाल शिक्षण महाविद्यालय,अम्बाला शहर, हरियाणा में 2001 में "मुक्तिबोध-काव्य में जनवादी चेतना" की शोधकर्त्री लेखिका डॉ प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' पर आयोजित संगोष्ठी में सम्मानित;

- 'आवाज़ें मेरे अंदर' (2014) काव्य-संग्रह का लोकार्पण मूर्धन्य साहित्यकार डॉ रमेश कुंतल 'मेघ', प्रख्यात समालोचक डॉ. मैथिलीप्रसाद भारद्वाज एवं नाट्य-कहानी समालोचक डॉ. वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा प्रेस-क्लब, चंडीगढ़ में सम्पन्न।

- भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर लिखे गए लड़ीवार खंड-काव्य 'दर्पण' का प्राक्कथन सुप्रसिद्ध समालोचक डॉ.नन्द लाल मेहता, डी. लिट., द्वारा वर्ष 1986 में लिखा गया; हाल में ही प्रकाशनाधीन काव्य-संग्रह 'कण-कण फैलता आकाश मेरा' का प्राक्कथन भी उन्हीं के द्वारा लिखे जाने का सम्मान।

सम्मानित शिक्षाविद:

- वर्ष 2005 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉन्सिन-मैडिसन, अमेरिका में आयोजित 34वीं वार्षिक "कांफ्रेंस ओन साउथ-एशिया" में  इवेंट "पोएटिक्स एंड पॉलिटिक्स" में पैनल-चेयर के रूप में सम्मानित। 

- यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉन्सिन, अमेरिका में, इंजीनियरिंग लर्निंग सेण्टर में 2006 में "एजुकेशन इन इंडिया" में "कल्चरल कनेक्शन्स: ग्लोबल पर्स्पेकटीव्ज़" संगोष्ठी में भाषण व सम्मानित;

- यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉन्सिन, अमेरिका, 2005 में "कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजीज़ वाईल ट्रांस्मिटिंग नॉलज बाय लैंग्वेज" सेमिनार शिक्षण-कला पर विशेष प्रस्तुति हेतु इंजनियरिंग-लर्निंग सेंटर में आमंत्रित।

- यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिनसिनाटी, अमेरिका, 2008 में शिक्षण-पद्धति पर नव-वर्तन में इंजनियरिंग-लर्निंग सेंटर में प्रस्तुति।

साहित्य सृजन: साहित्य सृजन जहाँ सामाजिक सरोकारों से मेरा साक्षात्कार करवाता है, वहीं मुझे आत्म-आनंद से भी परिपूर्ण कर जाता है। आंतरिक उद्वेलन की थाह अंततः साहित्य सृजन से हो जाये तो विचारों को अक्षुण्ण जीवन्तता मिल जाती है।

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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