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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 178 // सड़ा हुआ....... // चित्त रंजन गोप

प्रविष्टि क्रमांक - 178

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चित्त रंजन गोप

सड़ा हुआ.......

                                

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मैं दुकान के बाहर बेंच पर बैठा, अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। सामने लगभग आधा बोरा आलू रखा हुआ था जो सड़ गया था। उसकी गंध रह-रहकर नाक को तकलीफ दे रही थी। तभी सुजय बाबू गाड़ी से उतरा। थुल-थुल शरीर.... भचर-भचर बोली ..... बोली में झूठ बोलने का पुश्तैनी लाइसेंस .....। गाड़ी से उतरकर वह जैसे ही दुकान की तरफ बढ़ा, आलू की गंध से तिलमिला उठा। बोला---का गुप्ता जी, यह सड़ा हुआ आलू? फेकिए कहीं।

      "नहीं मालिक, बिक जाएगा।" गुप्ताजी ने जवाब दिया।

"बिक जएगा?" वह अचंभित  होकर एक बार आलू की तरफ और दूसरी बार गुप्ताजी की तरफ देखा। फिर बोला, "यह आलू वैसा ही आदमी खरीदेगा जो...।"

"ई आलू कर कै रुपैया लेभीं, दोकानी बाबू?" कालुआ ने आते-आते पूछा।

"तीस रुपैया।"  गुप्ता जी ने जवाब दिया।

"बीस रुपैया में देभीं?"

" ले ल ।"

        कालुआ बीस रुपया देकर बोरा उठाने लगा। तभी सुजय बाबू पूछ बैठा, "क्या करोगे यह आलू?"

"एकरा बाछ-बुछके सिझाइबो आर तेल-मसाला देयके तरकारी बनाइबो। आर पूरा परिवार दुई-सांझ पेट भरके खाइब, बाबू।" कहते हुए कालुआ ने कंधे पर बोरा लादा और चल दिया।

       सुजय बाबू ने फुसफुसाकर गुप्ताजी को कहा--- आज मुझे पता चला कि यहां सड़ा हुआ.....भी रहता है।

" बहुत हैं।" गुप्ताजी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

           सुजय बाबू के वाक्य के खाली स्थान का शब्द मैं नहीं सुन पाया था, परंतु यह समझ गया था कि उसने उस शब्द का प्रयोग कालुआ के लिए किया था।

नहीं, नहीं, उसने अपने लिए नहीं किया था !

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1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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