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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 172 // समोसा // प्रियंका

प्रविष्टि क्रमांक - 172

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प्रियंका

समोसा


विश्वविद्यालय परिसर की देर शाम तक खुली रहने वाली चाय-नाश्ते की उस इकलौती दुकान पर शाम होते ही लोग जुटने लगते थे। विद्यार्थियों के अलावा शिक्षकों, कर्मचारियों और उनके परिजनों की लगातार आवाजाही उस जगह को जीवंत बना देती थी। वहाँ कुर्सी-टेबल नहीं लगे थे, लेकिन इस कमी को प्रकृति की बिछाई हुई सैकड़ों चट्टाने पूरा करती थीं। बहस-मुहाबिसों और हँसी-ठहाकों का वह गुलज़ार अड्डा हुआ करता था।

अपने शोध कार्य के अंतिम दिनों में मेरा अधिकांश वक्त लाइब्रेरी में ही बीता करता था। उन दिनों लगभग हर शाम मैं लाइब्रेरी से निकलकर सीधे वहाँ पहुँच जाया करती थी। चाय नाश्ते के साथ मन भी बहल जाया करता। दोस्त साथ में होते तो मैं भी बातचीत में ही उलझी रहती, लेकिन जब अकेली होती तो चुपचाप कहीं बैठकर वहां के परिवेश को पढ़ना-गुनना मुझे अच्छा लगता।

ऐसी ही एक शाम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए, वहाँ मैं अकेली बैठी हुई थी। मुझसे थोड़ी ही दूर एक कार आकर रुकी और उसमें से एक दंपत्ति अपने पांच-छ: साल के बच्चे के साथ कार से निकले। बच्चे की माँ ऑर्डर देने के लिए काउंटर की तरफ बढ़ गयी, और मेरे पास की ही एक चट्टान पर बच्चा और उसके पिता आकर बैठ गये। बच्चा अपने पिता से कह रहा था- ‘‘पापा मैं दो समोसे खाऊंगा, पिछली बार मम्मी ने मुझे सिर्फ एक ही दिलवाया था।” खाने पीने को लेकर वह और भी कई बाल सुलभ बातें करता रहा। पिता अपने मोबाइल की स्क्रीन पर चेहरा गड़ाए हुए ही “हूँ-हँ-हूँ” किये जा रहे थे। इसी बीच माँ भी उनके पास लौट आयी और बच्चे को टोकते हुए बोली- “अंकुर, टॉक इन इंग्लिश, अदरवाइज यू विल गेट नथिंग।”

माँ के इस कड़क लहज़े से बच्चे की सहजता जाती रही। वह बिल्कुल चुप हो गया। कुछ देर बाद माँ फिर से काउंटर पर गयी और समोसे लेकर लौट आयी। बच्चा समोसा खाने के लिए तत्पर था। उसने समोसे देखते ही कहा – “वॉव, इट लुक्स सो यम्मी”! समोसे की प्लेट हाथ में आते ही बच्चे ने अपने पिता की ओर देखा और पूछा "पापा व्ह़ॉट इज़ द इंग्लिश मीनिंग ऑफ़ ‘समोसा’?” यह सुनते ही कुछ देर तक माता-पिता एक दूसरे का मुंह ताकते रह गए, फिर माँ ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा- ‘समोसा’!

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· सम्पर्क :

प्रियंका

शोधार्थी, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय

हैदराबाद-500046 (तेलंगाना)

ई-मेल- priyankatangri@gmail.com

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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