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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 185 व 186 // पूजा पाराशर

प्रविष्टि क्रमांक - 185

पूजा पाराशर

"अच्छा ही होगा"


राधा और शिवा दोनों भाई बहन रेलवे स्टेशन जाने के लिए बस में चढ़े l वे दोनों ही बहुत घबराए हुए थे क्योंकि रेल छुटने का समय और बस स्टॉप से स्टेशन पहुंचने का समय लगभग समान ही था l वे सोच में थे की रेल पकड़ भी पाएंगे या नहीं l बस से उतरते समय एक दिव्यांग ने शिवा से मदद मांगी कि वह स्टेशन तक पहुंचा दे l शिवा ने कुछ सामान अपने कंधे पर लादा और कुछ राधा को देकर, आगे बढ़े l राधा ने एक बार शिवा से कहा भी कि हम लोगों को रेल मिलना बहुत मुश्किल है और इतनी भीड़ में कैसे इस दिव्यांग को स्टेशन तक पहुंचा पाएंगे l राधा से उम्र में छोटे होने के बावजूद भी शिवा ने कहा, "कुछ अच्छा करेंगे तो अच्छा ही होगा, देखते हैं…..मिल ही जाएगी l बस आप आगे - आगे चलिए और मैं भी आ रहा हूं, इनको लेकर l" भीड़ से जल्दी-जल्दी निकलते हुए राधा बार-बार शिवा को देखते हुए आगे बढ़ रही थी । अंत में उस दिव्यांग को उसके मंजिल तक शिवा ने पहुंचा दिया l दोनों भाई -बहन बहुत तेजी से भागे l राधा ने तो मान लिया की रेल छूट ही गई होगी l लेकिन जैसे ही वे दोनों स्टेशन पर पहुंचे, रेल चलने लगी l दोनों रेल में चढ़ गए, पता चला कि रेल 10 मिनट देरी से थी l दोनों बहुत खुश हुए l राधा ने अपने भाई शिवा से कहा कि सही कहा तुमने कि कुछ अच्छा करेंगे तो अच्छा ही होगा l

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प्रविष्टि क्रमांक - 186

पूजा पाराशर

"सब अपने हैं"

राहुल हमेशा चीनू के यहां जाने की जिद करता था परंतु राहुल की मां हमेशा उसे जाने के लिए डांट कर मना कर देती थी l चीनू के बार -बार आग्रह करने पर इस बार राहुल से रहा नहीं गया और मां को बिना बताए चला गया l देर होने के कारण मां बहुत चिंता में सोच रही थी कि आखिर आज इतनी देर कैसे हो गई ?  कुछ देर बाद राहुल हंसते -खेलते घर की ओर आ ही रहा था कि मां दूर से ही देख राहुल पर बरस पड़ी l राहुल ने अपनी मां से कहा; आप मुझे हमेशा गलत बताती आईं हैं.... कि वह स्लम एरिया है, कभी नहीं जाना चाहिए l वहां सभी गंदे लोग रहते हैं l लेकिन मुझे वहां बहुत अच्छा लगा l यहां तो कोई किसी से बात भी नहीं करता l वहां सभी ने मुझे बहुत प्यार किया और मेरे बहुत सारे नए दोस्त भी बन गए l अगली बार आप भी मेरे साथ चलिए l आपको भी बहुत खुशी मिलेगी l सब आपसे मिलेंगे, बातें करेंगे l यहां तो कोई किसी से मतलब ही नहीं रखता, भले कितनी ही बड़ी मुसीबत क्यों ना आ जाए । वहां आपको ऐसा कुछ भी नहीं मिलेगा l लगेगा, सब अपने हैं l राहुल की बातें सुन, मां बिना प्रश्न -उत्तर किए कुछ देर तक वहीं खड़ी किसी सोच में पड़ गई और फिर अंदर चली गईं l


चेन्नई

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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