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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 182 // पैसे की अहमियत // धर्मेन्‍द्र कुमार त्रिपाठी

प्रविष्टि क्रमांक - 182


पैसे की अहमियत

धर्मेन्‍द्र कुमार त्रिपाठी

इस बार प्रयाग तट पर भरने वाले अर्धकुंभ के आयोजन में उसके माता पिता को जाना था। हर साल उसके माता पिता माघ मास में प्रयाग तट पर आयोजित होने वाले माघ मेले में कल्‍पवास किया करते थे। इस बार भी वे जा रहे थे, सो उसने भी गंगा में पवित्र डुबकी लगाने के लिए साथ में जाने का निश्‍चय कर लिया था। वह हर साल ही पांच-छ: दिन की छुट्टी लेकर जाता था और माता पिता के साथ गंगा स्‍नान में सहभागी हुआ करता था। इस बार उसने माता पिता के साथ ही उनके रिजर्व वाहन में जाने का निश्‍चय कर लिया था। सामान ज्‍यादा हो जाता था सो पिछले तीन साल से वे ट्रेन से न जाकर रिजर्व वाहन से ही जाते थे। पंडाल तक वाहन से सामान सुरक्षित पहुंच जाता था। पैसा ज्‍यादा लगता था, लेकिन ट्रेन यात्रा की परेशानी बच जाती थी।

रात नौ बजे वे प्रयाग के लिए वाहन से निकले थे। गाड़ी मालिक गाड़ी चला रहा था। रात नौ बजे से रात बारह बजे तक लगातार तीन घंटे गाड़ी चला कर खाना खाने को एक ढाबे में गाड़ी रोकी गयी फिर रात साढ़े तीन बजे चाय पीने को गाड़ी रोकी गयी। सुबह तकरीबन 500 बजे वे लोग प्रयाग पहुंच गये थे। कल्‍पवासियों का आना शुरू हो चुका था। छ: बजे वे गंगा तट पहुंच गये और डुबकी लगा और माता पिता को वहीं पंडाल में छोड़ वापिसी के लिए चल दिये थे।

वह और गाड़ी मालिक तथा ड्राईवर तीन लोग ही थे। गाड़ी मालिक नशे का आदि था। वह जाते समय गाड़ी चलाते हुए नशा भी किये हुये था और जाते समय जो दो जगह गाड़ी रूकी तो उसने एकांत में जाकर नशा‍ किया था। आते समय भी वह जितनी जगह गाड़ी रूक रही थी नशा कर रहा था। ये अच्‍छा हुआ कि गाड़ी उसने ड्राईवर को दे दी थी, खुद ड्राईव नहीं कर रहा था। गाड़ी में जगह थी तो वह सवारियां भी बैठाने की फिराक में था। रास्‍ते में फुटकर-फुटकर उसने दो तीन जगह सवारियां भी बैठाईं। एक जगह दो लोगों ने गाड़ी को हाथ दिया। किराये के लिए मोल भाव होने लगा। गाड़ी मालिक बीस रूपये मांग रहा था और वे दस रूपये प्रति व्‍यक्ति से ज्‍यादा देने को राजी न थे। ड्राईवर ने जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ाई, वैसे ही गाड़ी मालिक ने ड्राईवर को डपटते हुये कहा-''बीस रूपये मिल रहे हैं, बीस रूपये!'' और गाड़ी का दरवाजा खोल दोनों लोगों को बैठा लिया।

वह सोच रहा था नशा भी आदमी को पैसे की अहमियत सिखा देता है।

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मनं 501, रोशन नगर,

राम जानकी हनुमान वार्ड नं18,

मरकज मस्जिद के पास,

साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी मप्र

483501

ई-मेल- tripathidharmendra1978@gmailcom

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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