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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 151 व 152 // सतीश राठी

प्रविष्टि क्रमांक - 151

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सतीश राठी


आटा और जिस्म

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दोनों हाथ मशीन में आने से सुजान विकलांग हो गया | नौकरी हाथ से गयी |

जो कुछ मुआवजा मिला वह कुछ ही दिनों में पेट की आग को होम हो गया |

रमिया बेचारी लोगों के बर्तन माँजकर दोनों का पेट पाल रही थी |

पर ... आज  ! आज स्थिति विकट थी | दो दिनों से आटा नहीं था और भूख से बीमार सुजान ने चारपाई पकड़ ली थी |

सुजान की वीरान आँखों में उगे प्रश्न एवं भूखे पेट से निकली कराहटें रमिया सहन नहीं कर पा रही थी |

मन में कुछ सोचकर वह झोपड़ी से बाहर जाने लगी तो सुजान पूछ बैठा – ‘’ कहाँ जा रही है रमिया  ? ‘’

  ‘’ देखूँ  ! शायद बनिया तरस खाकर कुछ उधार दे दे  | ’’ ठंडे स्वर में रमिया बोली थी |

कुछ समय बाद अस्त – व्यस्त रमिया कुछ आटा लाई और पुरानी परात में उसे गूंधने लगी | कराहते हुए सुजान को उस गूँधे हुए आटे में और पत्नी के जिस्म में कोई फर्क नहीं लग रहा था |

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प्रविष्टि क्रमांक - 152

सतीश राठी


मजबूरी
खिरमिट और रामबली खाकी वर्दी को सामने देख कर चौकें। अभी कल ही वह बीस कोस दूर दस हजार के माल पर हाथ साफ करके आए थे। खूसट दरोगा ने सिर्फ दो हजार के नोट उन्हे पकड़ाए थे, और सारा माल थाने के पेट में चला गया था। आज फिर खाकी वर्दी का मतलब आज फिर सेंध लगानी थी।
बुझे मन से दोनों ने दरोगा को सलाम किया।
"कारे खिरमिट....थोबड़े पर बारह काहे को बज रहे हैं तुम दोनों के।" हाथ की लाठी पास के पेड़ पर ठोकते हुए दरोगा लगभग चीख कर बोला।
" नाही माई बाप... तबीयत कछु ठीक नाहीं.... वासे ही ।"
"चुप साले !!ताजकली के सेठ के यहां पर माल पड़ा है ,और तुम दोनों को ताप चढ़ रहा है,। सारी गर्मी निकाल दूंगा थाने में बंद करके ।"
फिर नरमी से बोला ,"बहुत माल है ...साफ कर दे ...आज रात। आधा-आधा हिसाब कर देंगे इस बार।"
और फिर एक आंख दबाकर रामबली से बोला ,"तेरी जोरू को रात भेज देना घर पर। स्साला.... इधर रोज आधा हिस्सा चाहता है... और जोरु को दस दस दिन तक बिना बोले भेजता ही नहीं।"
रामबली क्या बोलता ।गूंगी आंखों से ताकता रहा दरोगा की ओर। उसे तो देना ही देना था।

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सतीश राठी
आर 451, महालक्ष्मी नगर,
इंदौर 452010

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