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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 181 // अपनी अपनी // आशीष दलाल

प्रविष्टि क्रमांक - 181

आशीष दलाल

अपनी अपनी

जैसे ही अपने नाजुक हाथों से उसने कार का दरवाजा खोला वह फुर्ती से होन्डा सीविक से उतरकर बाहर निकल आया. दौड़ते हुए झाड़ियों के झुरमुट को पारकर खुले मैदान के पास आकर उसकी नजरें किसी को खोजने लगी. आज उसे दूर दूर तक यहाँ कोई नजर नहीं आ रहा था.

उधर कार में बैठे बैठे उसने एक नंबर डॉयल किया. कुछ औपचारिक बातें होने के बाद उसकी आँखों में आँसू आ गए.

‘राज, बस एक बार मिल लो फिर कभी तुम्हें फोन न करूँगी.’ उसके स्वर में विनती थी.

कुछ देर वहाँ खड़े रहने के बाद मायूस होकर भारी कदमों से जैसे ही वह वापस जाने को मुड़ा कि पीछे से एक चिर परिचित आवाज सुनाई दी – ‘आज पहनी हुई लाल शर्ट तो तुझ पर खूब फब रही है.’

‘कल पापा का बर्थ डे था सो उन्होंने पार्टी में पहनने को लाकर दी.’ उसने पलटकर मुस्कुराकर जवाब दिया.

‘तेरे तो जलसे है. नए नए कपड़े, गाड़ी, अच्छा खाना और बड़ा सा घर. एक हम है जो रोटी के एक टुकड़े के लिए मारे मारे इधर उधर भटकते रहते है.’ कहते हुए वह रुआंसा हो गई.

‘रुपयों की चमक देखकर तुम खुद ही तो मुझ कंगाल को छोड़कर दूसरी राह पर चली थी. अब मेरी क्या जरुरत आन पड़ी तुम्हारी जिन्दगी में. रुपया-पैसा, गाड़ी-बंगला, शान-शौकत सबकुछ तो है तुम्हारें पास.’ फोन पर उसे राज का शिकायत मिश्रित मर्दाना स्वर सुनाई दिया.

‘मुझे प्यार चाहिए राज.’ वह बुदबुदाई.

‘सब दिखावा है. पहले मुझे भी बहुत अच्छा लगता था यह सब पर अब दम घुटता है. मुझे बाहर दौड़ना अच्छा लगता है. दोस्तों के संग मटरगस्ती करना भाता है. जब जी में आए वो करने का मन करता है. जिन्दगी तो अब जैसे कैदखाना बनकर रह गई है.’ उसकी बात सुनकर उसने अपने मन की कही.

‘मुझे एक ऐसा इंसान चाहिए जो मुझे अपना समय दे सके, राज. मुझे प्यार कर सके.’ कहकर अपने आँसू पोंछते हुए उसने गाड़ी का हॉर्न दबा दिया.

‘तुझे सारी सुख सुविधायें मिल रही है न इसी से तेरा दिमाग खराब हो गया है. जिन्दगी के कठोर थपेड़ों से दो चार होना पड़े तब पता चले जिन्दगी क्या होती है.’ उसके मन की बात सुनकर वह अपनी कहने लगी.

हॉर्न एक बार फिर जोर से बजा.

‘मुझे जाना होगा इस वक्त. कल फिर आऊँगा.’ सामने पड़े पत्थर के ऊपर उसने अपनी एक टांग ऊँची कर पेशाब की और पूंछ हिलाता हुआ होन्डा सीविक की ओर वापस दौड़ गया.

‘राज, मैं माँ बनना चाहती हूँ पर मेरी चाहत उसमें रही कमजोरी की वजह से कभी परवान नहीं चढ़ सकती. उसके एवज में उसने एक कुत्ता खरीदकर मेरी गोद में डाल दिया.’ वह उसकी बगल की सीट पर आकर बैठ गया. उसकी नजर उससे एक हुई और उसने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया. हाथ बढ़ाकर उसने कार का दरवाजा बंद कर लिया और एक बार फिर से वे दोनों अपनी अपनी जिन्दगी में वापस लौट आए.

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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