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कहानी // नाम का सवाल // दीपक दीक्षित

dípak díkhchit

नाम का सवाल

अजय को एक अदद क्रिकेट बैट की तलाश थी। कल सुबह सात बजे से उसका इंटर कॉलेज टूर्नामेंट में ओपनिंग बैटिंग करनी थी और आज रात को उसका बेटा एक एक्सीडेंट में शहीद हो गया था। गनीमत है उसे खुद इसमें कोई चोट नहीं आई थी। अब रात में कोई दुकान भी नहीं खुली होगी जहाँ से नया खरीद लाये। तभी उसे तिवारी की याद आई। वो एस डी कालेज का छह फुटा लड़का जो अक्सर प्रैक्टिस के लिए आता था जहाँ पर उसके कालेज के लोग भी प्रैक्टिस करते थे।

उसके कालेज और एस डी कालेज के बीच में एक बड़ा खेल का मैदान था जहाँ वह अक्सर प्रैक्टिस किया करता था और तिवारी भी। पिछले हफ्ते बाइक से जाते तिवारी ने एक घर की तरह इशारा करके बताया था कि वह उसका घर है। 'चलो तिवारी को उसके घर पर पकड़ता हूँ और उससे उसका बैट मांग लूँगा ',अजय ने सोचा। उसके घर जाकर दरवाजा खटखटाया तो एक अधेड़ महिला ने दरवाजा खोला।' आंटी, तिवारी घर में है क्या?', उसने सवाल किया। 'किस तिवारी की बात कर रहे हो बेटा?', महिला ने सवाल के बदले सवाल किया।

अब अजय के चौंकाने की बारी थी। 'क्या यहाँ कई तिवारी रहते हैं?', उसने हड़बड़ा कर पूछा। 'हाँ बेटा, मेरे पांच बेटे हैं और सब के सब तिवारी हैं और मेरे पति भी अपने नाम के साथ तिवारी लिखते हैं। अब तुम बताओ तुम्हें किस तिवारी से मिलाना है?' महिला ने जवाब दिया।

'आंटी वो जो छह फुट का तिवारी है, मैं उससे मिलने आया हूँ।', अजय ने कुछ सोच कर बोला।

'बेटा मेरे सभी बेटे और पति छह फुटे हैं।' ,महिला ने मुस्कुराते हुए कहा।

अजय अब तक काफी परेशान हो चुका था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे उन आंटी से पार पाए। तभी उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी। उसने तपाक से कहा, 'आंटी , मुझे उस तिवारी से मिलना है जो एस डी कालेज में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता है।'

'अच्छा तो तुम शशि से मिलाना चाहते हो', कहकर उसने 'शशी ,शशी ' की आवाज लगाई तो उसका वाला तिवारी बाहर निकला और अजय कि जान में जान आई।

वहां से लौटते समय अजय ने कसम खाई कि वह अब कभी अपने किसी मित्र को उसके सरनेम से नहीं बुलाएगा बल्कि हर किसी के पहले नाम से बुलाया करेगा। सरनेम तो पूरे परिवार का एक ही होता है और नाम सबका अलग अलग। और फिर पहले नाम से बुलाने पर दोस्ती में बेतकल्लुफी भी तो आती है।

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दीपक दीक्षित

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com ,9589030075

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा 6 साँझा-संकलन प्रकाशित हुए हैं ।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष 2016 में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया। अमृतधारा संस्था ,जलगॉंव द्वारा 'अमृतादित्य साहित्य गौरव' सम्मान प्रदान किया गया (2018). के बी साहित्य समिति , बदायूं (उ. प्र.) द्वारा ‘हिंदी भूषण श्री’ सम्मान दिया गया (2018) ।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी,कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेकों संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

साँझा-संकलन

संपादक का नाम

पुस्तक का नाम

विधा

प्रकाशक

डा. डी. विद्याधर

हिंदी की दुनियां ,दुनियां में हिंदी

निबंध

मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद

जयकांत मिश्रा

सहोदरी कहानी-२

कहानी

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

जयकांत मिश्रा

सहोदरी लघुकथा -२

लघुकथा

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

जयकांत मिश्रा

सहोदरी सोपान-५

कविता

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

डा प्रियंका सोनी 'प्रीत'

काव्य रत्नावाली

कविता

साहित्य कलश प्रकाशन , पटियाला

राजेश अग्रवाल तथा अन्य

हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति : वैश्विक परिदृश्य

निबंध

मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद

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