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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 154 // औकात की बात मत करना // रितु असूजा

प्रविष्टि क्रमांक - 154

रितु असूजा


**औकात की बात मत करना ***         


**एक गाँव में एक सेठ रहता था ,उसका अपने गाँव में बड़ा ही नाम था कहते हैं ,वह सेठ बहुत बड़ा दानी भी था ।
कोई भी शुभ दिन हो ,कोई त्यौहार हो ,वह सेठ गरीबों को भोजन कराता, भोजन कराने के बाद वह सेठ सबको दक्षिणा भी देता , और कोई जो  कुछ माँगता उसे यथासम्भव देता। सब लोग सेठ के सामने नतमस्तक होते और जय-जय हो सेठ जी की जय हो जय हो कहते ।
परन्तु उनमें से एक बूढ़ा फ़कीर हाथ जोड़ कर कहता खुश रहो,सेठ जी भगवान आपको और दे ।
सेठ जी काफी समय ... उस बूढ़े फ़कीर की इस हरक़त से सोच में रहते कि बाकी सब लोग तो मेरे सामने नतमस्तक होते हैं, और जय-जयकार बोलते हैं ,और ये फ़क़ीर उल्टा मुझे ही आशीर्वाद देता है ,जैसे ये ही मुझे सब दे रहा हो।
एक दिन सेठ ने उस बूढ़े फ़कीर से पूछ ही लिया,एक बात बता?
प्रश्न :- फ़क़ीर ? तुम्हें भोजन किसने कराया ?
उत्तर:- बुढे फ़क़ीर ने कहा-- जी सेठ जी आपने ।
प्रश्न- सेठ जी ने पूछा तुम्हें पैसे किसने दिये ?
उत्तर:-बूढ़े फ़क़ीर ने कहा --सेठ जी आपने?
प्रश्न :-  सेठ जी बोले तो फिर तू मेरे सामने सिर क्यों नहीं?
झुकाता ,ना ही मेरी जय-जयकार बोलता है ,तू फ़क़ीर होकर मुझे आशीर्वाद देता है, औकात क्या है तेरी ?

  बूढ़ा फ़क़ीर मुस्कराया और बोला सेठ जी जरूर आपने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे जो भगवान ने आपको इतना सब कुछ दिया ,आप बहुत अच्छा करते हैं जो अपने धन के *भंडार में से कुछ गरीबों की सेवा में लगा देते हैं।
जहाँ तक बात औकात की है। औकात आपकी भी वही है ,जो मेरी है ,बस आपके बस जीवन जीने के साधनों के लिये धन-दौलत अधिक है ,सारी दौलत यहीं रह जायेगी सेठ जी आपके साथ नहीं जायेगी । आप को भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, और मुझे भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, फिर किस की क्या औकात।।
*औकात की बात मत किया कर ऐ बन्दे,
   औकात तेरी भी वही है,जो मेरी है।
    चन्द सोने-चाँदी के सिक्कों से दुनिया भर की
     जरूरतें खरीदी जा सकती हैं
       पर इन्सानियत नहीं।
         इंसानियत कहीं बाज़ारों में नहीं बिकती ।
       **इंसानियत ,इंसान के अच्छे कर्मों में मिलती है।**
          हम तो फ़कीर हैं, हमें फ़िकर नहीं किसी बात की
          फ़िकर नहीं ,तभी तो औकात रखते हैं चाँद ,सितारों
          को छूने की ..........** आशीषें देने की और दुआएं  लुटाने की.......

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3 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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  2. आदरणीय रितु जी आपकी लघुकथा बहुत ही सुंदर संदेश देती है। हम अभी स्वयं सीख रहे हैं इसलिए आपकी लघुकथा पर विस्तृत टिप्पणी नहीं कर सकते। जहां तक हमने लघुकथा के बारे में पढ़ा है उससे कह सकते हैं कि संवाद में प्रश्न-उत्तर न लिखकर सिर्फ प्रश्नवाचक चिन्ह लगायें तो लेखन और भी सटीक हो जाएगा। इंसानियत की सीख देती अपनी लघुकथा पठनीय भी है और प्रेरक भी।

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