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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 173 व 174 // डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी


प्रविष्टि क्रमांक - 173

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

4)

मारते कंकाल

दंगों के दौर में एक मकान, जिसके नामपट्ट के ऊपर लिखा था 'हिन्दुस्तान', में राम-रहीम बैठे.थे कि एक सम्प्रदाय के दंगाई आ गये और घर का दरवाज़ा तोड़ दिया। वो दोनों घबरा गये।

राम ने उनसे पूछा, "तुम तो मेरे सम्प्रदाय के हो, तुम्हें किसने और क्यों भेजा है?"

उन्होंने चिल्ला कर उत्तर दिया, "राम ने भेजा है, तुम्हारे घर के बाहर 'हिन्दुस्तान' लिखा है, यह विधर्मियों की भाषा का शब्द है।"

राम कुछ और कहता इतने में दूसरे सम्प्रदाय के दंगाई आ गये,

अब रहीम ने पूछा, "तुम लोग तो मेरी कौम के हो, तुम्हें किसने और क्यों भेजा है?"

उन्होंने भी चिल्ला कर उत्तर दिया, "रहीम ने भेजा है, तुम्हारे घर के बाहर 'हिन्दुस्तान' लिखा है, 'हिन्दू' काफ़िर ही तो होते हैं।"

अब राम-रहीम दोनों ने एक साथ आश्चर्यचकित होकर कहा, "तुम गलत कह रहे हो, हमने तुम्हें नहीं भेजा है, हम दोनों उपद्रव नहीं चाहते।"

लेकिन दोनों सम्प्रदायों के दंगाई कुछ सुनने को तैयार नहीं थे, उनकी आँखों में खून उतरा हुआ था और दिमाग में केवल मारने का भूत सवार था। एक तरफ के लोगों ने अपने राम को अनसुना कर रहीम को मार दिया और दूसरी तरफ के लोगों ने अपने रहीम को अनसुना कर राम को।

और 'हिन्दुस्तान' नाम के उस घर के दरवाज़े पर एक आदमी चमचमाता खद्दर का कुर्ता पहने राम और रहीम दोनों को श्रद्धांजलि देने का इंतज़ार कर रहा था। उसकी जेब में उन सभी दंगाईयों के दिमाग रखे हुए थे।

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प्रविष्टि क्रमांक - 174


डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

5)

चुप देशभक्त

विदेश में कई वर्ष पढने के बाद वह अपने देश लौटा था, उसने सुना था कि उसके देशवासी बहुत देशभक्त हैं, वो जानना चाहता था कि देशभक्ति क्या होती है?

उसने अपने उद्योगपति पिता से यह प्रश्न पूछा, उत्तर मिला, "बड़े उद्योग लगा कर देश की प्रगति देशभक्ति है।" उसे पता था उद्योगपति अपने कर्मचारियों का कई प्रकार से शोषण करते हैं, टेक्स चुकाने में भी हेराफेरी करते हैं, वह चुप रहा।

वह सड़क पर चला गया, और देखा कि महिलाओं से छेड़खानी हो रही है, उसने रास्ता बदल दिया, तब देखा कि कई लोग सड़कों पर थूक रहे हैं, कचरा फैंक रहे हैं, उसने मुंह फेर लिया लेकिन वहां से निकलते एक वाहन के धुँए से उसका मुंह भर गया।

वह एक होटल में गया, वहाँ देखा कि नशे का अवैध व्यापार हो रहा है, वह वहां से निकल भागा और पुलिस थाने में चला गया, वहाँ एक व्यक्ति रिश्वत देकर अपना अपराध छिपा रहा था। वह वहां से चुपचाप एक राजकीय कार्यालय में चला गया, जहाँ कुछ लोग गप्पे हांक रहे थे, कुछ सो भी रहे थे, उसका दिल भर आया।

और वह एक मंत्रालय में गया वहाँ एक नेता कह रहा था कि वह देश के लिए जान दे देगा। उसे पता था कि देश के लिये कभी किसी नेता ने जान नहीं दी।

वह चुपचाप बाहर आया, उसकी आँखों में आँसू थे, वहीँ एक भिखारी खड़ा था, उसकी हालत देख भिखारी ने पूछा तो उसने सारी बात बताई।

भिखारी हँसने लगा और बोला, "तू खुद तो सबकुछ देखकर चुप है और दूसरों में देशभक्ति ढूंढ रहा है! चुपचाप रहने पर तो मुझे भीख भी नहीं मिलती देशभक्ति कहाँ से मिलेगी?"

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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