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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 175 व 176 // भुवन चन्द्र पन्त

प्रविष्टि क्रमांक - 175

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भुवन चन्द्र पन्त

जिन्दगी का फलसफा

बोकारो जाने के लिए मुझे मुरादाबाद जंक्शन से रात ९:३० बजे की जलियांवाला बाग एक्सप्रेस पकड़नी थी। नियत समय से पूर्व स्टेशन पहुंचा तो पता चला कि ट्रेन 2 घण्टे लेट है। दिसम्बर का अन्तिम सप्ताह, बाहर हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड थी , मैं एसी वेटिंग रूप में घुसा तो वहां भी ठसाठस भरा था , कुछ देर खड़ा रहने के बाद बैंच के एक कोने में सीट तो मिल गयी , लेकिन अन्दर तक ठण्ड का प्रकोप कम नहीं था। सामने के कोने पर एक हीटर जला था , और उससे लगी सीट पर एक परिवार के सदस्य कब्जा जमाये थे। वेटिंग रूम का हर मुसाफिर उस सीट पर गिद्ध की तरह नजर गढ़ाये था कि कब वे लोग उठें और वो सीट पर कब्जा जमायें। मुझे नहीं पता कि वे किस गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

मैं बार-बार वेटिंग रूम से बाहर आकर इन्क्वायरी काउन्टर के बाहर लगे डिसप्ले बोर्ड पर अपनी गाड़ी की स्थिति जानने के लिए बाहर आता और दांत किटकिटाती ठण्ड में फिर वेटिंग रूम में वापस चला आता। मेरी गाड़ी लेट पर लेट होते जा रही थी और अब मुझे ३:३० घंटे प्रतीक्षा में बिताने थे।

हीटर के पास बैठा वह परिवार वहां से टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा था। जब कोई सदस्य कुछ पल के लिए वाशरूम जाने या अन्य किसी कार्यवश उठता तो परिवार का दूसरा सदस्य सामान रखकर उस सीट को घेर लेता। वे लोग टांगे फैलाकर हीटर की गरमी का भरपूर लुत्फ उठा रहे थे। जैसे वो जगह बाप-दादाओं से उन्हें विरासत में मिली हो।

मुझे इन्तजार करते करते 3 घण्टे बीत चुके थे, तभी एक एनाउन्समेंट हुआ और पूरा का पूरा कुनबा अपना सामान उठाकर प्लेटफार्म की ओर भागने लगा। शायद उनकी ट्रेन आ चुकी थी और ट्रेन पकड़ने की दौड़ भाग में घण्टों से घेरी उस जगह उनका मोह अचानक भंग हो गया। अब उनका लक्ष्य ट्रेन में बैठना था और वो आरामदायक सीट कुछ भी महत्व नहीं रह गया था उनके लिए।

एक क्षण को मैं भी उस खाली पड़ी सीट की ओर लपका और अचानक विचार आया कि जिन्दगी की सच्चाई भी यही है - जब समय ट्रेन आ जाती है तो सारी सुख सुविधाऐं वहीं छोड़कर जाना हमारी मजबूरी हो जाती है।

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प्रविष्टि क्रमांक - 176

भुवन चन्द्र पन्त

विश्वासघात

पण्डित दीनानाथ मिश्र का व्यक्तित्व आज के दौर में भी सतयुगी मान्यताओं को समेटे था। कभी जिन्दगी में असत्य, क्रोध, किसी को मन, वचन और कर्म से दुख पहुंचाना उनके लिए घोर पाप था। नियमित एवं संयमित जीवन कारण परिवार के सभी सदस्य दिल से उनका सम्मान करते थे। लेकिन आज पहली बार उनके चेहरे पर झल्लाहट से सभी आश्चर्यचकित थे।

हुआ यॅू कि पण्डित जी को सुबह जब उनकी धर्मपत्नी जगाने लगी तो हमेशा भगवान के नाम के साथ आँखें खोलने वाले पण्डित जी आज झल्लाकर बोल उठे- ’’ अरे भाग्यवान ! 2 मिनट रूक भी जाती।’’

पत्नी - ’’ आखिर दो मिनट बाद जागने से क्या हो जाता। आज तो वैसे ही आपको पूजा पाठ व नित्यकर्म के लिए विलम्ब हो गया है। ’’

पंण्डित जी - ’’ क्या फायदा उस पूजा पाठ का , जिन आदर्शों पर मैं चला था , आज तुमने एक क्षण में सब मिट्टी में मिला दिये। ’’

पत्नी -’’ अरे ! आखिर हुआ क्या ?’’

पण्डित जी - ’’ हुआ ये कि मैं अभी ख्वाबों में रेल की यात्रा कर रहा था , और मेरा सहयात्री अपने कीमती सामान की पोटली मेरे भरोसे छोड़कर लघुशंका को गया था। अभी वो लौटकर भी नहीं आया था कि तुमने मुझे जगा दिया , जिस भरोसे से उसने मुझे जिम्मेदारी सौंपी थी , उसके साथ मैंने विश्वासघात किया है। काश ! उसके लौटने के बाद तुम मुझे जगाती। ’’

पत्नी - ’’ कैसी बात करते हैं आप। वो तो ख्वाब था हकीकत थोड़े ही थी।’’

पत्नी को पण्डित जी की इस सहजता और जीवन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता आश्चर्य भी था और गर्व भी। उसने पण्डित जी के पांव छुए और रोज के कामों में लग गयी।

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भुवन चन्द्र पन्त

रेहड़ ,भवाली ( नैनीताल)

उत्तराखंड

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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